मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३५५ प्रमाण है और कहाँ अप्रमाण है । स्मृतियों में कहा गया है कि "क्षुत आचमेत", "आचान्तेन कर्तव्यम्", एक शास्त्रोक्त कर्म के करने के बाद दूसरे कर्म को करने से पूर्व यदि क्षुत् (छींक) होने पर आचमन करना चाहिये अर्थात् आचमन पूर्वक कर्म करना चाहिए । श्रुति में कहा गया है कि "वेदं कृत्वा वेदिं करोति" वेद अर्थात् कुश के गुच्छे से निर्मित सम्मार्जनी कर वेदि = आहवनीय एवं गार्हपत्य इन दो अग्नियों के मध्य में चार अङ्गुल परिमाण भूमि में गड्ढा करे इस स्थल में वेद करने के बाद यदि छींक हो तब स्मृति से विहित आचमन का अनुष्ठान करे और इसके बाद वेदि करे या आचमन किए विना ही वेदि का निर्माण करे ? इस प्रकार के संशय होने पर सिद्धान्ती यदि यह कहते हैं कि प्रकृत में जब श्रुति के साथ स्मृति का विरोध नहीं है, तब स्मृति के वचन से श्रुति वचन का व्याकोप या बाधा नहीं है, अतः स्मृति से उपदिष्ट वचन अविरुद्ध या प्रमाण होने से अनुष्ठेय है, किन्तु यह सङ्गत नहीं है, क्योंकि, "वेदं कृत्वा वेदिं करोति", इस स्थल में श्रुति में प्रयुक्त कृत्वोपद में 'क्त्वा', प्रत्यय से आनन्तर्य अर्थ का बोध हो रहा है । अतः वेद के बाद वेदि का निर्माण करना होगा—यही वेदवचन के द्वारा अर्थ अवगत हो रहा है, किन्तु स्मृति वचन के अनुसार यदि वेद करने के बाद आचमन करके अनन्तर वेदि किया जाय तो श्रुति के द्वारा कथित आनन्तर्य क्रम का बाध होगा । इसलिए श्रौतक्रम का विरोध होने से स्मृति के द्वारा प्रतिपादित आचमन कर्तव्य नहीं है, क्योंकि स्मृति की अपेक्षा श्रुति बलवती होती है । यही पूर्वपक्षियों का आशय है । इसी प्रकार "दक्षिणाचारेण कर्तव्यम्" दक्षिण हस्त से ही शास्त्रोक्त कर्म करे, यह स्मृति वचन श्रौत काल के साथ विरुद्ध होने से अनादरणीय है, क्योंकि, श्रुति में पूर्वाह्ण आदि काल नियमित है, किन्तु केवल दक्षिण हस्त से कर्म का अनुष्ठान किया जाय तो पूर्वाह्ण आदि श्रौतकाल के मध्य में कर्म का समापन नहीं होगा, अतः, दोनों हाथ से शास्त्रीय कर्मों का सम्पादन करना उचित है । क्योंकि; ऐसा करने से अतिशीघ्र कर्म का सम्पादन होने से श्रौतकाल का अतिक्रमण नहीं होगा । परिमाण के सम्बन्ध में इसी प्रकार समझना चाहिये । अत एव श्रुति संबोधित पदार्थ के = कर्म के समान श्रौत क्रम काल एवं परिमाण आदि के साथ विरोध होने पर भी स्मृति विहित कर्म अनुष्ठेय नहीं है ॥ ६ ॥ यह पूर्व पक्ष है । अपि वा कारणाग्रहणे प्रयुक्तानि प्रतीयेरन् ॥७॥ सि० शा० भा०—अपि वेति पक्षव्यावृत्तिः । अगृह्यमाणकारणा एवंजातीयकाः प्रमाणम् । ननु क्रमकालौ विरुन्धन्ति ? विरुन्धन्तु । नैष दोषः । आचमनं पदार्थः, पदार्थानाञ्च गुणः क्रमः । न च गुणानुरोधेन पदार्थो न कर्तव्यो भवति । अपि च प्राप्तानां पदार्थानामुत्तरकालं क्रम आपतति । यदा पदार्थः प्राप्नोति, तदा क्रम