भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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उत्तरमेघः २६९

टिप्पणी—एक दिन-रात में आठ प्रहर होते हैं। इस प्रकार यद्यपि रात के भी चार प्रहर होने चाहिए परन्तु, अमरकोश के टीकाकार के मतानुसार रात के आदि के अर्ध प्रहर एवं अन्त के अर्ध प्रहर रात नहीं है अतः 'रात' को त्रियामा कहा जाता है। संक्षिप्यते—'सम्' उपसर्ग पूर्वक 'क्षिप' धातु 'विधि लिङ्' का यह रूप है। सर्वावस्थासु—यहाँ ग्रीष्म ऋतु के लम्बे दिनों की दुपहरी आदि का समय समझना चाहिए। मन्दमन्दातपम्—'मन्दम्' इसका 'प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से द्विरुक्ति हो गयी एवं 'कर्मधारयवदुत्तरेषु' इस सूत्र से कर्मधारयवद्भाव हो जाने से 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः' इस सूत्र से सुप् का लुक् हो जाता है। दुर्लभप्रार्थनम्—यह पद 'चेतः' इस पद का विशेषण है। गाढोष्माभिः—यहाँ 'उष्मन्' शब्द यद्यपि पुंलिङ्ग है तथापि बहुव्रीहि समास हो जाने पर समस्त शब्द स्त्रीलिङ्ग हो जाने पर 'डावुभ्यामन्यतरस्याम्' इस सूत्र से स्त्रीत्व की विवक्षा में 'डाप्' हो जाने से 'गाढोष्मा' ऐसा रूप निष्पन्न होता है ॥ ४५ ॥

नन्वात्मानं बहु विगणयन्नात्मनैवावलम्बे तत्कल्याणि ! त्वमपि नितरां मागमः कातरत्वम् । कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥४६॥

अन्वयः—ननु बहु विगणयन्, आत्मानम्, आत्मना, एव, अवलम्बे, तत् कल्याणि ! त्वमपि, नितराम्, कातरत्वम्, मा, गमः । कस्य, अत्यन्तम्, सुखम्, दुःखम्, वा, एकान्ततः उपगतम् ? चक्रनेमिक्रमेण, दशा, नीचैः, उपरि, च गच्छति ॥ ४६ ॥

व्याख्या—ननु = हे प्रिये ! बहु=अधिकम्, विगणयन् = विचारयन्, आत्मानम् = स्वम्, आत्मनैव = स्वेनैव, अवलम्बे = धारयामि । तत् = तद्धेतोः, हे कल्याणि = हे सुभगे ! त्वम् = मत्प्रिया अपि, नितराम्=अत्यन्तम्, कातरत्वम्=भीरुत्वम्, मागमः = नोयायाः । कस्य = जनस्य, अत्यन्तम् = अत्यधिकम्, सुखम्

१८ मेघदूत०

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