मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४९४ मीमांसादर्शनम् [ सू० नैतत्तुल्यमनेनेष्टमपेक्षान्तरसंगतेः । नित्यं नापेक्षते लिङ्गं देवदत्तं यथा गुरुः ॥ ६६८ गुरुशब्दस्य हि शिष्यापेक्ष एवाऽऽत्मलाभ इति, देवदत्तशब्दोपात्तशिष्य- संबन्धानतिरेकान्तर्णीतस्वार्थत्वान्नाभ्यधिकापेक्षाकृतसामर्थ्यप्रतिबन्धप्रसङ्गः । इह लिङ्गस्य लिङ्गत्वं गम्यते लिङ्ग्यपेक्षया । न च लिङ्ग्यभिधाय्येतन्नित्यस्येति पदं मतम् ॥ ६६९ यद्यपि चैष गम्यगमकसंबन्धे सति लिङ्गशब्दः प्रवर्तते, तथाऽपि गुरुशिष्य- पितापुत्रादिसंबन्धवन्नास्य तदपेक्षप्रवृत्तिनिमित्तसंबन्धिशब्दत्वप्रसिद्धिः । लिङ्गी यौगिकशब्दत्वात्सदा लिङ्गमपेक्षते । लिङ्गशब्दस्तु धात्वर्थं मुक्त्वा नान्यदपेक्षते ॥ ६७० लिङ्ग्यतेऽनेनेति हि क्रियायोगनिमित्तो यद्यपि लिङ्गशब्द इति, न संबन्धि- शब्दत्वेनोच्यते, तथाऽपि तु क्रियागतकारकान्तरापेक्षां न मुञ्चतीति, कामं 'लिङ्गिनो लिङ्गदर्शनम्' इत्यादौ भवेदप्यसामर्थ्यपरिहारः । नित्यत्वं पुनर्लब्ध- स्वार्थलिङ्गापेक्षितं तद्धर्मतया पश्चादुपदीयते इति, तत्संबन्धापेक्षायामपरिहा- र्योऽसामर्थ्यप्रसङ्गः । तस्मान्नित्यस्येति नियतचिह्नोपलक्ष्यकर्तृविशेषणमेवाधि- कारविशेषणं वा नियतस्य कर्तुःनेत्यस्याधिकारस्य वा न प्रतिपादकं किंचिच्चिह्न- मस्तीति, न तदभिधाय्युपपदविशेषितप्रवस्थितहोलाकादिविधानोपपत्तिः ॥१८॥ भा० प्र०—इस प्रकार के लक्षण से विशिष्ट व्यक्ति इस कर्म का सम्पादन करते हैं । जैसे श्यामवर्ण वृहत्काय लोहितवर्ण नेत्रों से युक्त व्यक्ति आह्नीनैवुक वादि अनुष्ठान करते हैं, इसी प्रकार होलाकादि आचार को भी देश विशेष से आबद्ध कर दिया जाय । इस पूर्वपक्ष के समाधान में कहा गया है कि—यह सङ्गत नहीं है । क्योंकि, अन्य स्थान में स्थित उन लक्षणों से विशिष्ट व्यक्ति इसका आचरण न करें यह कहने पर लक्षण की अव्याप्ति होगी । एवं जो उन लक्षणों से विशिष्ट नहीं है—इस प्रकार के अनेक व्यक्ति भी स्थान विशेष सम्बद्ध होने के कारण इसका आचरण करेंगे अतः, इस लक्षण की अतिव्याप्ति भी होगी । अतः, पूर्वपक्ष के समर्थन में नियम की व्यवस्था नहीं हो सकेगी । प्रकृत सूत्र के विश्लेषण में नित्यस्य का लिङ्ग के साथ अन्वय होने से लिङ्गाभावाच्च इसमें समास कैसे हो सकता है ? क्योंकि सापेक्ष शब्दों का विशेष प्रमाण रहने पर ही समास होता है । देवदत्तस्य गुरुकुलम् इस पद में यतः गुरु पद नित्य सापेक्ष शब्द है, क्योंकि, किसी का गुरु होगा, अतः, सापेक्ष रहने पर भी समास माना गया है, किन्तु, प्रकृत में ऐसी बात नहीं है । इसलिए वार्तिककार ने इस विषय पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किया है ।