मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२ | मेघदूतम् |
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(ष० तत्०)। वल्मीकस्य अग्रम् = वल्मीकाग्रम् (ष० तत्०) तस्मात् । धनुषः खण्डम्=धनुष्खण्डम् (ष० तत्०) । गोपानां वेषः=गोपवेषः (ष० तत्०) तस्य ।
कोशः—रत्नं मणिः द्वयोरश्मजातौ मुक्तादिकेऽपि च, इत्यमरः । आखण्डलः सहस्राक्षः, इत्यमरः । कृष्णे नीलाऽसितश्यामकालश्यामलमेचकाः, इत्यमरः । पिच्छ बर्हे नपुंसक, इत्यमरः । छाया सूर्यप्रिया कान्तिः, इत्यमरः ।
भावार्थः—( हे मेघ ! ) पद्मरागादिमणीनां संमिश्रणमिव सुन्दरमेतदिन्द्रधनुः पुरस्तात् वल्मीकविवरादाविर्भवति, येन धवलकांतिसंवलितेन, मयूरपिच्छेन गोपवेषस्य कृष्णस्येव तावकीनपि श्यामं शरीरं सातिशयं शोभासम्पन्नं भविष्यति ।
हिन्दी—हे मेघ ! पद्मराग आदि मणियों की प्रभा के सम्मिश्रण की तरह दर्शनीय इन्द्रधनुष सामने बांबी के अग्रभाग से निकल रहा है । जिस इन्द्रधनुष के टुकड़े से, श्याम रंग का यह तेरा शरीर, उज्ज्वल कांतिवाले मोरपंख से गोपवेषधारी कृष्ण के शरीर के समान अत्यधिक शोभा को प्राप्त करेगा ।
टिप्पणी—रत्नच्छायाम्=रत्नानां छाया रत्नच्छायाम् ( ष० तत्० )। यहाँ ‘’छाया बाहुल्ये’’ इस सूत्र से नपुंसकलिङ्ग हुआ है । व्यतिकरः -“वि” और “अति” इन दो उपसर्गपूर्वक “कृ” धातु से “ऋदोरप्” इस सूत्र से “अप्” प्रत्यय करके गुणादि करके “व्यतिकर” यह रूप बना है । आसमंतात् व्यतिकर आव्यतिकरः यहाँ “कुगति प्रादयः” इस सूत्र से समास हुआ है । प्रेक्ष्यम्—“प्र” उपसर्गपूर्वक “ईक्ष” धातु से “ण्यत्” प्रत्यय होकर “प्रेक्ष्यम्”, यह शब्द बनता है । धनुष्खण्डम्—किसी-किसी पुस्तक में “धनुःखण्डम्” यह पाठ मिलता है जो कि पाणिनीय व्याकरण के अनुसार अशुद्ध है क्योंकि “नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य” इस सूत्र से यहाँ नित्य मूर्धन्य षकार होता है ।
इन्द्रधनुष के विषय में वृहत्संहिता में लिखा है—
सूर्यस्य विविधाः वर्णाः, पवनेन विघट्टिताः साभ्रे ।
वियति धनुः संस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ॥