भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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४५ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपाद। १४१ आ० प्र०—ऊहः = पद का अध्याहार मन्त्र का अर्थ विवक्षित है—इसका ज्ञापक है। आशय यह है—मन्त्र का अर्थ विवक्षित है, इसका कारण 'ऊह' है। प्रकृतिभूत कर्म में जो मन्त्र पढ़े गये हैं, विकृतिभूत कर्म में भी स्थल विशेष में उसी मन्त्र के पद की विभक्ति, वचन आदि का परिवर्तन कर पाठ किया गया है। क्योंकि, प्रकृति के अनुरूप पाठ करने पर वह मन्त्र विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादन करेगा। जैसे प्रकृतिभूत एक पशु से सम्पन्न होने वाले यज्ञ में पशु के संस्कार के समय में "अन्वेनं माता मन्यता- मनु पिता नु भ्राता" (मै० सं० ४।१३।४) अर्थात् इसकी माता इसको अनुमति दे, इसका पिता एवं भाई अनुमति दे । किन्तु विकृतिभूत अनेक पशुओं से साध्य याग में 'एनम्' के स्थान पर एनौ पद 'एनान्' पद देकर अन्वेनम् के स्थान पर 'अन्वेनौ' अन्वे- नान् करना पड़ेगा। यह परिवर्तन करना ही ऊह है। यह " न पिता वर्द्धते, न माता", इस ब्राह्मण वाक्य से निर्णय होता है। क्योंकि, यह ब्राह्मणवाक्य माता पिता आदि की वृद्धि अर्थात् इन पदों के आगे द्विवचन और बहुवचन के प्रयोग का निषेध करता है। अतः, अवशिष्ट 'एनम्' इस पद में द्विवचन और बहुवचन के प्रयोग की सूचना देता है। यदि मन्त्र का अर्थ विवक्षित न होता तो 'एनम्' आदि में 'ऊह' का कोई प्रयोजन ही नहीं रहता, किन्तु मन्त्र का अर्थ विवक्षित है, इसलिए विकृति स्थल में ऊह किये विना मन्त्र विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादक होगा, अतः विकृति में परिवर्तन (ऊह) आवश्यक है। ऐसा मानने पर मन्त्र क्रिया-समवेत अर्थ का प्रकाशक होता है, इसलिए बाधा न होने पर मन्त्र का स्वार्थ अविवक्षित नहीं हो सकता है। ऊह कहाँ-कहाँ कर्तव्य है, इसका विशेष विचार नवम अध्याय में किया गया है ॥ ४४ ॥ विधिशब्दाश्च ॥ १.२.४५ ॥ शा० भा०—विधिशब्दाश्च विवक्षितार्थानिव मन्त्राननुवदन्ति । शतं हिमाः शतं वर्षाणि जीव्यासमित्येतदेवाऽऽहेति सिद्धान्ते युक्तिः । मन्त्राधिकरणम् ॥४५॥ इति श्रीशबरस्वामिकृतौ मीमांसाभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः । भा० वि०—विधिशब्दाश्चेत्येतदपि तदर्थवदिति पदानुषङ्गेण व्याचष्टे— विधिशब्दाश्चेति । ब्राह्मणमित्यर्थः, कोऽसौ विधिशब्द इत्यपेक्षायां हिमाशब्द- व्याख्यानपरं ब्राह्मणमुदाहरति—शतमिति । तस्माद्विवक्षितवचना मन्त्रा इति सिद्धमिति भावः ॥ ४५ ॥ ॥ इति श्रीमन्नारायणामृतपूज्यपादशिष्यदेवेन्द्रसरस्वत्युपनामधेय- श्रीगोविन्दामृतमुनिविरचिते धर्ममीमांसाभाष्यविवरणे प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ १।२ ॥ १६