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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

सूत्र से की जाती है । होलाकादि आचार देशविशेष से निबद्ध नहीं है वरन् सभी लोग

४९० मीमांसादर्शनम् [ सू० यद्यपि तावदाख्यातप्रत्ययः कर्तृशक्तिम्, तदाधारद्रव्यमात्रं वा वदेत्, तथापि ब्राह्मणो यजमान इतिवदुपपदाधीनविशेषावस्थानात्तदधीनजात्यादिवृत्तित्वमनु- रुध्यमानो न स्वगतव्यक्त्याकृतिवचनत्वविचाराधीनाधिकारित्वनिर्णयः स्यात्, किमुत यदा कर्त्रभिधाननिरपेक्षविधिर्भावनामात्रवाचित्वेवावस्थाप्यते । यदि चैतावन्मात्रमेव सर्वधर्मत्वकारणं भवेत् । ततो राजसूयाश्वमेधवैश्य- स्तोमादीनामप्येवमात्मकाख्यातप्रत्ययविधेयत्वविशेषात्सर्वधर्मत्वप्रसङ्गः । अथ तेषामनिर्देश्यार्थप्रत्ययविहितानामपि राजाद्युपपदवशादसर्वधर्मत्वम् । एवमत्रा- प्यसर्वधर्मत्ववादिना तदेवोपन्यसनीयम् । सर्वधर्मत्ववादिना च निराकर्तव्यम् । तच्चाऽऽचारानुरूपव्यक्त्याकृतिवचनत्वासंभवात्सामर्थ्यलभ्यमनुष्याकृतिमात्राधि- कारप्रतिपत्तेर्वा निराकृतमेव । तद्यथा चोत्तरसूत्राणि “लिङ्गाभावाच्च नित्यस्याऽऽख्या हि देशसंयोगात्” इत्येवमादीन्युपपदोपन्यासप्रत्याख्यानार्थानि संगंस्यन्ते । तस्मात्सर्वाधिकारन्या- यत्वाद्विधानस्य व्यवस्थितदेशाचार-गृह्यधर्मसूत्रनिबद्धधर्माणामपि सर्वधर्म- त्वम् ॥ १६ ॥ भा० प्र० -- प्रदर्शित पूर्वपक्ष के समाधान के लिए सिद्धान्त पक्ष की अवतारणा इस सूत्र से की जाती है । होलाकादि आचार देशविशेष से निबद्ध नहीं है वरन् सभी लोग इसे कर सकते हैं क्योंकि श्रुति के द्वारा यह स्थल विशेष में, सम्प्रदाय विशेष में कर्तव्य के रूप में उपदिष्ट है, ऐसी कल्पना या अनुमान नहीं किया जा सकता है । क्योंकि इसकी सर्वधर्मता के अनुकूल न्याय या तर्क उपलब्ध है । जितने भी व्यक्ति हैं वे होलाका आदि के अनुष्ठान करने में समर्थ हैं, जिसके द्वारा विवक्षित अर्थ नीत = प्रकाशित होता है उसको न्याय कहा जाता है जैसे— धूम को देखने के बाद वह्नि का अनुमान होता है । धूम यदि वह्नि से जन्य नहीं होता तो उसका अनुमान हो सकता । इस प्रकार का तर्क अनुमिति का पोषक है, वैसे ही इस स्थल में भी आचार की मूलभूत जिस श्रुति का अनुमान होता है, वह यदि पूर्व देश आदि विशेषण से विशिष्ट न हो तो कोई हानि नहीं है । इस प्रकार के तर्क के रहने से होलाका आदि आचारों को विशेषदेश से सम्बद्ध कर श्रुति का अनुमान नहीं किया जा सकता है । पूर्वपक्षियों ने यह आशंका की थी कि राजसूय आदि यज्ञों में क्षत्रियत्व आदि जाति अधिकारी का विशेषण होता है, अतः इस प्रकार के दृष्टान्त के अनुसार प्रकृत में भी देश विशेषण का रहना ठीक है, किन्तु उनके द्वारा प्रदर्शित यह दृष्टान्त ठीक नहीं है । क्योंकि प्राच्यत्व दाक्षिणात्यत्व ऐसी कोई जाति नहीं है जो प्रतीच्य और उदीच्य व्यक्ति से पृथक् मानी जा सकती है । किन्तु मनुष्यत्व, ब्राह्मणत्व आदि जो जातियाँ हैं, वह प्राच्य प्रतीच्य आदि सभी स्थलों में समान ही हैं । इस प्रकार प्राच्यत्व आदि व्यक्ति

१७ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४५१ वाचक होने से वह देवदत्त के समान एक ही व्यक्ति को अवगत करायेगा । उस व्यक्ति को छोड़कर अन्य व्यक्ति की अवगति इससे नहीं हो सकती है । अतः वह अनेक व्यक्तियों के कर्तव्य के रूप में नहीं हो सकता है, अर्थात् अनेक व्यक्ति उसका आचारण नहीं कर सकेंगे । इसी लिए प्राच्यत्व और प्रतीच्यत्व व्यक्ति वाचक या आकृति वाचक नहीं हो सकता है । अतः विधायक शब्द भी तद्विशिष्ट रूप में आचार का विधान नहीं कर सकता है । अर्थात् प्राच्यत्व आदि अधिकारी का विशेषण नहीं हो सकता है । यह सत्य है कि राजसूय और वैश्यस्तोम आदि जगहों में राजत्व=क्षत्रियत्व या वैश्यत्व रूप जाति अधिकारी का विशेषण हो सकता है क्योंकि सभी क्षत्रियों और सभी वैश्यों में अनुगत रूप से क्षत्रियत्व और वैश्यत्व जाति अवस्थित है । अपि वा=यह पूर्वपक्ष के निरास के लिए है । सर्वधर्मं स्यात्=सभी का धर्म अर्थात् कर्तव्य होगा । विधानस्य=विधान का (जिसके द्वारा विहित होता है उसे विधान कहते हैं) विधायक शास्त्र का या मूलभूत अनुमेय श्रुति का, तन्न्यायत्वात्=क्योंकि वैसा न्याय अर्थात् प्राची आदि देश विशिष्टता भावरूप तर्क उपलब्ध है, होलाकादि आचार देश विशेष की सीमा से आबद्ध नहीं है, अपि तु वह सभी के लिए अनुष्ठेय है, क्योंकि श्रुति के अनुमान में देश विशिष्टाभाव रूप तर्क वर्तमान है । फलतः यह सभी का कर्तव्य हो सकता है ॥ १६ ॥ दर्शनाद्विनियोगः स्यात् ॥ १७ ॥ शा० भा०-गोत्रव्यवस्थया शिखाकल्पव्यवस्थायां दर्शनं स्पष्टम् ॥१७॥ उ०॥ भा० वि० - उत्तरत्वेन सूत्रमवतारयति-दर्शनादिति । तत्र दृष्टान्तवैषम्य- प्रदर्शनार्थं दर्शनादिति भागं व्याचष्टे-गोत्रेति । तत्र हि गोत्रादेरेकैकस्य व्यवस्थापकधर्मस्य दर्शनात् तद्गतस्य त्रिशिखत्वादेरपि व्यवस्थादर्शनं युक्तम् । न चैवमाचरितादीनां किञ्चिद्व्यवस्थापकमस्ति येन होलकादि व्यवतिष्ठेदेत्यर्थः । ततश्च तत्र गोत्रादिवाच्युपपदोपेतश्रुत्यनुमानात् कर्तृविशेषविनियोगः स्यात् अत्र तु कर्तृविशेषणासम्भवेन तद्वाच्युपपदासम्भवान्नोपपदयुक्तस्यापि श्रुत्या कर्तृ- विशेषविनियोगः सिद्ध्येदिति सूत्रशेषो व्याख्येयः ॥ १७ ॥ त० वा०-यत्तु¹ जातिकुलगोत्रधर्मवद्व्यवस्थितविध्यनुमानमिति ? तत्रैकशब्दवाच्यानां जात्यादीनां व्यवस्थया । दर्शनाद्विनियोगः स्यात्पञ्चावत्तादिधर्मवत् ॥ ६६३ १. यस्तु मु. पु. ४ यस्तु विध्यनुमानमभिमन्यते इत्यन्वयः ।

४९२ मीमांसादर्शनम् [ सू० यः तथैव पञ्चावत्तं तु भृगूणां वसिष्ठशुनकात्रिवध्यश्वकाण्वसंकृतिराजन्यानां नाराशंसो द्वितीयः प्रयाजः तनूनपादन्येषामित्यन्वयतो व्यतिरेकतश्चोपलक्षणसंभ- वाद्द्यवस्थितविध्यवसानम्, तथैव प्रतिजातिगोत्रनियतत्रिशिखैकशिखादिकल्प- व्यवस्थितविधिशेषानुमानोपपत्तिरस्तीति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकवैषम्यम् ॥ १७ ॥ भा० प्र०-इसी पाद के भाष्य में शिखा कर्म को गोत्र का चिह्न माना गया है (गोत्रचिह्नं शिखाकर्म) पन्द्रहवें सूत्र में भी कोई तीन शिखा कोई पाँच शिखा इसका निर्देश किया है। गोभिलगृह्यसूत्र के २।१।२३ वें सूत्र में 'यथागोत्रकुलकल्पं' के द्वारा गोत्र और कुल के अनुसार शिखा रखने का या सम्पूर्ण मुण्डन कराने का विधान कराने का विधान मिलता है। आपस्तम्बगृह्यसूत्र के सोलह खण्ड के ६।७ में प्रवराध्याय में विहित ऋषि की गणना के अनुसार शिखा जाननी चाहिए (यथर्षिशिखा निदधाति यथा वैषां कुलधर्मः) बोधायन गृह्य सूत्र के अनुसार भी यही अर्थ अवगत होता है। अथैनमेकशिख- त्रिशिखपञ्चशिखो वा यथैवैषां कुलधर्मः । यथर्षिशिखां निदधातीत्येके (बोधायन २।४) वशिष्ठ गोत्र वाले दक्षिणभाग में एक शिखा । अत्रि और कश्यपगोत्र वाले उत्तर-दक्षिण दोनों भागों में एक-एक दो शिखा । कुण्डपायो में तीन शिखाएँ अंगिरा और भृगु गोत्र वाले पाँच शिखा । फलतः प्रवर और ऋषि के भेद के अनुसार शिखा की संख्या निर्धारित होती है। पूर्वपक्षियों ने प्रदर्शित शिखा कर्म अर्थात् गोत्र विशेष में पृथक्-पृथक् भाग में निबद्ध शिखाओं के अनुसार इसका भी भिन्न-भिन्न रूप से कर्तव्य का निर्धारण किया है। जैसे शिखा कर्म सभी व्यक्तियों के लिए समान रूप में कर्तव्य नहीं है, वैसे ही होलाका आदि कर्म भी सभी के लिए कर्तव्य नहीं है। जैसे भृगु गोत्रियों के लिए पंच अवदान अर्थात् चक्र आदि विधिविहित संस्कारात्मक खण्डकरण आदि शास्त्रीय कर्म का निर्वाह होता है। किन्तु होलाका आदि के लिए वैसा विनियोग नहीं है। इस लिए यह सभी के लिए कर्तव्य है। दर्शनात्= शिखा कर्म में शास्त्रीय व्यवस्था देखी गयी है, अतः विनियोगःस्यात्=विशेष नियोग या नियम हो सकता है, किन्तु शिखा भेद के कारण बालक के गोत्र की अवगति और गोत्रानुसार शिखाओं की व्यवस्था है, किन्तु प्रकृत कर्म में न तो कोई ऐसा दृष्ट साधन है और न तो कोई नियमित हेतु है जिससे इन कर्मों को व्यक्ति विशेष के लिए व्यवस्थित किया जा सके ॥ १७ ॥ लिङ्गाभावाच्च नित्यस्य ॥१८॥ शा० भा०-इदं पदेभ्यः केभ्यश्चिदुत्तरं सूत्रम् । कानि तानि पदानि ? अथ किमर्थं न लिङ्गाद् व्यवस्था ? यथा 'शुक्लो होता' इति । नास्ति तन्नित्य-

१८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४९३ मेषां लिङ्गम्। यद्यथादर्शनमनुवर्तते । येऽपि श्यामा बृहन्तो लोहिताक्षास्तेऽपि न सर्व आह्नीनैबुकादीन् कुर्वते । अनेवंलिङ्गा अपि चानुतिष्ठन्ति । तस्मान्न व्यवस्था । शुक्लो होतेति प्रत्यक्षा श्रुतिः ॥ १८ ॥ भा० वि०—स्वपक्षस्थापनस्य परपक्षबीजनिरासस्य च कृतत्वादुत्तरसूत्रा- नर्थक्यमाशङ्क्याह—इदमिति । पदानि-शङ्कापदानि । तेभ्य उत्तरमूर्ध्वमुपरिष्टा- दित्यर्थः, केभ्यश्चिदित्यनास्थाममृष्यन्नाह—कानीति । शङ्कावाक्यं विशदयति— अथेति । यद्यप्याकृत्यादीनां कर्तृविशेषणानामसंभवः, तथापि शुक्लत्वलोहिता- क्षत्वश्यामत्वादीनां कर्तृलिङ्गभूतानां विशेषणानां व्यवस्थितानां संभवात् तद्वा- च्युपपदयुक्तया श्रुत्या विशेषविनियोगः स्यादिति भावः । सूत्रं योजयन्नुत्तरमाह— नास्ति तन्नित्यमिति । यल्लिङ्गं येषां होलाकादिधर्मदर्शनम्, तेष्वनुवर्तेत ततोऽ- न्येभ्यो निवर्तेत च तन्नित्यं नियतं किमपि न संभवतीत्यर्थः, अनेन च नित्यस्य नियतस्य व्यवस्थितस्य कर्तुर्यल्लिङ्गं तन्नियतं तस्याभावादिति सूत्रं योजितम् । ननु वर्णसंस्थानादिलिङ्गसंभवो दर्शितः तत्राह—येऽपीति । अन्वयव्यभि- चारमुक्त्वा व्यतिरेकव्यभिचारमाह—अनेवं लिङ्ग इति । तेन वर्णाश्रम- व्यवस्थितत्वात्तद्वाच्योपपद्युक्तविधानश्रुतिप्यव्यवस्थेति निगमयति -- तस्मा- दिति ॥ १८ ॥ त० वा०--व्यक्ताकृत्यभिधेयेऽर्थे प्रत्याख्याये विशेषणे । लोहिताक्षादिचिह्नानामधुनाऽन्या निराक्रिया ॥ ६६४ जातिव्यक्तिवाच्युपपदाभावेपि, कर्तृगतसंस्थानवर्णादिगुणविशेषोपलक्षणेन कृष्णकेशाधानवदधिकारनियमः सेत्स्यतीत्याशङ्क्य निराक्रियते— लिङ्गाभावाच्च नित्यस्य नास्ति कर्तुर्विशेषणम् । नियतेन हि लिङ्गेन नित्यः कर्तोपलक्ष्यते ॥ ६६५ यच्चिह्नं दाक्षिणात्यानां लोहिताक्षादि कल्प्यते । अन्येषामपि तद् दृष्टं तदनाचरतामपि ॥ ६६६ दृष्टमाचरणं चैतत्तच्चिह्नरहितेष्वपि । तस्माद्व्यवस्थितैश्चिह्नैर्नाधिकारो विशेष्यते ॥ ६६७ यस्तु लिङ्गविशेषणं नित्यशब्दं मन्यते, तस्योपसर्जनीभूतलिङ्गसापेक्षत्वाद- समर्थसमासप्रसङ्गः । ननु लिङ्गशब्दस्य नित्यसापेक्षत्वात्स्वार्थाक्षिप्तसंबन्ध्यन्त- रत्वेन सामर्थ्यविधाताभावाद्भवितव्यमेवेह समासेन, देवदत्तस्य गुरुकुलमिति यथा ।

४९४ मीमांसादर्शनम् [ सू० नैतत्तुल्यमनेनेष्टमपेक्षान्तरसंगतेः । नित्यं नापेक्षते लिङ्गं देवदत्तं यथा गुरुः ॥ ६६८ गुरुशब्दस्य हि शिष्यापेक्ष एवाऽऽत्मलाभ इति, देवदत्तशब्दोपात्तशिष्य- संबन्धानतिरेकान्तर्णीतस्वार्थत्वान्नाभ्यधिकापेक्षाकृतसामर्थ्यप्रतिबन्धप्रसङ्गः । इह लिङ्गस्य लिङ्गत्वं गम्यते लिङ्ग्यपेक्षया । न च लिङ्ग्यभिधाय्येतन्नित्यस्येति पदं मतम् ॥ ६६९ यद्यपि चैष गम्यगमकसंबन्धे सति लिङ्गशब्दः प्रवर्तते, तथाऽपि गुरुशिष्य- पितापुत्रादिसंबन्धवन्नास्य तदपेक्षप्रवृत्तिनिमित्तसंबन्धिशब्दत्वप्रसिद्धिः । लिङ्गी यौगिकशब्दत्वात्सदा लिङ्गमपेक्षते । लिङ्गशब्दस्तु धात्वर्थं मुक्त्वा नान्यदपेक्षते ॥ ६७० लिङ्ग्यतेऽनेनेति हि क्रियायोगनिमित्तो यद्यपि लिङ्गशब्द इति, न संबन्धि- शब्दत्वेनोच्यते, तथाऽपि तु क्रियागतकारकान्तरापेक्षां न मुञ्चतीति, कामं 'लिङ्गिनो लिङ्गदर्शनम्' इत्यादौ भवेदप्यसामर्थ्यपरिहारः । नित्यत्वं पुनर्लब्ध- स्वार्थलिङ्गापेक्षितं तद्धर्मतया पश्चादुपदीयते इति, तत्संबन्धापेक्षायामपरिहा- र्योऽसामर्थ्यप्रसङ्गः । तस्मान्नित्यस्येति नियतचिह्नोपलक्ष्यकर्तृविशेषणमेवाधि- कारविशेषणं वा नियतस्य कर्तुःनेत्यस्याधिकारस्य वा न प्रतिपादकं किंचिच्चिह्न- मस्तीति, न तदभिधाय्युपपदविशेषितप्रवस्थितहोलाकादिविधानोपपत्तिः ॥१८॥ भा० प्र०—इस प्रकार के लक्षण से विशिष्ट व्यक्ति इस कर्म का सम्पादन करते हैं । जैसे श्यामवर्ण वृहत्काय लोहितवर्ण नेत्रों से युक्त व्यक्ति आह्नीनैवुक वादि अनुष्ठान करते हैं, इसी प्रकार होलाकादि आचार को भी देश विशेष से आबद्ध कर दिया जाय । इस पूर्वपक्ष के समाधान में कहा गया है कि—यह सङ्गत नहीं है । क्योंकि, अन्य स्थान में स्थित उन लक्षणों से विशिष्ट व्यक्ति इसका आचरण न करें यह कहने पर लक्षण की अव्याप्ति होगी । एवं जो उन लक्षणों से विशिष्ट नहीं है—इस प्रकार के अनेक व्यक्ति भी स्थान विशेष सम्बद्ध होने के कारण इसका आचरण करेंगे अतः, इस लक्षण की अतिव्याप्ति भी होगी । अतः, पूर्वपक्ष के समर्थन में नियम की व्यवस्था नहीं हो सकेगी । प्रकृत सूत्र के विश्लेषण में नित्यस्य का लिङ्ग के साथ अन्वय होने से लिङ्गाभावाच्च इसमें समास कैसे हो सकता है ? क्योंकि सापेक्ष शब्दों का विशेष प्रमाण रहने पर ही समास होता है । देवदत्तस्य गुरुकुलम् इस पद में यतः गुरु पद नित्य सापेक्ष शब्द है, क्योंकि, किसी का गुरु होगा, अतः, सापेक्ष रहने पर भी समास माना गया है, किन्तु, प्रकृत में ऐसी बात नहीं है । इसलिए वार्तिककार ने इस विषय पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया है ।

१९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४९५ लिङ्गभावात् = लिङ्ग अर्थात् चिह्न न होने से च = एवं, नित्यस्य = नित्य अधिकारी का। आशय यह है कि होलाकादि कर्मों के अधिकारी कर्ता का नियमित पृथक् रूप में निर्धारित होने योग्य चिह्न न होने से होलाकादि देश-विशेष से आबद्ध कर्म नहीं है ॥१८॥ आख्या हि देशसंयोगात् ॥१९॥ शा० भा०—अथ कस्मान्न समाख्यया नियमः। ये दाक्षिणात्या इति समाख्याताः ते आह्लौनैबुकादीन् करिष्यन्ति। य उदीच्या इति१ समाख्याताः ते उद्वृषभयज्ञादीन्, ये प्राच्या इति, ते होलाकादीन्। यथा राजा राजसूये- नेति। नैतदेवम्। देशसंयोगादाख्या भवति। दक्षिणदेशान्निर्गतः प्राक्षु वोदक्षु वाऽवस्थित२ आह्लौनैकबुकादीन् करोत्येव। उदीच्याश्च३ देशान्तर उद्वृषभ- यज्ञादीन्, प्राच्याश्च होलाकादीन्। अन्यदेशश्च देशान्तरगतो न नियोगतः परपदार्थान्४ करोति। तस्मान्न५ व्यवस्था। 'राजा राजसूयेनेति तु नियता जातिः ॥ १९ ॥ इति आशङ्कानिरासः । भा० वि०—आख्या हि देशसंयोगादित्यपि सूत्रं शङ्कोत्तरत्वेन व्याख्यातुं शङ्कामाह—अथ कस्मादिति। प्राच्यादिसमाख्यया कर्तृनियमं विवृणोति— ये दाक्षिणात्या इतीति। ननु प्रागादिदेशसंयोगस्य प्राच्यादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्याभावेनासमाख्या- भावेऽपि देशान्तरगतानां होलाकाद्यनुष्ठानदर्शनात् देशान्तरादागत्य तद्देशनि- वासिनां च सत्यामपि प्राच्यादिसमाख्यायामनुष्ठानादर्शनात् कथं समाख्याया नियम इत्याशङ्क्य—नेयं समाख्या देशसंयोगनिमित्ता, किंतु जात्यादिनिमित्तेत्यभि- प्रायेणाह—यथा राजेति। एतद् दूषयति—नैतदेवमिति। सर्वप्राच्यादिसमा- ख्यातपुरुषव्यक्तिवर्तिनो तत्समाख्येयभ्यश्च व्यावृतस्य जात्यादेरदर्शनान्न तन्नि- मित्तेयं समाख्या किंतु देशसंयोगनिमित्तैवेत्यर्थः। ततः किंमत आह—दक्षिणा- द्देशादित्यादिना। देशसंयोगाभावेन तन्निमित्तसमाख्याभावेऽपि अनुष्ठानवत्स- त्यामपि समाख्यायामनुष्ठानमाह—अन्यदेशजश्चेति। तस्मान्न समाख्याधीना १. ब. इति त उद्वृषम। २. शिष्टाश्च पौर्णमास्याख्ये काले आह्लौनैबुकसंज्ञकान् स्वस्वकुलोचितान् देवविशेषेभ्यः क्षीरदध्यादिसमर्पणोदिकान् धर्मविशेषान् भानुवारादिकालविशेषे समाचरन्ति इति कालनिर्णये माधवः। ३. ब. उदीच्यश्चोद्वृषम। ४. ब. नियोगतः पदार्थान्। ५. ब. तस्मादन्यवस्था।

४९६ मीमांसादर्शनम् [ सू० कर्तृव्यवस्थेति निगमयति-तस्मादिति । राजादिषु तु नियता राजत्वादिजाति- रनुभवसिद्धेति विशेषमाह-राजेति ॥ १९ ॥ त० वा०- इदानीं तु यदाचारमत्यन्तमनुवर्तते । तत्प्राच्यादिसमाख्याख्यमुपन्यस्तं विशेषणम् ॥ ६७१ सर्वे हि देशाचाराः प्राच्यदाक्षिणात्यादिसमाख्यातैः पुरुषैः क्रियन्ते, समा- ख्यावर्जितेषु च नोपलभ्यन्ते । तस्मात्समाख्याविशिष्टविध्यनुमानात्तत्संयुक्तप्रमाण- पक्ष एव ज्यायानिति । तत्र समाधिः - आख्या हि देशसंयोगाद्यस्मात्कर्तृषु वर्तते । आचाराणामतः प्राप्तो विधिर्देशविशेषणः ॥ ६७२ देशश्च दिग्विशिष्टः स्याद्दिग्रूपं चानवस्थितम् । न च तद्देशसंबन्धादनाचारोऽनुवर्तते ॥ ६७३ निर्गतेष्वपि दृष्टत्वात्तद्गतेष्वप्यदर्शनात् । समाख्यायास्तावन्न देशादन्यन्निमित्तमस्ति । तद्विशिष्टविधिविहिताश्च-आचाराः केवलमेव तद्देशसंबन्धमनुवर्तेरन् । उभयथाऽपि तु व्यभिचारान्न देशनिमित्तसमा- ख्याविशिष्टविधानकल्पा घटते ॥ १९ ॥ न्या० सु० - अथेत्यादिभाष्येनेदमपि सूत्रं पदोत्तरत्वेन व्याख्यातम् । प्राच्यादिसमाख्या- कर्तृविशेषणत्वेनाशङ्किता तत्र संस्थादिवत्समाख्याया अपि व्यभिचारदर्शनात्केनचिद्विशे- षेणोपन्यास इत्याशङ्कयाह - इदानीमिति । ननु देशान्तरादागत्य प्राग्देशे वसतां प्राच्यत्वे सत्यपि होलाकाद्यनुष्ठानादर्शनात्प्राग्देशाच्च निर्गत्य देशान्तरे वसतां प्राच्यत्वाभावेऽप्यनुष्ठा- नदर्शनात्कथं समाख्याया अप्यत्यन्तानुवृत्तिरित्याशङ्क्याह - सर्वे हीति । नेयं देशनिमित्ता समाख्या, किं तु जात्यादिनिमित्ता, अभिमानमात्रनिमित्ता वेत्युत्तरसूत्रे वक्ष्यमाणोऽभि- प्रायः । एतदेव पूर्वपक्षिणो विशेषणमभिमतमिति सूचयितुमत्रैवार्थे अनुमानव्यवस्थापनादिति पूर्वपक्षसूत्रं योजयति - तस्मादिति । सूत्रव्याख्यानार्थं नैतदेवमिति भाष्यं व्याचष्टे - तत्रेति । सर्वप्राच्यादिसमाख्यात- पुरुषव्यक्तिवर्त्तिनस्तदसमाख्येभ्यश्च व्यावृत्तस्य जात्यादेरदर्शनान्निर्मूलस्य चाभि- मानस्यायोगादित्याशयः । देशविशेषणत्वे को दोष इत्यपेक्षायां 'नैतदेवमिति भाष्येण सूचितं तावद्दोषमाह - देशश्चेति । ननु दिग्रूपानवस्थानेऽपि विन्ध्यापेक्षया निरूढोदीच्यादिदेश- व्यवस्थादर्शनान्न देशविषणत्वेऽपि कश्चिद्दोष इत्याशङ्कानिराकरणार्थं दक्षिणादित्यादिभाष्यं व्याचष्टे - न चेति । देशविशेषणत्वाभिधानाभिप्रायविवरणपूर्वकं श्लोकं व्याचष्टे - समाख्यायास्तावदिति । उभयशब्दोऽन्वयव्यतिरेकाभिप्रायः ॥ १९ ॥

३० ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४९७ भा० प्र०-यदि यह कहा जाय कि दाक्षिणात्य संज्ञा से अभिहित होने वाला व्यक्ति आह्लैनैबुक आदि का आचरण करे । प्राच्य संज्ञा से परिचित होने वाला व्यक्ति होलाक आदि का अनुष्ठान करे । उदीच्य संज्ञा से अभिहित होने वाला व्यक्ति उद्‌वृषम आदि यज्ञों का अनुष्ठान करे- यह निर्णय भी ठीक नहीं है, क्योंकि संज्ञा देश-संयोग- निमित्तक होने से जो व्यक्ति दाक्षिणात्य देश का परित्याग कर उत्तरखण्ड या पूर्व देश में रहता है, वह भी आह्लैनैबुक आदि सम्पादन करता ही है । किन्तु सम्प्रति वह दाक्षिणात्य शब्द से अभिहित नहीं किया जाता है वरन् वह उदीच्य या प्राच्य कहा जाता है । इसी प्रकार उदीच्य देश और प्राच्य देश से जाकर जो व्यक्ति दक्षिण में निवास करता है, वह भी वहाँ जाकर भी होलाक और उद्‌वृषम का अनुष्ठान करता है, किन्तु उस समय उनको प्राच्य या उदीच्य नहीं कहा जाता है, अतः होलाक आदि को समाख्या= संज्ञा के द्वारा देश विशेष से आबद्ध करना उचित नहीं है । आख्या=समाख्या अर्थात् दाक्षिणात्य, प्राच्य, उदीच्य आदि प्रकृति प्रत्यय से निष्पन्न शब्दमूलक संज्ञा । हि=यतः क्योंकि, देशसंयोगात्=देश के सम्बन्ध के अनुसार होती है । दाक्षिणात्य आदि संज्ञायें देश के साथ सम्बन्ध के अनुसार ही होती है, अतः ये संज्ञायें कर्तव्य का विशेषण नहीं हो सकती है ॥ १९ ॥ न स्याद्देशान्तरेष्विति चेत् ॥२०॥ शा० भा०--इति चेत् पश्यसि ? यदि देशसंयोगादाख्या भवेद् देशा- न्तरस्थस्य न भवेत् । भवति च देशान्तरस्थस्य माथुर इत्यसंबद्धस्यापि मथुरया । तस्मान्न देशसंयोगादाख्या ॥ २० ॥ इति आशङ्का । भा० वि० - प्राग्देशादिसंयोगस्य व्यभिचारित्वेन प्राच्यादिसमाख्यादिनि- मित्तत्वासंभवान्निर्निमित्तत्वासंभवाच्च जात्यादिनिमित्तत्वे सति समाख्यायाः कर्तृ- विशेषः सिद्ध्येदित्याशङ्कते - न स्यादिति । यदि देशसंयोगनिमित्ता समाख्या देशान्तरेषु गतस्य न स्यादिति सूत्रं व्याचष्टे - इति चेदिति । असम्बद्धस्यापि मथुरया माथुर इत्याख्यादर्शनान्नेदमिष्टापादनमित्याह - भवति चेति । यस्मा- द्व्यभिचारान्न देशसंयोगनिमित्तेयं समाख्या, तस्माद्व्यवस्थितप्राच्यादिव्यवहा- रानुपपत्तिकल्पितप्राच्यत्वादिजातिनिमित्तैवेत्युपसंहरति-तस्मादिति ॥ २० ॥ त० वा० - अपरस्त्वनयैवोपपत्त्या लब्धात्मीयपक्षोपपत्तिः प्रत्यवतिष्ठमान आह—'न स्याद्देशान्तरेष्विति चेत्' इति । यदि देशनिमित्तत्वात्समाख्या दूषिता त्वया । शक्यमन्यनिमित्तत्वं वक्तुमस्या मया पुनः ॥ ६७४ ३३

४९८ मीमांसादर्शनम् [ सू० सति देशनिमित्तत्वे न स्याद्देशान्तरेष्वियम् । तस्मात्किमपि जात्यादि ध्रुवमस्या निबन्धनम् ॥ ६७५ अस्तु वा निर्निमित्तैव विशेष्यति तथाऽपि तु । लब्धाचारनिमित्तानां किं निमित्तान्तरेण नः ॥ ६७६ तस्मादनिमित्तया समाख्ययैवाधिकारविशेषसिद्धेर्न व्यभिचारिदेशनिमित्त- त्वमस्याऽकल्पयितव्यमित्युक्ते ॥ २० ॥ न्या० सु०-- इत्याशङ्कासूत्रं पूर्वपक्षानौपयिकत्वेनायुक्तमाशङ्क्य देशनिमित्तायाः समाख्यायाः व्यभिचारित्वेन विशेषणत्वायोगाद्व्यभिचारिनिमित्तान्तरकल्पनार्थत्वेन पूर्व- पक्षोपयोगितां दर्शयन्नवतारयति-अपरस्त्विति । यथैव देशसंयोगव्यभिचारलक्षणयोपत्त्या तन्निमित्तायाः समाख्यायाः व्यभिचारोऽभिहितः, तथैव देशनिमित्तत्वायोगान्न देशव्यभि- चारेण समाख्याव्यभिचार इत्यस्ति यस्य, समाख्याविशेषणत्वं पक्षस्योपपत्तिलब्धपूर्व- पक्षिणेत्यर्थः । कीदृशं प्रत्यवस्थानमित्यपेक्षायामाह-यदीति । सूत्रव्याख्यानार्थमिति चेदित्यादिभाष्यं व्याचष्टे-सतीति । किं तर्ह्येतन्निमित्तमित्याशङ्कयाह-तस्मादिति । अनौपाधिकसन्तानविशेषव्यवस्थितप्राच्यादिव्यवहारान्यथानुपपत्त्या ब्राह्मण्यदिवत्प्राच्य- त्वादिकातिरपि कल्पयितुं शक्यते । तदसम्भवेऽपि वा सन्तानविशेष एव प्राच्यादिशब्द- वाच्यो भविष्यतीत्याशयः । निमित्तान्तरासम्भवेऽपि प्राच्यादिशब्दप्रयोगपरम्परामूलाभिमानमात्रनिबन्धना भविष्य- तीत्याह-अस्तु वेति । ननु शब्दप्रयोगपरम्परैव किं निमित्तेत्याशङ्कयाह-लब्धेति । लब्धं प्राच्यादिसमाख्याख्यमाचारनिमित्तं यैरिति विग्रहः । नोऽस्माकमित्यन्यपदार्थः । सूत्रतात्पर्यप्रदर्शनार्थं तस्मादित्यपसंहारभाष्यं व्याचष्टे-तस्मादिति । इति सूत्रमाशङ्का- निराकरणार्थत्वेनावतारयति-इत्युक्त इति ॥ २० ॥ भा० प्र०-इस प्रसङ्ग में यह कहा जा सकता है कि दाक्षिणात्य आदि दक्षिण- देशवासी पूर्व देश में निवास करने पर भी प्राच्य संज्ञा से उनका व्यवहार नहीं होता है, वरन् उस स्थान में भी दाक्षिणात्य शब्द से ही विख्यात रहते हैं, अतः यह मानना होगा कि प्राच्य आदि देशों में जाकर निवास करने पर भी वह प्राच्य नहीं होता है । जैसे मथुरा देश में रहने वाला व्यक्ति यदि विहार देश में जाय तब भी वह वहाँ माथुर शब्द से ही व्यवहृत होता है । अतः अन्य देश में निवास करने से उस देश के संयोग से उसकी संज्ञा का परिवर्तन नहीं हो जाता है-यह कथन ठीक नहीं है । इसलिए दाक्षिणात्य, प्राच्य इत्यादि संज्ञा के द्वारा ही होलाक आदि आचार देश विशेष में व्यवस्थित होगा ।

२१ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४१९ न स्यात् = होगा नहीं, देशान्तरेषु = अन्य देश में, इति चेत् = यदि यह कहा जाय ॥ २० ॥ स्याद्योगाख्या हि माथुरवत् ॥२१॥ शा० भा०—देशसंयोगनिमित्तायामप्याख्यायां देशान्निर्गतस्य तदाख्या न विरुद्धा । यत एषा योगाख्या, योगमात्रापेक्षा, न भूतवर्तमानभविष्यत्सम्बन्धा- पेक्षा । यतो दृश्यते मथुरांमभिप्रस्थितो माथुर¹ इति मथुरायां वसन् मथुराया निर्गतश्च² । यस्य त्वतोऽन्यतमः³ सम्बन्धो नास्ति न स माथुरः। तस्मान्न समाख्यया व्यवस्था ॥ २१ ॥ आ० नि० । भा० वि०—परिहरति—इति, स्यादिति प्रतिज्ञां व्याचष्टे—यत इति । देशसंयोगविशेषव्यभिचारेऽपि तत्संयोगमात्रस्याव्यभिचारेण समाख्यानिमित्तत्व- संभवे प्राच्यत्वादिजातिकल्पना न युक्तेत्यर्थः, माथुरवदिति दृष्टान्तं व्याचष्टे— यतो दृश्यत इति । मथुरांमभिप्रस्थित इति तूदाहरणं यद्यपि दूतादिविषयं न च प्राग्देशमभिप्रस्थितो दूतः प्राच्यो होलाकाद्यधिकरोति तथाप्येवमपि प्रत्ययोप- पत्तिरित्यतावन्मात्रप्रदर्शनायोदाहृतम् । नन्वेवं देशसंयोगमात्रनिमित्ता समाख्या होलाकाद्यधिकारं विशिष्यात्तत्राह— यस्य त्विति । चिरनिर्गतपुरुषपुत्रादीनां देशसंयोगमात्रस्याप्यभावे समाख्यादर्शनात् न तन्निमित्ताप समाख्येत्यर्थः । समाख्यायां नियतनिमित्ताभावे फलितमाह— तस्मादिति । श्यामलत्वादिकर्तृविशेषणवाच्युपपदासम्भवेऽपि कर्माङ्गभूतदेशविशेषण- वाचिनः संभवात्तद्युक्ता श्रुतिरनुमेयेति शङ्कते इति ॥ २१ ॥ त० वा०—अभिधीयते— संबन्धैर्बहुभिर्देशमाख्या हि प्रवर्तते । निवासभवजातत्वतदागमनहेतुभिः ॥ ६७७ 'सोऽस्य निवासः' 'तत्र भवः,' 'तत्र जातः' 'तत आगतः' इत्येवमादिनिमित्त- परित्यागेन न कदाचित्प्राच्यादिसमाख्या वर्तते । न चैषा देशसंयोगं व्यभिचरति । न चैनामाचारोऽनुवर्तते, तन्निवासिनामपि केषांचिदनाचरणाच्चिरनिर्गतपुत्र- पौत्रादीनां च देशान्तरेष्वप्याचरणादिति न समाख्यया नियतविधिसिद्धिः । १. ब. माथुरः मथुरायां । २. ब. निर्गतः यस्य । ३. ब. त्वन्यतमः।

५०० मीमांसादर्शनम् [ सू० भाष्यमते दूषणम् यत्तु मधुराभिमप्रस्थितो माथुर इति भाष्यकारेणोक्तं तत् 'तद्गच्छति पथि दूतयोः' इति वा दूतविषयं कल्पयितव्यम् । अप्रत्ययितोक्तत्वाद्वोपेक्षितव्यम् । सर्वस्मिन्नपि प्रस्थिते तद्धितस्मरणाभावात् ॥ २१ ॥ न्या० सु०—देशसंयोगनिमित्तायामित्यादिभाष्येण देशसंयोगविशेषव्यभिचारेऽपि देश- संयोगमात्रस्याव्यभिचारान्निमित्तत्वाभिधानात्थैवैतत्सूत्रं व्याख्यातम् । तत्र भूतादिशब्द- दर्शनात्कालविशेषावच्छेदेन देशसंयोगस्य विशेषणरूपत्वोक्ता प्रतिभाति । सा च देशसंयोग- निमित्तानां तद्धितानां कालविशेषविषयत्वेनास्मृतेरयुक्तेत्य शङ्क्याह—सम्बन्धैरिति । भूतशब्देन तदागमनहेतुकः सम्बन्धोऽभिप्रेतः । वर्तमानशब्देन निवासहेतुकः । गर्भसम्भव- लक्षणभवहेतुकस्य प्रसव लक्षणजातत्वहेतुकस्य चोभयरूपतोक्ता । भविष्यच्छब्देन बहुशब्दः सूचितः प्रस्थानहेतुकोऽभिप्रेतः । श्लोकं व्याचष्टे – सोऽप्येति । नन्वेवं सति देशसंयोग- मात्रनिमित्ता समाख्याप्यव्यभिचाराच्छक्नोत्येव कर्तारं विशेष्टुमित्याशङ्कयाह - न चैनामिति । चिरनिर्गतस्य पुरुषस्य पुत्रादीनां पूर्वदेशगर्भसम्भवस्याप्ययोगादित्याशयः । अनेन यस्य त्वतोऽन्यतमः सम्बन्धो नास्ति । न स माथुर इति दृष्टान्तभाष्यं सूचितम् । यस्य चिरनिर्गतपुरुषपुत्रादेरतोऽन्यतमः सम्बन्धो नास्ति, न स प्राच्यसमाख्यः । अथ च होलाकादीन्करोतीति समाख्याव्यभिचारप्रतिपादनं विवृतम् । तस्मादित्युपसंहारभाष्यं व्याचष्टे—इतीति । ननु मथुरामप्रस्थित इति भाष्यं किमित्युपेक्षितमित्याशङ्कयाह—यत्त्विति । नन्वेवं दूतविषयत्वेन कस्मान्न व्याख्यातमित्याशङ्कयाह-अप्रत्ययितेति । प्राग्देशमभिप्रस्थितो दूतः प्राच्योऽनेन दृष्टान्तेनापाद्येत । न दौत्ये व्यापृतस्य होलाकाद्यनुष्ठानं दृश्यत इत्याशयः ॥ २१ ॥ भा० प्र०—पूर्वोक्त शङ्का के निराकरण प्रसङ्ग में सूत्रकार ने कहा है कि मथुरावासी जब मथुरा में ही निवास करता है, उस समय जिस अर्थ में उसको माथुर कहा जाता है, पूर्व देश में जाकर निवास करने के समय उस अर्थ में उस व्यक्ति के लिए माथुर शब्द का प्रयोग नहीं होता है । क्योंकि उस स्थान में उत्पन्न (तत्र भवः) इस अर्थ में तद्धित प्रत्यय होता है, वैसे ही वहाँ से आया (तत आगतः) इस अर्थ में भी तद्धित प्रत्यय होता है । अतः, प्राच्य देश में निवास के समय उसको मथुरायाः आगतः अर्थात् मथुरा से आया है, इस अर्थ में ही माथुर शब्द का प्रयोग होता है, अतः पूर्व सूत्र से प्रदर्शित आशङ्का समीचीन नहीं है । इसलिए दाक्षिणात्य आदि देश की संज्ञा के आधार पर आचार की देश व्यवस्था नहीं हो सकती है । स्यात् हि=अवश्य ही होगा, यौगाख्या=प्रकृति प्रत्यय से उत्पन्न संज्ञा, माथुरवत्= माथुर शब्द के समान है ।

२१ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५०१ तन्त्रवार्तिक में अनेक सूत्रों के आधार पर इस संज्ञा को प्रदर्शित किया है। यथा तत्र, जातः (४।३।२५) इस पाणिनि सूत्र से उस स्थान में जन्म ग्रहण करने के अर्थ में अण् प्रत्यय का प्रयोग होता है—माथुरः=मथुरा में उत्पन्न व्यक्ति । प्रायो भवः (४।३।३९) उस स्थान में प्रायः रहने पर भी अण् प्रत्यय होने से यह प्रयोग हो सकता है, यथा मथुरा में प्रायः अर्थात् अधिक रहने वाले व्यक्ति के लिए माथुरः यह प्रयोग हो सकता है । सम्भूते (४।३।४१) वहाँ पर होने की सम्भावना में भी अण् प्रत्यय होने से यह प्रयोग हो सकता है । यथा -मथुरा में होने की सम्भावना से=माथुरः । तत्र भवः (४।३।५३) वहाँ पर विद्यमान इस अर्थ में भी अण् प्रत्यय होने से मथुरा में वर्तमान व्यक्ति के लिए भी माथुरः प्रयोग होता है । तत आगतः (४।३।७४) वहाँ से आया हुआ इस अर्थ में भी अण् प्रत्यय होने से मथुरा से आए हुए व्यक्ति जो अन्य स्थान में निवास कर रहा है, उसके लिए भी माथुरः प्रयोग होता है । प्रभवति (४।३।८३) जिस स्थान में प्रथम प्रकट हुआ । जैसे—हिमवान् से प्रकट गङ्गा के लिए हैमवती गङ्गा प्रयोग होता है । तद् गच्छति पथिदूतयोः (४।३।८५) उस स्थान में जाने वाले मार्ग और उस स्थान में जाने वाले दूत के अर्थ में भी अण् प्रत्यय होने से यह प्रयोग होता है, जैसे मथुरा की ओर जाने वाला मार्ग या दूत के लिए माथुरः यह प्रयोग होता है । अभिनिष्क्रामति द्वारम् (४।३।८६) उस तरफ खुलने वाला द्वार या उस ओर निकलने वाले द्वार के अर्थ में भी अण् प्रत्यय होने से इस अर्थ में भी यह प्रयोग होता है । यथा—मथुरा की ओर का द्वार माथुर कहा जाता है । सोऽस्य निवासः (४।३।८९) जहाँ निवास का स्थान रहता है इस अर्थ में भी अण् प्रत्यय होता है । जैसे मथुरा में जिसका निवास है—वह माथुर है । अभिजनश्च (४।३।९०) पूर्वजों के निवास के अर्थ में भी अण् प्रत्यय होता है । यथा मथुरा में जिसके पूर्वजों का निवास है; वह भी माथुर है । भक्ति (४।३।९५) जो स्थान उसका सेवनीय रहता है, इस अर्थ में भी अण् प्रत्यय होने से वह माथुर कहा जाता है । तस्येदम् (४।३।१२०) उसका यह समान है, इस अर्थ में अण् प्रत्यय होने से यह प्रयोग होता है जैसे—मथुरा का यह पदार्थ माथुर । इस प्रकार माथुर शब्द से अनेक अर्थों की प्रतीति होने से माथुर शब्द के प्रयोग से केवल उसी अर्थ की प्रतीति सम्भव नहीं है ॥ २१ ॥

५०२ मीमांसादर्शनम् [ सू० कर्मधर्मो वा प्रवणवत् ॥ २२ ॥ शा० भा०—अथ कस्मान्न कर्माङ्गं देशः १। यः कृष्णमृत्तिकाप्रायः, स आह्नी- नैबुकादीनाम् । यथा प्राचीनप्रवणे वैश्वदेवेन यजेत' इति ॥ २२ ॥ आशङ्का ॥ भा० वि०—ननु कर्तृविशेषणश्यामत्वाविवदेशविशेषणप्राप्तत्वकृष्णमृत्तिका- प्रायत्वादेरपि व्यभिचाराविशेषात् कथमियमाशङ्केत्याशङ्क्य व्याचष्टे—अथ कस्मादिति । कर्तॄणामानन्त्यादेकविशेषणासंभवेऽपि देशस्यैकत्वादेकविशेषणोप- पदस्यैव कर्मधर्मता कस्मान्न भवेदित्येतावानेवाभिप्राय इत्यर्थः । किं विशेषण- विशिष्टोऽसौ देशः कर्माङ्गमिति तत्राह—य इति । यश्च प्राक्तत्वादि विशेषणविशिष्टस्य होलाकादीनामित्यादि द्रष्टव्यम् । देशविशेषस्य कर्माङ्गत्वे दृष्टान्तं दर्शयन् प्रवणवदिति व्याचष्टे—यथेति ॥ २२ ॥ त० वा०—इदानीं कर्तृविशेषणविशिष्टविध्यनुमानात्प्रतिहतः कर्माङ्गभूत- प्राग्देशादिविध्यनुमानसभवं मन्यमान आह—‘कर्मधर्मो वा प्रवणवत्' इति । प्रागुदक्प्रवणो यद्वत्प्राचीनप्रवणोऽपि वा । देशो भवति कर्माङ्गं प्राग्देशादिस्तथा भवेत् ॥ इति ॥ ६७८ न्या० सु०-सूत्रं कर्माङ्गदेशविशेषणवाच्युपपदशङ्कार्थत्वेनाऽथेत्यादिभाष्येण व्याख्यातम् । तथा मन्वादिकर्तृविशेषणवत् कृष्णमृत्तिकाप्रायत्वादेर्दे शविशेषणस्यापि व्यभिचारेण ·निरस्तत्वात्, प्राच्यादिवच्च प्राक्तत्वादेरपि निरस्तत्वात्, केन विशेषेणोपन्यस्त इत्या- शङ्कयाह—इदानीमिति । कर्तॄणामानन्त्यादसम्भवे प्राक्तत्वादेरपि देशस्यैक्यादेव विशेषणोप- पत्तेरित्येतावानाशयः ॥ २२ ॥ मा० प्र० — देश आदि सम्बन्ध के द्वारा कर्ता की विशेष व्यवस्था न होने पर भी देश आदि के संयोग को कर्म का विशेषण मानकर होलाका आदि कर्मों का देश विशेष में आबद्ध कर प्रतिपादन करने के लिए पूर्वपक्षियों ने कहा है कि "प्राचीनप्रवणे देशे वैश्वदेवेन यजेत” जिस स्थान में प्राचीन प्रवण अर्थात् जिस स्थान में पूर्व दिशा में जल गिरता है उस स्थान में वैश्वदेव यज्ञ करें। इत्यादि स्थलों में जैसे प्राक् प्रवण देश आदि को विशेषण मानने से वह कर्म अन्य स्थान में करणीय नहीं होता है, उसी प्रकार जिस देश की मिट्टी प्रायः कृष्ण वर्ण की ही रहती है, उस स्थान के व्यक्ति आह्नीनैबुक आदि यज्ञ का अनुष्ठान करें—इस रूप में देश व्यवस्था की जाय तो ऐसी स्थिति में उस विशेष देश को छोड़कर यह अन्य स्थान में वह करणीय नहीं हो सकता है। कर्मधर्मं=देश विशेष कर्म का धर्म अर्थात् विशेषण, वा=आशङ्का अर्थ में, प्रवणवत्=प्राचीन प्रवण आदि के समान नहीं ॥ २२ ॥ १. ब. देशः कृष्ण ।

२३ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५०३ तुल्यं तु कर्तृधर्मेण ॥ २३ ॥ शा० भा०-यथा कर्तर्यव्यवस्थितं¹ लिङ्गं श्यामादि न पदार्थैः संवादमुपैति, तद्वद्देशलिङ्गमव्यवस्थितम् । कृष्णमृत्तिकाप्रायेऽप्यन्ये न कुर्वन्ति । तथाऽन्य- लिङ्गेऽपि² कुर्वन्ति । तस्मान्न देशतो व्यवस्था । प्राचीनप्रवणं तु श्रुत्या नियतं वैश्वदेवस्य ॥ २३ ॥ इति सप्तमं होलाकाऽधिकरणम् ॥ ६ ॥ भा० वि०--देशकत्वेऽपि तद्विशेषणानामनवस्थितत्वेन श्यामत्वतुल्यत्वं दर्शयितुं 'तुल्यं तु कर्तृधर्मेण' इति सूत्रं व्याचष्टे-यथेत्यादिना । यथा श्यामत्वादिकर्तृ- लिङ्गमव्यवस्थितत्वाद्धोत्रैधुकादिभिः पदार्थैः सह संवादमुपैति, न तन्नियत- सहभावि भवति, तद्वद्देशविशेषणमपि प्राक्त्वकृष्णमृत्तिकाप्रायत्वादि न होलाका- दिभिस्सह संवादमुपैति अनवस्थितत्वादिति योजना, कृष्णमृत्तिकाप्रायत्वादेरन- वस्थितत्वमुपपादयति-कृष्णमृत्तिकेति । अन्ये न कुर्वन्तीति । केचन कुर्वन्ति अन्ये न कुर्वन्तीत्यर्थः । देशविशेषणस्याव्यवस्थितत्वे फलितमाह - तस्मादिति । न व्यवस्था होलाकादीनामित्यर्थः । यत्तु प्रवणवदिति तत्राह - प्राचीनेति । प्राचीनप्रवणत्वादिप्रत्यक्षश्रुत्या वैश्वदेवस्य नियमित्यर्थः । तेन कर्तृविशेषणस्य कर्माङ्गविशेषणस्य वा व्यवस्थितस्य कस्यचिदभावान्न तद्वाच्यपदयुक्तयानुमीय- मानया श्रुत्या होलाकादीनां व्यवस्थितधर्मत्वसिद्धिरितिभावः ॥ २३ ॥ त० वा०-- 'तुल्यं तु कर्तृधर्मेण' तच्चिह्नमनवस्थितम् । दिक्कृष्णमृत्तिकाप्रायप्रभृतिव्यभिचारतः ॥ ६७९ प्राग्देशो यो हि केषांचित्सोऽन्येषां दक्षिणापथः । तथोदक्प्रत्यगित्थेवं नैकरूप्येण गम्यते ॥ ६८० मृत्तिकाद्यपि यच्चिह्नं तत्रान्यत्र च तत्समम् । होलाकादिविधिस्तस्मान्न तेनापि विशेष्यते ॥ ६८१ पुरुषापेक्षयाऽऽचारस्तस्मिन्नपि न दृश्यते । अन्यस्मिन्नपि दृष्टश्च तस्माद्देशोऽप्यकारणमिति ॥ ६८२ इति सप्तमं होलकाधिकरणम् ॥ ७ ॥ न्या० सु०--भाष्ये कृष्णमृत्तिकाप्रायग्रहणं प्रावत्त्वादेरुपलक्षणार्थम् । प्राचीनप्रवणोदाहरणं च प्रागुदक्प्रवणस्थापोति व्याचष्टे - प्रागिति । तुल्यं तु कर्तृधर्मणेति सूत्रमव्यवस्थिततुल्य- त्वाभिप्रायेण व्यभिचारतुल्यत्वाभिप्रायेण व्याचष्टे - तुल्यं त्विति दिक् । कृष्णमृत्तिकाप्राय- १. ब. व्यस्थितश्याम । २. ब. एतद्वाक्यं नास्ति ।

५०४ मीमांसादर्शनम् [ सू० प्रभृति यत्, तस्य देशस्य चिह्नम्, तदाचारानुमेयश्रुतिगतोपपदवाक्यत्वेनाशङ्कितं तदनव- स्थितत्वाद् व्यभिचाराच्च कर्तृधर्मेण प्राच्यत्वादिना, श्यामत्वादिना च तुल्यमित्यर्थः । दिशस्तावद्देशविशेषचिह्नत्वासम्भवमुपपादयति—प्राग्देश इति । कृष्णमृत्तिकादेरनवस्थितत्वं यथेत्यादिभाष्योक्तमुपपादयति — मृत्तिकाद्यपीति । तत्र दक्षिणदेशे अन्यत्र च देशान्तरे तत्सममित्यर्थः । व्यभिचारानवस्थितत्वयोरितरेतरनैरपेक्ष्येऽप्युपपादननिराकरणार्थत्वं दर्शयितुं तस्मादित्युपसंहारभाष्यं तावद् व्याचष्टे-होलाकादीति । कृष्णमृत्तिकाप्रायेणापीति व्यभिचार इत्यादिभाष्यं व्याचष्टे-पुरुषापेक्षयेति । अत्राप्युपसंहारभाष्यमावृत्त्या योजयति- तस्मादिति । कर्तृविशेषवद्देशोऽपि होलाकादिव्यवस्थाकारणं न भवतीत्यर्थः ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीमत्त्रिकाण्डमीमांसामण्डनप्रतिवसन्तसोमयाजिभट्टमाधवात्मजभट्टसोमेश्वर- विरचितायां तन्त्रवार्तिकटीकायां सर्वानवद्यकारिण्यां न्यायसुधाख्यायां प्रथमाध्यायस्य तृतीयस्मृतिचरणपूर्वाद्धम् ॥ मा० प्र० —श्यामवर्णं बृहत्काय लोहित नेत्र वाले व्यक्ति आह्लीनैबुक आदि कर्म करते हैं, यह कहने पर जैसे वह अव्यभिचरित नहीं होता है, उसी प्रकार जिस देश की मृत्तिका प्रायः कृष्णवर्ण की होती है, वहाँ के व्यक्ति आह्लीनैबुक आदि अनुष्ठान करते हैं— यह कथन भी व्यभिचरित है । क्योंकि, जिस स्थान की मिट्टी काली नहीं है, ऐसे स्थानों में भी लोग इस अनुष्ठान को करते हैं । इसी प्रकार जहाँ की मिट्टी प्रायः कृष्णवर्ण की ही है; ऐसे स्थानों में इसका अनुष्ठान लोग नहीं करते हैं । अतः देश आदि को कर्म का विशेषण करना उचित नहीं है । अतः होलाक आदि देश विशेष में ही कर्तव्य है, अन्यत्र करणीय नहीं है—यह कहना उचित नहीं है । गौतमीय स्मृति केवल सामवेदियों के लिए ही अवलम्बनीय है—यह कहना भी ठीक नहीं है । यह सत्य है कि गौतम सामवेदीय थे एवं उनकी शिष्य परम्परा भी प्रायः सामवेदीय हो सकते हैं—इसलिए, इस प्रकार की किम्वदन्ती प्रचलित हो गई कि गौतमीय स्मृति समवेदीय के लिए ही अनुसरण योग्य है । वैश्वदेव यज्ञ की प्राचीन प्रवणता का उदाहरण भी इस स्थान में प्रयोज्य नहीं है, क्योंकि, वैश्वदेव् यज्ञ की प्राचीन प्रवणता साक्षात् श्रुति के द्वारा विहित है, प्रकृति में ऐसा नहीं है । तु=पूर्व आशङ्का के निवारण के लिए है, कर्तृधर्मेण तुल्यम्=कर्तृ विशेषण के समान, देश आदि को कर्ता का धर्म कहना एक ही समान है, कारण उसको कर्ता का धर्म मानने पर जो दोष होगा कर्मधर्म मानने पर भी वे ही दोष होंगे । आशय यह है कि कर्ता में अव्यवस्थित इत्यादि चिह्न कर्मों के साथ एकरूपता सिद्ध नहीं हो पाती हैं, क्योंकि, कृष्ण आदि अव्यवस्थित है । ऐसे स्थान पर भी अनुष्ठान होता है और नहीं भी होता है और अन्यत्र भी होता है, वैश्वदेव यज्ञ के समान होलाक

२४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५०५ आदि में कोई देश विशेष सम्बद्ध विधान श्रुति में नहीं है। अतः होलाक आदि देश विशेष में ही अनुष्ठेय नहीं है ॥२३॥ अथाऽष्टमं व्याकरणाधिकरणम् ॥ [८] प्रयोगोत्पत्त्यशास्त्रत्वाच्छब्देषु न व्यवस्था स्यात् ॥२४॥ पू० शा० भा०---गौर्गावी¹ गोणी गोपोतलिका इत्येवमादय. शब्दा उदाहरणम् । गोशब्दो² यथा सास्नादिमति³ प्रमाणम्, किं यथा गाव्यादयोऽपि उत नेति सन्देहः। किमत्रैकः शब्दोऽविच्छिन्नपारम्पर्योऽर्थाभिधायी,⁴ इतरेऽपभ्रंशाः, उत सर्वेऽनादय. । सर्व इति ब्रूमः। कुत. ? प्रत्ययात् । प्रतीयते हि गाव्यादिभ्यः सास्नादिमानर्थः । तस्मादितो वर्षशतेऽप्यस्यार्थस्य सम्बन्ध आसीदेव, ततः⁵ ततश्च⁶ परतरेणेत्य- नादिता । कर्ता चास्य सम्बन्धस्य नास्तीति व्यवस्थितमेव⁷। तस्मात्सर्वे साधवः, सर्वैर्भाषितव्यम् । सर्वे हि साधयन्त्यर्थम् । यथा⁸ हस्तः करः पाणिरिति । अर्थाय ह्येते उच्चार्यन्ते⁹, नादृष्टाय । न ह्येषामुच्चारणे शास्त्रमस्ति । तस्मान्न व्यवति- ष्ठेत कश्चिदेक एव साधुः । इतरेऽसाधव इति ॥ २४ ॥ इति पूर्वपक्षः ॥ भा० वि०-अत्र स्मृत्याचारयोः प्रामाण्ये सिद्धे तदन्तर्गताया व्याकरण- स्मृतेरपि सामान्यतः स्मृत्यधिकरणसिद्धमपि श्रुतिमूलतया प्रामाण्यं होलाकाधि- करणप्रङ्गेनैवानन्तर्याध्वसाधुशब्दनिष्ठैकगुणजात्यादिवाचकोपपद्युक्तश्रुत्यनुमाना- सम्भवेन निर्मूलतयाक्षिप्य समाधीयत इति सङ्गतिः विषयमधिकरणस्य दर्शयति- गौरित्यदिना । संशयमाह--किमत्रेति । गोगाव्यादिषु मध्य एक एव गोशब्दोऽ- विच्छिन्नपारम्पर्योऽर्थाभिधाने त्वनादिप्रयुक्तः, इतरे गाव्यादयो गवादिसाधुशब्दो- च्चिवारयिषायां तदसामर्थ्यजनिता उतानादय एव सर्व इत्यर्थः । एतदुक्तं भवति- यदि समूलतया व्याकरणस्य प्रामाण्यात् तदनुगतानामेव गोशब्दादीनना- मनादिवाचकत्वम्, तदा त एव साधवः । अथ निर्मूलतया व्याकरणस्याप्रा- माण्यात् तदनुगमविशेषाभावात् सर्व एव गोगाव्यादिशब्दा अनादयः तदा सर्व एवैते साधव इति सदसन्मूलत्वाभ्यां व्याकरणप्रामाण्याप्रामाण्यसन्देहादेव साध्व- साधुत्वसन्देहो युक्त इति । प्रयोजनं तु विचारस्य पुरुषार्थेषु लौकिकं व्यवहारेषु ऋत्वङ्गभूतेषु च व्रीह्यादिपदार्थविषयव्यवहारेषु साधुभिरेव भाषितव्यमितिनियम- १. गौरित्यस्य शब्दस्य गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिकेत्येवमादयोऽपभ्रंशा महाभाष्ये पस्पशाह्निके निर्दिष्टाः १-१-१ । २. ब. यथा गोशब्दःसास्नादि । ३. ब. मतः प्रमाणं । ४. ब..र्थामिध.ने । ५. ब. ततश्च । ६. ब. ततःपर । ७. ब. जै० सू० १-१-५ इत्यत्र । ८. ब. एतन्नास्ति वाक्यम् । ९. न धर्माय ।

५०६ मीमांसादर्शनम् [ सू० सिद्धिः । इदानीं शब्देषु न व्यवस्था स्यात् इति सूत्रावयवं व्याकुर्वन् पूर्वपक्ष- माह—सर्वेति—ब्रूम इति । गोगाव्यादयस्सर्व एवानादयः शब्दाः । न तु कश्चिदनादिः, इतरे अपभ्रं शा इति तेषु व्यवस्था संभवतीत्यर्थः । अत्र प्रमाणं पृच्छति—कुत इति । अर्थापत्ति प्रमाणमाह—प्रत्ययादिति । एतद्विवृणोति— प्रतीयत इति । प्रयोगप्रत्ययान्यथानुपपत्त्या गाव्यादीनामपि सास्नादिमतार्थेन सहाभिसम्बन्धो अनादिरवगम्यत इति भावः । ननु गाव्यादिशब्दानामशक्तिजत्वेनाभ्रंशत्वेऽपि सादृश्यात् स्वप्रकृतिभूत- गोशब्दोपस्थापनद्वारेणान्यथायुपपन्नमर्थप्रत्यायकत्वमत आह—तस्मादिति । अगृहीतगोशब्दानामपीदानीं गाव्यादिभ्योऽर्थप्रत्ययदर्शनादेषामेव पूर्वमप्यर्थेन सम्बन्ध आसीदिति निश्चीयत इत्यर्थः । अवध्यस्मरणादप्यनादिरेषां सम्बन्ध इत्याह—ततश्चेत्यादिना । सम्बन्धकर्तुः सम्बन्धग्रन्थे निराकृतत्वाच्चानादिरय- मित्याह—कर्ता चेति । अर्थसम्बन्धस्यानादित्वे फलितमाह—तस्मादिति । अस्तु सर्वेषां साधुत्वम्, ततः किमित्याशङ्क्य पूर्वपक्षप्रयोजनमाह—सर्वैरिति । यस्मात्सर्वे साधयन्त्यर्थम् तस्मात्सर्वैर्भाषितव्यमिति सम्बन्धः । ननु सर्वेषां दृष्टार्थप्रत्ययसाधनत्वाविशेषेऽप्यदृष्टार्थो गोशब्दप्रयोगनियमो भविष्यतीत्यत आह - अर्थयेति । अर्थप्रतिपत्तिप्रयोजनायेत्यर्थः । कुतो न धर्मा- येत्याशङ्क्य प्रयोगोत्पत्त्यशास्त्रत्वादिति सूत्रावयवं योजयति—न ह्येषाामिति । प्रयोगोपपत्तेर्गवादिशब्दोच्चारणनियमस्याशास्त्रत्वाच्छास्त्राविषयत्वादिति सूत्रार्थः । न च व्याकरणविषयतया शास्त्रविषयत्वमाशङ्कनीयं धर्मार्थस्य साधुप्रयोगनिय- मस्य, प्रयोगस्य वा साधुस्वरूपनियमस्य निष्प्रमाणकत्वेन तद्विषयव्याकरणस्यापि निर्मूलतया प्रामाण्यासम्भवेन साधव एव प्रयोक्तव्या इति प्रयोगनियमस्य गवादय एव साधव इति साधुस्वरूपनियमस्य चाशास्त्रीयत्वादिति भावः, नियमस्या- शास्त्रीयत्वे फलितमाह—तस्मादिति । एक एव साधुरितरेऽपभ्रं शा इति व्यव- स्थायां सत्यामप्ययमेवैक इति न नियन्तुं शक्यमिति सूचयितुं—क्वचिदित्य्यु- क्तम् ॥ २४ ॥ अथाष्टमं व्याकरणाधिकरणम् त० वा०—एकस्मात्पदात्प्रयोगानात्वदर्शनादनेकार्थप्रतिभाने सति विकल्प- दोषभयादनेकादृष्टशक्तिकल्पनाप्रसङ्गाच्च गौणमुख्यविभागमाश्रित्य व्यवस्थित- शास्त्रप्रयोगबलेनाव्यवस्थिते लौकिकप्रयोगबाधाद् यववराहादिशब्दानामर्थनिर्णयः प्रतिपादितः। एवं पुनरेकस्मिन् गवादावर्थे गोगाव्यादयो बहवः शब्दाः प्रयुज्यन्ते, तत्र वृद्धव्यवहारावगतप्रतिशब्दसमवायिवाचकशक्तिभेदोपपत्तेः शास्त्रस्थसर्वशब्द- प्रयोगाणां च लौकिकशब्दैरविरोधात् पदपूर्वकत्वाच्च वाक्यात्मकशास्त्रव्यापार- सिद्धेर्न पदगतसाधुसाधुत्वप्रतिपादने व्यापारो भवति, इतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गात् ।

२४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५०७ तथा हि—लोकप्रसिद्धशब्दार्थवशं शास्त्रं प्रवर्तते । अतो न लौकिकेष्वस्मात्साध्वसाधुत्वनिर्णयः ॥ ६८३ वाक्यार्थेषु हि श्रुतिस्मृत्याचारविरोधदर्शनाद्वलाबलामानुपूर्व्येणावधृतम् इह न तु, विपरीतक्रमत्वात् । लोकादेवाधिगन्तव्या शब्दानां साध्वसाधुता । वाचकावाचकत्वेन सा च नित्यं व्यवस्थिता ॥ ६८४ ध्वनिमात्राप्रसाधूनि वर्णा वा केवलात्मनाम् । संघातॊऽर्थानपेक्षो वा मातृकाद्युपदेशवत् ॥ ६८५ तेन भेरीशङ्खादिशब्दा गकारकादयः प्रत्येकम्, तद्वर्गा वाऽनर्थकत्वादपशब्दा इति लोकव्यवहारादेवार्थं न साधयन्तीत्यसाधवो गम्यन्ते । गाव्यादयः पुनर्ग- वादिवदेव साधयन्त्यर्थम्, तेभ्योऽपि वा शीघ्रतरं प्रसिद्धतरत्वादर्थप्रतीतिमुत्पाद- यन्तीति, सत्यप्येकविषयानेकशब्दत्वे हस्तकरपाण्यादिशब्दवदर्थसाधनत्वात्साधुत्वे- नावधार्यन्ते । ततश्चावाचकत्वेन यद्यसाधुत्वमुच्यते । तस्य लोकविरुद्धत्वान्न ग्राह्यत्वं प्रतीयते ॥ ६८६ अदृष्टविषया चेत्स्यादेतेषां साध्वसाधुता । वेदवाक्यैरनिर्दिष्टा न साऽस्त्यन्यप्रमाणिका ॥ ६८७ प्रत्यक्षेण तावदुभयत्राप्यविशेषेण वर्णाः शुद्धाः प्रतीयन्ते । न तद्गते, तत्स- मुदायगते वा साधुत्वासाधुत्वे । न वाऽनुभूतसम्बन्धादनुमीयेते । तन्निराकर- णाच्च तत्पूर्वकपुरुषवचननिराक्रियाऽपि सिद्धा । वेदवचनं पुनर्वस्तुस्वरूप-तद्गत- गुणदोषान्वाख्यानपरं विधिप्रतिषेधानपेक्षं नैव किंचित्प्रमाणत्वेन संभवति । साधुत्वासाधुत्वयोरनुष्ठानात्मकत्वाद्विधिप्रतिषेधविषयत्वम् । अभिधानकरणभूत- योर्विधेयत्वसंभव इति चेत् ? न । प्रतिशब्दमनन्तविधिप्रतिषेधवाक्यानुमानकल्पनानुपपत्तेः । यो हि प्रतिपदं पाठं साधूनां नाध्यवस्यति । विधिवाक्यानि तावन्ति स कथं प्रतिपत्स्यते ॥ ६८८ अपशब्दाश्च शब्देभ्यो भूयस्त्वेन व्यवस्थिताः । न कलञ्जादिवत्तेषां प्रतिषेध्यत्वसंभवः ॥ ६८९ व्रीह्यादीनि हि कलञ्जादीनि च नियतजातिगुणादिरूपेण परिज्ञायमानप- रिमाणत्वाद्विधिप्रतिषेधगोचरीभवन्ति१ न तु गवादिगाव्यादीनां जातिरूपेण, व्यक्तिरूपेण वा विधिप्रतिषेधावुपपद्येते । १. पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव । शल्यकः श्वाविधो गोधा शशः कूर्मश्च पञ्चमः । वा० रा० कि० का० सर्गं १७ । श्लो० ३७ । अभिधाभावनेति मु० पु० पा०

५०८ मीमांसादर्शनम् [ सू० न तावत्साध्वसाधुत्वे जातिगुणाद्यात्मकसामान्यरूपेण सर्वव्यक्त्यनुगते विज्ञा- येते, यदालम्बनो द्वावेव विधिप्रतिषेधावनुमीयेयातां-साधुभिर्भाषित, नासाधु- भिरिति । अविभक्ता हि शब्दत्वजातिः शब्दापशब्दयोः । न त्ववान्तरसामान्ये केचिद्गर्गद्वयस्थिते ॥ ६९० तेन यद्येकैका व्यक्तिर्विधीयेत, प्रतिषेध्येत वा ततो यावत्पदं वाक्यान्य- नुभिमानस्त्रैलोक्यपूरणादप्यधिकानि स्मृतिमूलभूतानि वेदवाक्यान्यनुमिमीते । न च तावतां कोटिशतभागोऽप्याम्नातुं शक्यते । न चानाम्नातस्य स्मृतिमूलत्वम् । नित्यानुमेयश्रुतिमूलप्रतिषेधात् । न च वाचकत्वावाचकत्वनिबन्धनौ विधिप्रतिषेधौ संभवत-सर्वेषां वाच- कत्वात् । वाचकैर्भाषितव्यं हि प्राप्तत्वान्न विधीयते । अवाचकनिषेधश्च नाऽप्राप्तेरवकल्पते ॥ ६९१ न ह्युदकं पिबेदग्निं न पिवेदिति च विधिप्रतिषेधौ संभवतः । अवश्यं च व्याकरणस्मृतिमूलभूतसाधुविधिश्रुतिः असाधुप्रतिषेधश्रुतिः उभयं वा संयोग- पृथक्त्वात् कल्पनीयम् । त्रिष्वपि च पक्षेषु साध्वनुशासनमात्रमेव सौकर्यादाश्रितम् । यदि ह्यपशब्दप्रतिषेधमूलं व्याकरणम्, ततस्तेषां बहुत्वादव्यवस्थितरूपत्वाच्च न स्वरूपमवगन्तुं शक्यत इति 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या' इति स्मृतिन्यायेनानुगतविपरीत- भाषणप्रतिषेधोऽर्थापत्तिसिद्धः स्मर्यते । साधुविधिपक्षे तु त एव स्मर्त्तव्या । उभय- पक्षे तु तदनुगमादेवेतरसिद्धेः प्रतिषेधविषयज्ञानोपपत्तिः । स एष व्याकरणस्य न पक्षत्रयेऽप्येकानुगमनिवन्धनत्वात्कथंचित्संक्षेपोऽवकल्पते । ननु प्रतिशब्दं विधि- प्रतिषेधावकॢप्तिः, अनन्तवाक्यपाठासंभवात् । इष्टासंभवदर्शनार्थमेव होलाकाधि- करणेऽभिहितम् । न तस्याऽऽकृतिवचनता न्याय्या, न व्यक्तिवचनतेति । तस्माद- संभवन्मूलत्वादपस्मृतिः । अथ प्राप्तश्च योऽर्थः स्यान्न स शास्त्रस्य गोचरः । सिद्धः शब्दप्रयोगश्च लोकादेवार्थलक्षणः ॥ ६९२ कात्यायनवार्तिकावलम्बनेन शङ्का अथार्थलक्षणत्वेऽपि शास्त्रेण धर्माय प्रयोगनियममात्रप्रायोगोत्पत्तिशास्त्रत्वं स्यादिति । तदनुपपन्नम् । नियमा१विषयासंभवात् । यस्य ह्यनियता प्राप्तिस्तच्छास्त्रेण नियम्यते । नित्यप्राप्तप्रयोगस्तु न शब्दो नियमास्पदम् ॥ ६९३ १. क. (टिप्पण्यां) प्रयोगनियमेति पाठः ।

२४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५०९ यस्याप्यत्यन्तमप्राप्तिस्ततोऽन्यो न नियम्यते । तव चात्यन्तमप्राप्तिर्गव्यादेः प्राप्तता मम ॥ ६९४ तेन पक्षद्वयेऽपि नियमानुपपत्तिः । कीदृशश्चात्र नियमः कल्प्येत - किं साधुभिरेव भाषितव्यम्, उत साधुभि- र्भाषितव्यमेवेति । यदि साधुभिरेवेति नासाधोरप्रसङ्गतः । नियतं भाषितव्यं चेन्मौने दोषः प्रसज्यते ॥ ६९५ यदि ह्येकार्थाः साध्वसाधवो विकल्पेन प्राप्नुयुः ततः साधुनियमावकाशः स्यात् । तन्मते तु पुनः-- अत्यन्तावाचकत्वात्तु नैवासाधुः प्रसज्यते । यन्नि१वृत्तिफलः साधोनियमोऽत्रार्थवान्भवेत् ॥ ६९६ अथ प्रमादाशक्ति२कृतप्रसङ्गनिवृत्तिनियमं प्रयुञ्जीत । तदसत् । न हि शास्त्रशतेनापि प्रमादाशक्तिकारितात् । निवर्त्यन्ते प्रयोक्तारः प्रयोगादिति दृश्यते ॥ ६९७ दृष्टोऽप्यशब्दानामर्थाभिधाने प्रयोग इति चेत् ? उच्यते - अन्योऽप्यक्षिनिकोचादेः प्रयोगोऽर्थेषु दृश्यते । तन्निवृत्तिफलः कश्चिन्नियमो न च दृश्यते ॥ ६९८ न च नियमानां प्रतिपक्षनिवृत्तिः प्रयोजनम् । परिसंख्याप्रयोजनत्वात् । न चायं परिसंख्याविषयो युज्यते । युगपत्प्राप्त्यभावात् । न वा दृष्टार्थतैवास्य प्रयोगस्योपपद्यते । न हि दृष्टनिराकाङ्क्षाददृष्टमपि गम्यते ॥ ६९९ न हि तादृशेष्वदृष्टकल्पनायामर्थापत्तिः प्रभवति । परार्थत्वाच्च फलश्रुतेरर्थ- वादत्वम् । न चासति फले शक्यमपूर्वं कल्पयितुम् । नियमापूर्वस्य निरासः न चेदं नियमापूर्वमाश्रितं भवेति गम्यते । शब्दार्थश्रोतृतद्बुद्धिवक्तृच्चारणगोचरे ॥ ७०० शब्दस्य तावदत्यन्तपरार्थदृष्टार्थत्वान्नापूर्वेण कश्चिदुपकारः । सत्यपि चाभि- धानकर्मत्वेनार्थस्य प्राधान्ये, दृष्टार्थेषु लोकव्यवहारेषु विनाऽप्यपूर्वेणाङ्गभावाद- पूर्वोपकारानुपयोगः । श्रोतुः पुर्ननियमविधिसंस्पर्शानन्तर्गतत्वादेवासंस्कार्यत्वम् । बुद्धयोश्च क्षणिकत्वान्न कालान्तरावस्थाय्यपूर्वाधारत्वोपपत्तिः । १. क. यस्मिन्वृत्तिफलः । २. शक्तिभूत ।