भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 804 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

३१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १७९ है, क्योंकि, पाकशाला में अग्नि प्रज्वलित है, इसलिए मेरा गृह तप्त हो गया है, यह कहने पर अग्नि की ही दाहकता सिद्ध होती है। उसी तरह प्रकृत में भी हेतु के द्वारा शूर्प की ही होम के प्रति साधनता कही गई है। 'शूर्पेण' इस पद में तृतीया विभक्ति से बोधित करणत्वसामान्य के द्वारा दर्वी, स्थाली आदि की उपस्थिति करने पर अन्य किसी वस्तु की होम साधन की कल्पना का प्रसङ्ग ही नहीं उठता है। क्योंकि किञ्चिन्निरूपिता हेतुता प्रायः सभी वस्तुओं में है। अनुमान के द्वारा दर्वी आदि की उपस्थिति करने पर भी "शूर्पेण' इस पद के द्वारा प्रत्यक्ष तृतीया श्रुति से बोधित शूर्प अपेक्षाकृत दुर्बल होने से उसके साथ शूर्प का विकल्प नहीं हो सकता है। अतः "तेन हि अन्नं क्रियते" इत्यादि हेतु के समान प्रतीयमान वाक्य हेतुविधि नहीं है वरन् अर्थवाद मात्र ही है। 'यदि' = यदि, 'च' = और, "हेतुः" = हेतुविधि के रूप में "निर्देशात्" = तथापि शूर्प का विशेषरूप में उल्लेख होने से, 'अवतिष्ठते' = शूर्प की ही हेतुता अवस्थित है। सामान्यात् इति चेत् = यदि कहा जाय, 'इति चेत्' = कहा जाय, [तृतीया विभक्ति होने से करणत्वसामान्य हेतु दर्वी स्थाली आदि ही ग्रहणीय होगा] 'अव्यवस्था' = अनियम, "विधीनां" विधियों की, 'स्यात्' = होगी। और यदि यह हेतुविधि ही रहती है, तथापि पूर्व की ही हेतुता व्यवस्थित है, क्योंकि उसी का निर्देश अर्थात् विशेष रूप से उल्लेख है। यदि 'शूर्पेण' इस तृतीया विभक्ति के द्वारा करण सामान्य विवक्षित होने से दर्वी, स्थाली आदि का भी हेतुत्व ग्रहण के योग्य है, यह मानने पर विधि की व्यवस्था नहीं होगी ॥ ३० ॥ अथ चतुर्थं मन्त्राधिकरणम् (४) तदर्थशास्त्रात् । शा० भा० — अथेदानों कि विवक्षितवचना मन्त्राः, उताविवक्षितवचनाः । किम्, अर्थप्रकाशनेन यागस्योपकुर्वन्ति, उतोच्चारणमात्रेणेति । यद्युच्चारण- मात्रेण, तदा न नियोगता बर्हिर्देवसदनं दामि (मै० सं० १।१।२) इत्येष बर्हिर्लवने विनियुज्येत । अभिधानेन चेत्, प्रकरणेन निर्ज्ञाताङ्गभावो नान्यत्रोपकर्तुं शक्नो तीत्यन्तरेणापि वचनम्, बर्हिर्लवन एव विनियुज्येतेति । तदेवमवगच्छामः । उच्चारणामात्रेणैवोपकुर्वन्तीति । कुतः ? तदर्थशास्त्रात् । यदभिधानसमर्थो मन्त्रः तत्रैवैनं शास्त्रं निबध्नाति । उरुप्रथा उरु प्रथस्वेति (वा० सं० १।२२, तै० सं० १।१।८।१) पुरोडाशं प्रथयतीति (तै० ब्रा० ३।२।४) वचनमिदमनर्थकं यद्यर्थाभिधानेनोपकुर्वन्ति । अथोच्चारणमात्रेण, ततो वक्तव्यो