भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२१६ मीमांसादर्शनम् [ सू० १—श्रुतार्थ त्यागः—श्रुत अर्थात् वाक्य प्राप्त गर्दभरशना-ग्रहणरूप अर्थ का परि- त्याग करना होगा। २—अश्रुत अर्थ की कल्पना—गर्दभरशना ग्रहणत्यागरूप अश्रुत अर्थ की कल्पना करनी होगी। ३—प्राप्तबाध—प्रकरण या लिङ्ग अर्थात् सामर्थ्यवश प्राप्त गर्दभरशना का बाध करना होगा। अश्वरशना के समान गर्दभरशना भी प्रकरण या लिङ्ग के अनुसार ग्रह- णीय होता है, किन्तु, परिसंख्या के द्वारा बाधित होकर अश्वरशना के ग्रहण में ही पर्यवसित होता है, इस प्रकार तीन दोषों की प्रसक्ति होती है। पूर्वपक्षी ने परिसंख्या में इन तीन दोषों का उद्भावन किया है। किन्तु, ये दोष सङ्गत नहीं हैं। कारण, प्राप्त विषय का बाध होने पर ही उक्त तीन दोषों की सम्भावना होती। किन्तु, इस स्थल में प्रकरण या लिङ्गवश गर्दभरशना की प्राप्ति से पूर्व ही प्रत्यक्ष श्रुति के आधार पर अश्वरशना ग्रहण बोधित है, अतः, प्राप्तार्थ का बाध नहीं होता है। क्योंकि, प्रकरण या लिङ्ग स्वयं विनियोजक नहीं होता है, प्रकरण के द्वारा वाक्य, वाक्य के द्वारा लिङ्ग या सामर्थ्य एवं सामर्थ्य के द्वारा विधायिका श्रुति अनुमित होती है। "इत्य- श्वाभिधानीम्" इस स्थल में प्रत्यक्ष श्रुति ही अश्वरशना के ग्रहण का विधान करती है। प्रत्यक्ष श्रुति की अपेक्षा लिङ्ग या प्रकरण परवर्ती है, उसके द्वारा प्रत्यक्ष श्रुति के द्वारा किसी पदार्थ के प्राप्त होने के बाद ही अन्य पदार्थ की प्राप्ति होती है। जिस समय प्रत्यक्ष श्रुति के द्वारा किसी पदार्थ का विधान होता है, उस समय लिङ्ग आदि के द्वारा विहित पदार्थ की प्राप्ति की उपस्थिति न होने से उसके बाध का प्रश्न ही नहीं उठता है। अनुपस्थिति का बाध कैसे सम्भव है ? प्राप्त अर्थ का बाध न होने पर निषेध रूप पदार्थ की कल्पना एवं विधि के स्वार्थ त्याग का भी प्रश्न नहीं है। इस दृष्टि से मीमांसकों ने स्वीकार किया है कि प्राप्त परिसंख्या में ही तीन दोषों का प्रसङ्ग होता है, अप्राप्त परिसंख्या दोष शून्य है। अतः, त्रिविध दोषों में एक दोष भी यहाँ सम्भावित नहीं है। फलतः, परिसंख्या के कारण इस स्थल में पुनरुल्लेख नहीं है। 'परिसंख्या' = अन्य निवृत्ति। 'इत्यश्वाभिधानीमादत्ते' इत्यादि स्थल में परिसंख्या अर्थात् अन्य की निवृत्ति के लिए ही ब्राह्मणवाक्य कहा गया है। आशय यह है कि "इमामगृभ्णन् रशनामृतस्य" (वा० सं० २२।२) 'इत्यश्वा- भिधानीमादत्ते' इस मन्त्र के सामर्थ्य से ही प्राप्त रशनादान का ब्राह्मणवाक्य विनियोजक है, इसका पुनः कथन व्यर्थ है। 'गर्दभामिधानीमादत्ते' यह परिसंख्या है। परिसंख्या में तीन दोष हैं—आदत्ते यह रशनादान रूप स्वार्थ का परित्याग करेगा, गर्दभरशना के आदान का निषेध रूप अन्य अर्थ की शब्द से कल्पना करनी पड़ेगी, रशनात्व सामान्य के आदान से गर्दभरशना और अश्वरशना इन दोनों के आदान की प्राप्ति होने से गर्दभ-