मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ मेघदूतम्
नीचोऽपि आश्रयाय गृहागतं मित्रमवलोक्य पूर्वकृतोपकारं स्मृत्य पराङ्मुखो न भवति, यः आम्रकूटपर्वतस्तादृशो महान् स कथं भविष्यति। नैव भविष्यतीतिभावः।
हिन्दी—हे मेघ ! मूसलाधार वृष्टि के द्वारा दावाग्नि को बुझाने वाले, मार्ग के परिश्रम से थके हुए तुमको आम्रकूट पर्वत शिखर पर धारण करेगा। (क्योंकि) छोटे भी (जन) आश्रय के लिए मित्र के आने पर पहले के उपकारों को याद कर मुंह नहीं मोड़ते तो फिर जो आम्रकूट उतना महान् है वह मुँह मोड़ेगा क्या ? कभी नहीं मुँह मोड़ेगा।
समासः—आम्राणां कूटो यत्र स आम्रकूटः ( बहुव्रीहिः ) । आसारेण प्रशमितो वनोपप्लवो येन तम् आसारप्रशमितवनोपप्लवम् ( बहुव्रीहिः ) । अध्वनः श्रमः = अध्वश्रमः ( ष० तत्० ) तेन परिगतस्तम् ( तृ० तत्० ) ।
कोशः—कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गम्, इत्यमरः । धारा-सम्पात-असारः, इत्यमरः । सरणिर्वर्त्म मार्गाध्व, इत्यमरः । क्षुद्रो दरिद्रः कृपणे, इति यादवः । अथ मित्रं सखा सुहृत्, इत्यमरः । पुंस्यादि पूर्वपौरस्त्य प्रथमाद्या, इत्यमरः ।
टिप्पणी—आम्रकूटः—यहाँ पर कुछ टीकाकार 'आम्राः कूटेषु यस्य सः' इस प्रकार व्यधिकरण बहुव्रीहि समास मानते हैं । सानुमान्—सानवः सन्ति यस्मिन् ऐसे विग्रह में 'सानु' शब्द से 'मतुप्' प्रत्यय करके सानुमान् यह रूप बना है । वक्ष्यति—'वह' धातु के 'लृट्' लकार के प्रथम पुरुष के एक वचन का रूप है ( वह + स्य + ति ) । संश्रयाय—'सम्' उपसर्गपूर्वक सेवार्थक 'श्रिञ्' धातु से 'एरच्' इस सूत्र से भाव में अच् प्रत्यय करके 'संश्रयः' यह रूप बनता है, यहां 'तुमर्थाच्च भाववचनात्' से चतुर्थी हुई है ।
अलंकार—यहाँ अर्थान्तरन्यास एवं अर्थापत्ति इन दोनों अलंकारों के अङ्गाङ्गिभाव होने से 'सङ्कर' नामक अलङ्कार है ॥ १७ ॥
छन्नोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रैः स्त्वय्यारूढे शिखरमचलः स्निग्धवेणीसवर्णे ।