भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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४० | मेघदूतम्


है। यहां महोपाध्याय मल्लिनाथ ने 'सरसनिचुलात्' और 'दिङ्नागानाम्' इन दो शब्दों के अधार पर उक्तार्थ के अलावे दूसरे अर्थ का भी प्रतिपादन किया है जो कि इस प्रकार है—सरसनिचुलात्=अर्थात् रसिक 'निचुल' नामक कालिदास के समकालीन कवि, जो कि दूसरे विरोधी कवियों द्वारा दिखाये गये दोषों का परिहरन करने वाले थे, ऐसे कवि के आश्रम से निर्दोष होने के कारण ऊँचे मुखवाले होते हुए मार्ग में अर्थात् सारस्वत मार्ग में विरोधी 'दिङ्नाग' जैसे आदरणीय कवि में हस्तावलेप=अर्थात् हस्तविन्यासपूर्वक दिखाये गये दोषों को दूर करते हुए अद्रेः=अर्थात् पर्वत की तरह ऊँचे दिङ्नागाचार्य की शृङ्गम्=प्रधानता को परिहरति=नष्ट करता है क्या ? इस कारण से सिद्धैः=महाकवियों द्वारा और अङ्गनाभिश्च=गुणशालिनी स्त्रियों द्वारा, दृष्टोत्साहः=उद्योग देखे जाते हुए, खम् उत्पत=आकाश में उड़ जाओ। परन्तु महोपाध्याय मल्लिनाथ जी का यह मत सर्वसम्मत नहीं है। दिङ्नागाचार्य कालिदास के विरोधी थे, यह भी एक विचारणीय विषय ही है। क्योंकि 'दिङ्नाग' नाम के अनेक विद्वान् हो गये हैं। बौद्ध दर्शन के विद्वान् वसुबन्धु के शिष्य 'दिङ्नाग' कालिदास के विरोधी इसलिए नहीं माने जा सकते, क्योंकि दोनों का समय भिन्न है। यदि यह कहा जाय कि कालभेद होने पर भी पूर्वकालिक विद्वान् के मत का खण्डन उत्तरकालिक कवि कर सकता है अतः दिङ्नाग का विरोधी महाकवि हैं, तो यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि कालिदास का काल आधुनिक बहुत से विद्वानों के मत में विक्रमीय प्रथम शताब्दी है जब कि दिङ्नागाचार्य का काल पाँचवीं शताब्दी है। और भी सम्प्रदायान्तर के विद्वान् के लिए आदरार्थक बहुवचनान्त का प्रयोग भी आपत्तिपूर्ण नहीं प्रतीत होता। अब समस्या यहाँ यह खड़ी हो जाती है कि—उत्तरदिशा जब एक है और एक दिशा में एक ही दिग्गज होता है तो महाकवि ने 'दिङ्नागानाम्' यह बहुवचनान्त का प्रयोग कैसे किया ? तो इसका समाधान यह है कि एक उत्तर दिशा में एक उत्तर दिशा के अलावे अन्य दिग्गजों के स्थूल सूड़ों के प्रहार से बचते हुए ऐसा अर्थ करने से किसी प्रकार की आपत्ति नहीं आ सकती है ॥ १४ ॥