मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २६५
हे। आश्लेष—'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'श्लिष्' धातु से 'घञ्' प्रत्यय होता है। यहाँ प्रकृत्यर्थ 'गिरना' की दृढ़ता अर्थात् 'अवश्य गिरते हैं' इसके लिए दो नञों का प्रयोग किया गया है। जैसा कि कहा जाता 'द्वौ नञौ दाढर्यार्थं गमयतः' इति। आलङ्कारिक सूत्र भी है—
'स्मृतिनिश्चयसिद्धार्थे नञ्द्वयप्रयोगः सिद्धः' इति।
महाकवि ने वनदेवियों का अश्रुपात पृथ्वी पर न कहकर तरुपल्लव पर कहा है। क्योंकि देवताओं का अश्रुपात यदि पृथ्वी पर हो तो देशभ्रंश, महादुःख और मरण होता है। जैसा कि कहा जाता है—
'महात्मगुरुदेवानामाश्रुपातः क्षितौ यदि।
देशभ्रंशो महद्दुःखं मरणञ्च भवेद्ध्रुवम्॥'
महात्मा, गुरु और देवताओं का अश्रुपात यदि पृथ्वी पर हो तो देशभ्रंश, महद्दुःख और मरण अवश्य हो।
अलङ्कारः—'मुक्तास्थूलाः' यहाँ इव आदि सामान्य धर्मवाचक पद के लोप होने के कारण 'लुप्तोपमा' नामक अलङ्कार है॥ ४३ ॥
भित्त्वा सद्यः किसलयपुटान्देवदारुद्रुमाणां
ये तत्क्षीरस्रुतिसुरभयो दक्षिणेन प्रवृत्ताः।
आलिङ्ग्यन्ते गुणवति ! मया ते तुषाराद्रिवाताः
पूर्वं स्पृष्टं यदि किल भवेदङ्गमेभिस्त्वेति ॥४४॥
अन्वयः—देवदारुद्रुमाणाम्, किसलयपुटान्, सद्यः, भित्त्वा, तत्क्षीरस्रुतिसुरभयो, ये, तुषाराद्रिवाताः, दक्षिणेन, प्रवृत्ताः, गुणवति ! पूर्वम्, एभिः, तव, अङ्गम्, स्पृष्टम्, भवेत्, यदि, किल, इति, ते, मया, आलिङ्ग्यन्ते।
व्याख्या—देवदारुद्रुमाणाम् = देवदारु-नामक-वृक्षाणाम्, किसलयपुटान् = पल्लवपुटान्, सद्यः = तत्क्षणे, भित्त्वा = विच्छेद्य, तत्क्षीरस्रुतिसुरभयः = देवदारु-निर्गतदुग्धसुगन्धयः, ये तुषाराद्रिवाताः = हिमालयपवनाः, दक्षिणेन = दक्षिण-