भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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१२२ मीमांसादर्शनम् [ सू० न्या० सु०—अनेन सूत्रेण यासौ गर्गत्रिरात्र=वेदानुमन्त्रणविद्या मुखशोभा=वाजिजन्म- हेतुत्वेनोक्ता, सा गर्गत्रिरात्रवेदानुमन्त्रणयोः प्रशंसेत्युच्यत इति गर्गत्रिरात्रविधेरित्यादिना भाष्येणोक्तम् । तत्र विद्यायाः केनचित्पारार्थ्यानवगमात्तद्विषयफलश्रुतेः कथं प्रशंसार्थ- तेत्याशङ्कानिराकरणपूर्वकं फलाभावसूत्रोक्तमनुपलब्धिविरोधं निराकरोति—अध्ययने- नेति । अध्ययनविधिना ज्ञानस्याध्ययनफलत्वं वदता निष्प्रयोजनस्य फलत्वायोगात् कैमध्यपेक्षायां सामर्थ्यात्कर्मानुष्ठानयोग्यपुरुषोपकरणार्थत्वेन तच्छेषावगमादित्यर्थः । स्वयं मुख्यया वृत्त्या मुखशोभा-वाजिमत्त्वानुवादमुपपाद्य, अधुना भाष्योक्तं गौणत्व- मनुसरति—अथापीति । स्तुतिपरत्वादित्यनेन सूत्रोक्तस्य प्रशंसाथंत्वस्यानुपलब्धिविरोध- परिहारार्थत्वं दर्शितम् । घृतवन्तं कुलायिनं रायस्पोषं सहस्रिणं वेदो ददातु वाजिन- मित्यह । प्रसहस्रं पशूनामाप्नोति, प्रजायां वाजी जायते य एवं वेदेत्यत्र यज्ञपतिप्रथन- वत् मन्त्राभिधानस्यार्थवादा लम्बनत्वसम्भवेऽपि मन्त्राभिधानेऽप्या लम्बनाकाङ्क्षानिवृत्त्यर्थं कुले सन्तताध्ययनश्रवणादित्युकम् ॥ १५ ॥ भा० प्र०—पूर्वपक्षी दृष्टविरोध प्रदर्शन प्रसङ्ग में “शोभतेऽस्य मुखं य एवं वेद" (ता० म० ब्रा० १।२।२५) इस अर्थवाद वाक्य को फलहीन सिद्ध किया है। इसकी असङ्गति प्रदर्शित करते हुए जैमिनि ने “विद्याप्रशंसा” इस सूत्र को लिखा है। पूर्वोक्त अर्थवाद की फलहीनता का प्रदर्शन सङ्गत नहीं है। क्योंकि, यह गर्गत्रिरात्र विधि का शेष वाक्य है; इसके द्वारा उसी विधि की प्रशंसा की गई है। संसार में ऐसा देखा जाता है कान के अलङ्कारों से मुख शोभायमान होता है। शिष्यगण विद्वान् व्यक्ति का मुख उत्साह सम्पन्न होने से कर्नालङ्कार के विना केवल साधु पदों के उच्चारण से ही शोभायमान देखते हैं। जिस विषय का ज्ञान ही शोभा का साधन होगा; उस विषय का अनुष्ठान और भी शोभा का हेतु होगा। इस तरह विधि विहित कर्मों की ही प्रशंसा इस अर्थवाद से की गई है। इसी प्रकार “आस्य (आ अस्य) प्रजायां वाजी जायेत; य एवं वेद" यह अर्थवाद वाक्य भी वेदानुमन्त्रण विधि का शेष है। जिस घर पर सदा अध्ययन आदि चलता रहता है, उस घर में जिस पुत्र का जन्म होता है, वह भी बाल्यावस्था से शास्त्रालाप सुनकर स्वभावतः मेधावी एवं विद्वान् हो जाता है, और विद्वान् होने पर सभी व्यक्ति उसको सत्पात्र गुणी समझकर दान देता है। अधिक दान मिलने पर वह प्रचुर अन्न प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार गुण को लक्ष्य करके ही कहा गया है—“वाजी जायते"। विद्याप्रशंसा = विद्या की प्रशंसा । इसका मुख शोभायमान होता है इत्यादि वाक्य में जो कहा गया है, वह विद्या की प्रशंसा है ॥ १५ ॥