मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ५५
कोशः—पलाशो हरितो हरित् । श्यावः स्यात् कपिशो धूम्रधूमिलो कृष्णलोहिते, इत्यमरः । अथ स्थलकदम्बके । नीपः स्यात्पुलके, इति शब्दार्णवः । जलप्रायमनूपं स्यात्पुंसि कच्छस्तथाविधः, इत्यमरः । कुड्मलो मुकुलोऽस्त्रियाम्, इत्यमरः । द्रोणपर्णी स्निग्ध-कन्दा कन्दली भूकदल्पपि, इति शब्दार्णवः । सारंगश्चातके भृङ्गे कुरङ्गे च मतङ्गजे, इति विश्वः ।
टिप्पणी—सारङ्गाः—साराण्यंगानि येषां ते सारङ्गाः ऐसा समास किया जाता है, परन्तु यहाँ सवर्ण दीर्घ न होकर शकन्ध्वादि गण में पाठ होने के कारण "शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्" इससे पररूप होकर "सारंग" शब्द सिद्ध होता है । "सारंगः पशुपक्षिणोः" इसके अनुसार सारंग शब्द का अर्थ हाथी, हिरण, भौंरा, चातक आदि किया जाता है । जग्ध्वारण्येष्वधिक०—इसके स्थान पर कोई-कोई टीकाकार "दग्ध्वारण्येष्वधिकसुरभिम्" ऐसा पाठ मानते हैं । इस विषय में उनका कहना है कि इस श्लोक में दो बार ही केवल "च" शब्द का प्रयोग किया गया है, एक दूसरे पाद में तथा दूसरा, तीसरे पाद में । पहला च नीपं और आघ्राय को जोड़ता है । ऐसी दशा में यदि जग्ध्वारण्ये० को शुद्ध पाठ माना जाय तो दृष्ट्वा, जग्ध्वा, और आघ्राय तीनों एक ही साथ आ जाते हैं एवं उनको जोड़ने वाला केवल दो च ही रह जाते हैं तथा जग्ध्वा का कर्म इससे बहुत दूर हो जाता है । परन्तु उचित तो "जग्ध्वारण्ये०" आदि पाठ ही है क्योंकि कवि ने यहाँ सारंग शब्द का प्रयोग इसलिए किया है कि उसके तीन कर्ता अभिप्रेत हैं हाथी, भौंरे और हरिण इसलिए पूर्वकालिक क्रियाएँ भी तीन रहनी चाहिए, एक मूल क्रिया है और दो क्रियाओं के जोड़ने के लिए दो "च" का रहना उचित है ।
अलङ्कार—यहाँ वृष्टि का अनुमान किया गया है इसलिए यहाँ अनुमानालंकार है ॥ २१ ॥
अम्भोबिन्दुग्रहणचतुरांश्चातकान् वीक्षमाणाः श्रेणीभूताः परिगणनया निर्दिशन्तो बलाकाः । त्वामासाद्य स्तनितसमये मानयिष्यन्ति सिद्धाः सोत्कम्पानि प्रियसहचरीसम्भ्रमालिङ्गितानि ॥ २२ ॥