मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ३९
इस आश्रम से गगनमार्ग में दिग्गजों की बड़ी-बड़ी सूँडों के आक्रमण से गगन मार्ग में बचते हुए अलकापुरी जाने के लिए उत्तर की ओर मुँह करके ऊपर उड़ जाओ ।
समासः—उन्मुखीभिः—उन्नतं मुखं यासां ताः उन्मुखाः ताभिः (बहुव्रीहिः) मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः—सिद्धानाम् अङ्गनाः सिद्धाङ्गनाः (ष० त०) मुग्धाश्च ताः सिद्धाङ्गना मुग्धसिद्धाङ्गनाः (कर्म०) ताभिः । दृष्टोत्साहः—दृष्ट उत्साहो यस्य स दृष्टोत्साहः (बहु०) । सरस-निचुलात्—सरसा निचुला यस्मिंस्तत् सरसनिचुलम् (बहुव्री०) तस्मात् । दिङ्नागानां—दिशां नागाः =दिङ्नागाः (ष० तत्०) । तेषाम् । स्थूलहस्तावलेपान्—स्थूलाश्च ते हस्ताः =स्थूलहस्तावलेपान् (ष० त०) । उदङ्मुखः—उदक् मुखं यस्य स उदङ्मुखः (बहु०) ।
कोशः—कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्, इत्यमरः । वानीरे कविभेदे स्यान्निचुलः स्थल-वेतसे । शब्दार्णवः मतङ्गजो । गजो नागः कुञ्जरो वारणः करी इत्यमरः ।
टिप्पणी—हरति—हरणार्थक हृधातु के वर्तमानकालिक लट् लकार के प्रथमपुरुष के एक वचन का रूप है (हृ + अ + ति) । किंस्वित्—"किम्" यह अव्यय है, और "स्वित्" यह अव्यय है— दोनों अव्यय मिलकर विकल्प और वितर्क इन दो अर्थों को प्रकाशित करते हैं। उन्मुखीभिः—यहाँ उन्मुख शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में "स्वाङ्गाच्चोपसर्जंनादसंयोगोपधात्" इस सूत्र से "ङीष्" प्रत्यय हुआ है। चकितचकितम्—चकितं यथा स्यात्तथा; यहाँ पर प्रकार अर्थ में "प्रकारे गुणवचनस्य" इस सूत्र से द्वित्व होकर 'कर्मधारयवदुत्तरेषु' इससे सु का लोप हो गया है। दृष्टः—दृश् धातु से 'क्त' प्रत्यय होकर दृष्टः यह शब्द निष्पन्न होता है। स्थानात्—'ष्ठा' गतिनिवृत्तौ इस धातु से ल्युट् प्रत्यय होकर स्थान यह रूप बना है, उस शब्द के पञ्चमी विभक्ति का यह रूप है। परिहरन्—'परि' उपसर्गपूर्वक 'हृ' धातु से वर्तमानकालिक लट् लकार के स्थान में 'शतृ' आदेश करके 'परिहरन्' यह रूप बनाया जाता