मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २७१
टिप्पणी—ननु = यहां इसका ग्रहण आमन्त्रण अर्थ में है। विगणयन्—‘वि’ उपसर्गपूर्वक ‘गण्’ धातु से ‘णिच्’ करके लट् लकार के स्थान पर ‘शतृ’ आदेश करके ‘विगणयन्’ ऐसा रूप उपपन्न होता है। आत्मना—यहाँ ‘प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्’ इस सूत्र से तृतीया विभक्ति हुई है। अवलम्बे—‘अव’ उपसर्गपूर्वक आत्मनेपदी लव+( इ ) धातु से इदित्त्वान्नुम् आदि करके लट्लकार के उत्तमपुरुष एकवचन में ‘अवलम्बे’ ऐसा रूप बनता है। कल्याणि—कल्याण ‘शब्द’ से ‘बह्वादिभ्यश्च’ सूत्र से ङीप् करके ‘कल्याणी’ ऐसा रूप बनाया जाता है। यह सम्बोधन का रूप है। उक्त विशेषण देने का अभिप्राय है कि ‘हे सौभाग्यवति ! मैं तुम्हारे सौभाग्य बल से ही जी रहा हूँ।’ इति। कातरत्वम्—कातराया भावः इस अर्थ में ‘कातरा’ शब्द से ‘तस्य भावस्त्वतलौ’ इस सूत्र से ‘त्व’ प्रत्यय हुआ है और ‘त्वतलोर्गुणवचनस्य’ इस सूत्र से ‘कातरा’ को पुंवद्भाव हो गया है। उपनतम्—उप उपसर्गपूर्वक ‘नम्’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय होकर अनुनासिक का लोप करके ‘उपनतम्’ ऐसा रूप बनता है।
महाकवि भासरचित स्वप्नवासवदत्तम् में— ‘कालक्रमेण जगतः परिवर्तमाना। चक्रारपङ्क्तिरिव गच्छति भाग्यपङ्क्तिः॥ यह श्लोक आया है। कालिदास के इस श्लोक में उसी की छाया है।
शापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शार्ङ्गपाणौ शेषान्मासान् गमय चतुरो लोचने मोलयित्वा। पश्चादावां विरहगणितं तं तमात्माभिलाषं निर्वेश्यावः परिणतशरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥४७॥
अन्वयः—(हे प्रिये !) शार्ङ्गपाणौ, भुजगशयनात्, उत्थिते, मे, शापान्तः। शेषान्, चतुरः मासान्, लोचने, मीलयित्वा, गमय। पश्चात्, आवाम्, विरह-