भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 335 में से

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पूर्वमेघः २९

क्रिया का विशेषण मानें और 'मन्दं त्वां यथा स्यात्तथा मन्दं नुदति' ऐसा अन्वय माने तो महाकवि की प्रामाणिकता के साथ ही अर्थ भी सुसंगत हो जायगा । वैसे तो 'निरङ्कुशाः हि कवयो भवन्ति' इसका आश्रय लेकर 'मन्दंमन्दं' इसको क्रियाविशेषण भी माना जा सकता है । नुदति-प्रेरणार्थक 'नुद्' धातु के लट् लकार के प्रथम पुरुष एक वचन का यह रूप है । सगन्धः-गन्धेन सहितः इस विग्रह में 'तेन सहेति तुल्ययोगे' इस सूत्र से ( बहुव्रीहि ) समास होकर 'वोपसर्जनस्य' इस सूत्र से 'सह' के स्थान पर 'स' यह आदेश विकल्प से होकर 'सगन्धः' ऐसा रूप बना है । जहाँ सह को स आदेश नहीं होगा वहाँ 'सहगन्धः' ऐसा रूप भी बनता है । श्लोकक्रम-कुछ टीकाकार 'तां चावश्यम्' इस श्लोक को नवम स्थान पर, जिसे मल्लिनाथ जी ने दशम स्थान पर रखा है रखते हैं और 'मन्दंमन्दं' को दशम स्थान पर । परन्तु यह क्रम उचित नहीं जँचता । इस काव्य का मुख्य अभिधेय 'सन्देश' पहुँचाना है । इसका कथन कवि ने 'सन्तप्तानाम्' इस सातवें श्लोक में कर दिया । तदनन्तर आनुषंगिक पथिक वनिताओं को आश्वासन का कथन 'अष्टम' में किया । तदनन्तर शुभशकुन का प्रदर्शन 'मन्दं मन्दं' इस श्लोक में यात्रानुरूप उचित ही है । तदनन्तर वह अवश्य जीवित है । अतः तुम्हारा जाना निरर्थक नहीं होगा इसकी पुष्टि 'तां चावश्यं' इस दशम श्लोक में उचित है ॥ ९ ॥

तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपत्नी-
मव्यापन्नामविहतगतिर्द्रक्ष्यसि भ्रातृजायाम् ।
आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां
सद्यःपाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि ॥१०॥

अन्वयः—( हे मेघ ) दिवसगणनातत्पराम् अव्यापन्नाम् एकपत्नीम् भ्रातृजायाम् ताम् अविहतगतिः ( त्वम् ) अवश्यं द्रक्ष्यसि आशाबन्धः प्रणयि कुसुमसदृशम् विप्रयोगे सद्यःपाति अंगनानां हृदयं प्रायशो रुणद्धि ।

व्याख्या—हे मेघ ! मत्प्रिया 'मृता अथवा व्रतभ्रष्टा' इति विनिश्चित्य त्वं स्वयात्रायाः वैयर्थ्यं नाऽशङ्कय । यतोहि-दिवसगणनातत्पराम्=

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