भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः ३५

कोशः—मेखला श्रोणि-स्थानेऽद्रि कटके कटि-बन्धने, इति यादवः । आमन्त्रणसभाजने आप्रच्छनम्, इत्यमरः । उष्ण उष्मागमस्तपः, इत्यमरः । वाष्पं नेत्रजलोष्मणः विश्वः ।

टिप्पणीप्रियसखम् = प्रियश्चासौ सखा इस प्रकार कर्मधारय समास होने के पश्चात् 'राजाहःसखिभ्यष्टच्'-इस सूत्र से समासान्त टच् प्रत्यय करके "प्रिय सख" शब्द बना है उसी के द्वितीया विभक्ति का यह रूप है । वन्द्यैः पुंसाम्—यहाँ कृत्य प्रत्ययान्त "वन्द्य" के योग में पुंस शब्द से वैकल्पिक षष्ठी "कृत्यानां कर्तरि वा" से हुई है । पक्ष में तृतीया भी होती है । आपृच्छस्व—"आङ्" उपसर्गपूर्वक "प्रच्छ" धातु के लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का यह रूप है । यद्यपि यह धातु परस्मैपदी है फिर भी आङ् उपसर्ग हो जाने के कारण "आङि नुप्रच्छ्योः" इस सूत्र से आत्मनेपद होकर यह रूप बना है । काले काले—यहाँ वीप्सा में "नित्यवीप्सयोः' इस सूत्र से द्विरुक्ति हुई । स्नेह—स्निह् धातु से भाव में घञ् प्रत्यय हुआ है । व्यक्तिः—'वि' उपसर्गपूर्वक 'अञ्ज्' धातु से क्तिन् प्रत्यय करके 'व्यक्तिः' यह रूप बना है । चिरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम्—बहुत दिनों के बाद मिलन होने पर मित्रों के आँखों से आँसू गिरना स्वाभाविक है । वर्षा ऋतु में पर्वत से 'भाप' उत्पन्न होता है । कवि ने इसी को उपरोक्त भाव से 'उत्प्रेक्षित' किया है ॥ १२ ॥

मार्गं तावच्छृणु कथयतस्त्वत्—प्रयाणानुरूपं
सन्देशं मे तदनुजलद ! श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम् ।
खिन्नः खिन्नः शिखरिषु पदं न्यस्य गन्तासि यत्र
क्षीणः क्षीणः परिलघु पयः स्रोतसां चोपभुज्य ॥ १३ ॥

अन्वयः—हे जलद ! तावत् कथयतः त्वत् प्रयाणानुरूपं मार्गं शृणु, तदनु श्रोत्रपेयं मे सन्देशं श्रोष्यसि । यत्र खिन्नः खिन्नः शिखरिषु पदं न्यस्य क्षीणः क्षीणः ( सन् ) स्रोतसां परिलघु पयश्च उपभुज्य गन्तासि ॥ १३ ॥

व्याख्या—हे जलद ! हे मेघ ! तावत् = प्रथमम्, कथयतः = वदतः, यक्षादिति शेषः, त्वत्प्रयाणानुरूपम् = भवदीययात्रानुकूलम्, मार्गम् = अध्वानम्,

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