भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 804 में से

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४९० मीमांसादर्शनम् [ सू० यद्यपि तावदाख्यातप्रत्ययः कर्तृशक्तिम्, तदाधारद्रव्यमात्रं वा वदेत्, तथापि ब्राह्मणो यजमान इतिवदुपपदाधीनविशेषावस्थानात्तदधीनजात्यादिवृत्तित्वमनु- रुध्यमानो न स्वगतव्यक्त्याकृतिवचनत्वविचाराधीनाधिकारित्वनिर्णयः स्यात्, किमुत यदा कर्त्रभिधाननिरपेक्षविधिर्भावनामात्रवाचित्वेवावस्थाप्यते । यदि चैतावन्मात्रमेव सर्वधर्मत्वकारणं भवेत् । ततो राजसूयाश्वमेधवैश्य- स्तोमादीनामप्येवमात्मकाख्यातप्रत्ययविधेयत्वविशेषात्सर्वधर्मत्वप्रसङ्गः । अथ तेषामनिर्देश्यार्थप्रत्ययविहितानामपि राजाद्युपपदवशादसर्वधर्मत्वम् । एवमत्रा- प्यसर्वधर्मत्ववादिना तदेवोपन्यसनीयम् । सर्वधर्मत्ववादिना च निराकर्तव्यम् । तच्चाऽऽचारानुरूपव्यक्त्याकृतिवचनत्वासंभवात्सामर्थ्यलभ्यमनुष्याकृतिमात्राधि- कारप्रतिपत्तेर्वा निराकृतमेव । तद्यथा चोत्तरसूत्राणि “लिङ्गाभावाच्च नित्यस्याऽऽख्या हि देशसंयोगात्” इत्येवमादीन्युपपदोपन्यासप्रत्याख्यानार्थानि संगंस्यन्ते । तस्मात्सर्वाधिकारन्या- यत्वाद्विधानस्य व्यवस्थितदेशाचार-गृह्यधर्मसूत्रनिबद्धधर्माणामपि सर्वधर्म- त्वम् ॥ १६ ॥ भा० प्र० -- प्रदर्शित पूर्वपक्ष के समाधान के लिए सिद्धान्त पक्ष की अवतारणा इस सूत्र से की जाती है । होलाकादि आचार देशविशेष से निबद्ध नहीं है वरन् सभी लोग इसे कर सकते हैं क्योंकि श्रुति के द्वारा यह स्थल विशेष में, सम्प्रदाय विशेष में कर्तव्य के रूप में उपदिष्ट है, ऐसी कल्पना या अनुमान नहीं किया जा सकता है । क्योंकि इसकी सर्वधर्मता के अनुकूल न्याय या तर्क उपलब्ध है । जितने भी व्यक्ति हैं वे होलाका आदि के अनुष्ठान करने में समर्थ हैं, जिसके द्वारा विवक्षित अर्थ नीत = प्रकाशित होता है उसको न्याय कहा जाता है जैसे— धूम को देखने के बाद वह्नि का अनुमान होता है । धूम यदि वह्नि से जन्य नहीं होता तो उसका अनुमान हो सकता । इस प्रकार का तर्क अनुमिति का पोषक है, वैसे ही इस स्थल में भी आचार की मूलभूत जिस श्रुति का अनुमान होता है, वह यदि पूर्व देश आदि विशेषण से विशिष्ट न हो तो कोई हानि नहीं है । इस प्रकार के तर्क के रहने से होलाका आदि आचारों को विशेषदेश से सम्बद्ध कर श्रुति का अनुमान नहीं किया जा सकता है । पूर्वपक्षियों ने यह आशंका की थी कि राजसूय आदि यज्ञों में क्षत्रियत्व आदि जाति अधिकारी का विशेषण होता है, अतः इस प्रकार के दृष्टान्त के अनुसार प्रकृत में भी देश विशेषण का रहना ठीक है, किन्तु उनके द्वारा प्रदर्शित यह दृष्टान्त ठीक नहीं है । क्योंकि प्राच्यत्व दाक्षिणात्यत्व ऐसी कोई जाति नहीं है जो प्रतीच्य और उदीच्य व्यक्ति से पृथक् मानी जा सकती है । किन्तु मनुष्यत्व, ब्राह्मणत्व आदि जो जातियाँ हैं, वह प्राच्य प्रतीच्य आदि सभी स्थलों में समान ही हैं । इस प्रकार प्राच्यत्व आदि व्यक्ति

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