मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ५३
सर्गपूर्वक "दा" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान पर ल्यप् करके उक्त रूप निष्पन्न होता है। गच्छेः—यहाँ "विधिनिमन्त्रणामन्त्रणादि" सूत्र से विधि में लिङ् है। तुलयितुम्—यहां "तुल" धातु से "तत्करोति तदाचष्टे" इस सूत्र से "णिच्" प्रत्यय करके पश्चात् "समानकर्तृकेषु तुमुन्" इस सूत्र से "तुमुन्" प्रत्यय किया गया है। शक्ष्यति—'शक्' धातु के लृट् लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का रूप है। (शक् + स्य + ति)। प्रस्तुत श्लोक का महोपाध्याय मल्लिनाथजी ने एक दूसरा भी अर्थ निकाला है, जैसे कि आयुर्वेद-शास्त्रानुसार वमन के बाद मानव को कसैला, हल्का और चरपरा जल पीना चाहिए ताकि वायुविकार न होवे, इसलिए हे मेघ ! तुम जल वमन करने के पश्चात् सुगन्धित एवं जामुन के कुञ्ज में रुके हुए प्रवाह के कारण कसैला नर्मदा का जल पीकर जाना, तब तुम्हें पवन नहीं हिला सकेगा, अन्यथा वमन के कारण भीतर से निःसार तुम्हें पवन हिला देगा, क्योंकि भीतर से शून्य सभी हल्के होते हैं, पूर्णता ही गौरव के लिए होती है।
अलङ्कारः—यहाँ तृतीयचरण के विशेष अर्थ का समर्थन चतुर्थचरण के सामान्य अर्थ से किया गया है, अतः यहाँ "अर्थान्तरन्यास" नामक अलङ्कार है॥ २०॥
नीपं दृष्ट्वा हरितकपिशं केसरैरर्धरूढै- राविर्भूत-प्रथम-मुकुलाः कन्दलीश्चानुकच्छम्। जग्ध्वाऽरण्येष्वधिकसुरभिं गन्धमाघ्राय चोर्व्याः सारङ्गास्ते जललवमुचः सूचयिष्यन्ति मार्गम्॥२१॥
अन्वयः—अर्धरूढैः केसरैः हरितकपिशम् नीपम् दृष्ट्वा अनुकच्छम् आविर्भूतप्रथममुकुलाः कन्दलीः च जग्ध्वा अरण्येषु उर्व्याः अधिकं सुरभिम् गन्धम्, च आघ्राय सारंगाः जललवमुचः ते मार्गम् सूचयिष्यन्ति।
व्याख्या—(हे मेघ!) अर्धरूढैः = अर्धोत्पन्नैः, केसरैः = किञ्जल्कैः, हरितकपिशम् = हरिद्धूसरम्, नीपम् = कदम्बम्, दृष्ट्वा = विलोक्य, अनुकच्छम् =