मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४५१ वाचक होने से वह देवदत्त के समान एक ही व्यक्ति को अवगत करायेगा । उस व्यक्ति को छोड़कर अन्य व्यक्ति की अवगति इससे नहीं हो सकती है । अतः वह अनेक व्यक्तियों के कर्तव्य के रूप में नहीं हो सकता है, अर्थात् अनेक व्यक्ति उसका आचारण नहीं कर सकेंगे । इसी लिए प्राच्यत्व और प्रतीच्यत्व व्यक्ति वाचक या आकृति वाचक नहीं हो सकता है । अतः विधायक शब्द भी तद्विशिष्ट रूप में आचार का विधान नहीं कर सकता है । अर्थात् प्राच्यत्व आदि अधिकारी का विशेषण नहीं हो सकता है । यह सत्य है कि राजसूय और वैश्यस्तोम आदि जगहों में राजत्व=क्षत्रियत्व या वैश्यत्व रूप जाति अधिकारी का विशेषण हो सकता है क्योंकि सभी क्षत्रियों और सभी वैश्यों में अनुगत रूप से क्षत्रियत्व और वैश्यत्व जाति अवस्थित है । अपि वा=यह पूर्वपक्ष के निरास के लिए है । सर्वधर्मं स्यात्=सभी का धर्म अर्थात् कर्तव्य होगा । विधानस्य=विधान का (जिसके द्वारा विहित होता है उसे विधान कहते हैं) विधायक शास्त्र का या मूलभूत अनुमेय श्रुति का, तन्न्यायत्वात्=क्योंकि वैसा न्याय अर्थात् प्राची आदि देश विशिष्टता भावरूप तर्क उपलब्ध है, होलाकादि आचार देश विशेष की सीमा से आबद्ध नहीं है, अपि तु वह सभी के लिए अनुष्ठेय है, क्योंकि श्रुति के अनुमान में देश विशिष्टाभाव रूप तर्क वर्तमान है । फलतः यह सभी का कर्तव्य हो सकता है ॥ १६ ॥ दर्शनाद्विनियोगः स्यात् ॥ १७ ॥ शा० भा०-गोत्रव्यवस्थया शिखाकल्पव्यवस्थायां दर्शनं स्पष्टम् ॥१७॥ उ०॥ भा० वि० - उत्तरत्वेन सूत्रमवतारयति-दर्शनादिति । तत्र दृष्टान्तवैषम्य- प्रदर्शनार्थं दर्शनादिति भागं व्याचष्टे-गोत्रेति । तत्र हि गोत्रादेरेकैकस्य व्यवस्थापकधर्मस्य दर्शनात् तद्गतस्य त्रिशिखत्वादेरपि व्यवस्थादर्शनं युक्तम् । न चैवमाचरितादीनां किञ्चिद्व्यवस्थापकमस्ति येन होलकादि व्यवतिष्ठेदेत्यर्थः । ततश्च तत्र गोत्रादिवाच्युपपदोपेतश्रुत्यनुमानात् कर्तृविशेषविनियोगः स्यात् अत्र तु कर्तृविशेषणासम्भवेन तद्वाच्युपपदासम्भवान्नोपपदयुक्तस्यापि श्रुत्या कर्तृ- विशेषविनियोगः सिद्ध्येदिति सूत्रशेषो व्याख्येयः ॥ १७ ॥ त० वा०-यत्तु¹ जातिकुलगोत्रधर्मवद्व्यवस्थितविध्यनुमानमिति ? तत्रैकशब्दवाच्यानां जात्यादीनां व्यवस्थया । दर्शनाद्विनियोगः स्यात्पञ्चावत्तादिधर्मवत् ॥ ६६३ १. यस्तु मु. पु. ४ यस्तु विध्यनुमानमभिमन्यते इत्यन्वयः ।