मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः २७३
समासः—शाङ्गं पाणौ यस्य स शाङ्गंपाणिः ( व्य० बहु० ) तस्मिन् । भुजग एव शयनम् = भुजगशयनम् ( रूपक० ) तस्मात् । शापस्य अन्तः = शापान्तः ( ष० तत्० ) । विरहे गणितम् = विरहगणितम् ( स० तत्० ) । आत्मनः अभिलाषः आत्माऽभिलाषः ( ष० तत्० ) तम् । परिणताः शरच्चन्द्रिका यासां ताः = परिणतशरच्चन्द्रिकाः ( बहु० ) तासु ।
कोशः—निर्वेशो भृतिभोगयोः, इत्यमरः । त्रियामा क्षणदा क्षपा, इत्यमरः ।
टिप्पणी—भगवान् विष्णु आषाढ़-शुक्ल एकादशी जिसे हरिशयनी एकादशी कहते हैं, शेषशय्या पर सोते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी जिसे देवोत्थान एकादशी कहते हैं, को जगते हैं, इस प्रकार चार महीने होते हैं । प्रारम्भ में महाकवि ने ‘आषाढ़स्य प्रथमदिवसे’ ऐसा कहा है, तदनुसार चार महीने से १० दिन अधिक होते हैं फिर ‘चतुरो मासान् गमय’ ऐसा प्रयोग कैसे किया गया ? यह शङ्का हो सकती है, परन्तु ‘छत्रिणो यान्ति’ के समान यहाँ भी ‘अजहल्लक्षणा’ से चार महीनों के साथ दश दिन का भी ग्रहण ‘चतुरो मासान्’ इस पद से हो जायेगा । कूर्मपुराण में एक श्लोक आता है—
‘क्षीराब्धौ शेषपर्यङ्के आषाढ्यां संविशेद्धरिः ।
निद्रां त्यजति कार्त्तिक्यां तयोः संपूजयेद्धरिम्’ ॥ इति ।
परिणतशरच्चन्द्रिकासु—दक्षिणावर्तनाथ जी ने आषाढ़ आदि चार मासों के अनन्तर कार्तिक मास में महाकवि ने कैसे ‘शरत् ऋतु’ का प्रादुर्भाव बतलाया है ? ऐसी शंका की है, परन्तु महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने इसका उत्तर देते हुए लिखा है कि महाकवि ने, कार्तिक महीने के अन्त तक शरत्ऋतु रहती है और एकादशी तिथि तक उसका परिणत हो जाना स्वाभाविक ही है, अतः ‘परिणतशरच्चन्द्रिकासु’ कहा है । न कि ‘शरत् ऋतु’ की उत्पत्ति बतलाया है । मीलयित्वा—णिजन्त ‘मीलि’ धातु से ‘क्त्वा’ प्रत्यय करके ‘मीलयित्वा’ ऐसा रूप बनता है । आवाम्—‘त्वञ्चाहञ्च’ इस विग्रह में ‘त्यदादीनि सर्वैर्नित्यम्’ इस सूत्र से एकशेष और ‘त्यदादीनां मिथः