मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५० मीमांसादर्शनम् [ सू० रहितस्य श्रेयःसाधनत्वबोधासामर्थ्यं तस्माच्छब्देन परामृष्टं फलाभावसूत्रोक्तानुपलब्धि- विरोधो वर्त्तमानफलाभिधायित्वादित्यनेन । चतुर्थे चेति प्रस्तुतसाधनांशनिराकरणहेतुत्वेन साध्यांशनिराकरणं वक्ष्यमाणमुक्तं सर्वेभ्यो दर्शपूर्णमासावित्यादौ चतुर्थ्या फलसमर्पकतद्वाभ्यु- पगमात्समाभिव्याहारमात्रस्य फलसपंकत्वनिराकरणपरमेवं कामशब्दरहितस्येति व्याख्ये- यम् । प्रधानफलमेवेदमित्यनेन फलकीर्त्तनालम्बनं दर्शितम् । सौमा पौष्णं त्रैतमालभेत पशुकाम इति पशूनामदनीयत्वेनोर्क शब्दवाच्यन्न रूपाणां प्रधानफलत्वादङ्गे पूर्णाहुतिवदुपचारः । न पूर्वत्वादिति सूत्रं द्वितीयवर्णकोक्तस्य विसम्वाद- स्यानुभाषणं पूर्वं निराकरणार्थम् । ननूक्तमित्यादिभाष्यं व्याचष्टे-सर्वत्र चेति । गुणवादेनेति गुणशब्देन फलसङ्कीर्त्तने सम्वादाभिधाने तावदङ्गे प्रधानगामिनि तत्फलोपचारोऽभिमतः । पूर्णाहुतिन्यायेनोक्तप्रायत्वान्नहेह भाष्यकृतोक्तः । पक्षधर्म्मान्वयकीर्त्तनसम्वादाभिधाने त्वग्निमाणवकवत्साहृश्यं गुणशब्देनाभिप्रेतम् । तत्र किं सादृश्यमित्यादिप्रश्नपूर्वकं सादृश्य- प्रतिपादनार्थं भाष्यं व्याचष्टे-- साधनत्वेऽपि चेति । साधनशब्देन हेतुत्वमुक्तम् । अन्नगतेन प्रीतिसाधनत्वेन तद्विशेषतृप्तिसाधनत्वेन वा गुणेनोदुम्बरेऽन्नशब्दाभिधेयत्वसम्भवात्साधनेऽपि सम्वाद इत्यर्थः । प्रीतिसाधनत्वमप्योदुम्बरवृक्षस्याभक्ष्यत्वा न्नास्तीत्याशङ्क्य प्रीतिसाधनौ- दुम्बरफलोत्पादनशक्तियुक्तं वृक्षं प्रशंसितुमुपचारात्प्रशंसावाचिना प्रीतिसाधनशब्देनोच्यते इत्युक्तम् । अनेन च नात्र यद्यदन्नम्, स स यूप इत्यन्वयवाक्यं कल्प्यते किं तु यद्यदन्नम्, तत्तत्प्रशस्तमित्येवम्, तच्च प्रसिद्धमेवेति सूचितम् ॥ २२ ॥ भा० प्र०—विधि के साथ एकवाक्यता सम्पन्न होकर ही विधेय विषय की प्रशंसा के द्वारा अर्थवाद सार्थक होता है—यह पूर्व में ही कहा गया है । इस स्थल में भी यही स्थिति है । ‘उर्कं उदम्बरः’ यह अंश अर्थवाद है । अवशिष्ट अंश इस अर्थवाद की ही उपपत्ति अर्थात् युक्ति है । ‘उर्कं उदुम्बरः’ यह उक्ति भी गुणवाद होने से सभी वाक्य लक्षणा के बल से उदुम्बरत्वविधि की स्थापक है । पूर्वपक्षी का यह कथन कि अन्न सम्पादन उदुम्बरत्व रूप गुण का फल है—यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि, क्रिया के बिना केवल गुण फलवान् नहीं हो सकता है । प्रकृत में कोई ऐसी विधि भी नहीं है, अन्न जिसका फल होगा । ‘उदुम्बरो यूपो भवति’ इसको विधि नहीं कहा सकता है, क्योंकि, इसमें लिङ् आदि विधि विभक्ति नहीं है । विधि की कल्पना करने पर अर्थवाद के द्वारा ही विधि की कल्पना होने से इस वाक्य को अर्थवाद मानना ही होगा । इस स्थल में प्रकरणवश उदुम्बरता विधि है और उसमें अर्थवाद अन्वित होता है । उक्तं=कथित होता है । ‘तु’=किन्तु । पूर्वपक्ष के निराश के लिए “विधिशेषत्वम्”= विधिशेषत्व । अर्थवाद विधिवाक्य का शेष या अङ्ग है एवं विधिवाक्यों की स्तुति के द्वारा ही वे सार्थक होते हैं, यह कहा गया है ॥ २२ ॥