भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२४२ मीमांसादर्शनम् [ सू० त० वा०—विधिरेव च ब्राह्मणाभिधः तत्र तत्र पर्यायैरवयवान्वाख्यान- निर्वचनादिभिश्चार्थप्रकाशनपरत्वं दर्शयति । अर्थनाश्रयणे हि सर्वं तदनर्थकं स्यात् । तस्माद्विवक्षितवचना मन्त्रा इति सिद्धम् ॥ ४५ ॥ इति मन्त्राधिकरणम् ॥ ४ ॥ इति श्रीमद्भट्टकुमारिलस्वामिविरचिते धर्ममीमांसाभाष्यव्याख्याने तन्त्रवार्तिके प्रथमस्याध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ न्या० सु०--भाष्यकारेण विधिशब्दश्च तदर्थवदिति पूर्वसूत्रगतपदानुषङ्गेण सूत्रं व्याख्याय 'शतं हिमा' इति मन्त्रगतहिमाशब्दव्याख्यानार्थं 'शतं वर्षाणी'त्यर्थवाद उदाहृतः । तत्र विधिशब्दानुपपत्तिमाशङ्क्याह—विधिरेवेति । सिद्धान्तमुपसंहरति— तस्मादिति ॥ ४५ ॥ ॥ इति श्रीमत्त्रिकाण्डमीमांसामण्डनप्रतिवसन्तसोमयाजिमाधवभट्टात्मज भट्टसोमेश्वर- विरचितायां सर्वनिवद्यकारिण्यां न्यायसुधाख्यायां तन्त्रवार्तिकटीकायां प्रथमस्याध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः ॥ भा० प्र०—विधिशब्दाः = विधिको अर्थात् ब्राह्मण का शब्द अर्थात् मन्त्रार्थ का व्याख्यारूप शब्द, 'च' एव है, ब्राह्मण वाक्य में मन्त्र की व्याख्या है, इसलिए, मन्त्र का अर्थ विवक्षित है । आशय यह है कि विधिशब्दाश्च इस हेतु के द्वारा मन्त्र का अर्थ विवक्षित है—यह कहा गया है । मन्त्र की व्याख्या रूप में ब्राह्मण में स्थित शब्द ही विधि शब्द है । जैसे “शतं हिमाः शतं वर्षाणि जीवामसम इत्येव एतदाह" (श० ब्रा० २।३।४।२१) इत्यादि । इस स्थल में 'शतं हिमाः' इस मन्त्र का अर्थ ब्राह्मण ग्रन्थ में भी कहा गया है—"शतं वर्षाणि" । अतः इन कारणों के विद्यमान रहने से यह मानना ही पड़ेगा कि कर्म के समय मन्त्र का अर्थ विवक्षित है ॥ ४५ ॥ ॥ इति मीमांसादर्शन की भावप्रकाशिका में मन्त्राधिकरण नामक प्रथमाध्याय का द्वितीय पाद समाप्त हुआ ॥