भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 804 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 546

४९२ मीमांसादर्शनम् [ सू० यः तथैव पञ्चावत्तं तु भृगूणां वसिष्ठशुनकात्रिवध्यश्वकाण्वसंकृतिराजन्यानां नाराशंसो द्वितीयः प्रयाजः तनूनपादन्येषामित्यन्वयतो व्यतिरेकतश्चोपलक्षणसंभ- वाद्द्यवस्थितविध्यवसानम्, तथैव प्रतिजातिगोत्रनियतत्रिशिखैकशिखादिकल्प- व्यवस्थितविधिशेषानुमानोपपत्तिरस्तीति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकवैषम्यम् ॥ १७ ॥ भा० प्र०-इसी पाद के भाष्य में शिखा कर्म को गोत्र का चिह्न माना गया है (गोत्रचिह्नं शिखाकर्म) पन्द्रहवें सूत्र में भी कोई तीन शिखा कोई पाँच शिखा इसका निर्देश किया है। गोभिलगृह्यसूत्र के २।१।२३ वें सूत्र में 'यथागोत्रकुलकल्पं' के द्वारा गोत्र और कुल के अनुसार शिखा रखने का या सम्पूर्ण मुण्डन कराने का विधान कराने का विधान मिलता है। आपस्तम्बगृह्यसूत्र के सोलह खण्ड के ६।७ में प्रवराध्याय में विहित ऋषि की गणना के अनुसार शिखा जाननी चाहिए (यथर्षिशिखा निदधाति यथा वैषां कुलधर्मः) बोधायन गृह्य सूत्र के अनुसार भी यही अर्थ अवगत होता है। अथैनमेकशिख- त्रिशिखपञ्चशिखो वा यथैवैषां कुलधर्मः । यथर्षिशिखां निदधातीत्येके (बोधायन २।४) वशिष्ठ गोत्र वाले दक्षिणभाग में एक शिखा । अत्रि और कश्यपगोत्र वाले उत्तर-दक्षिण दोनों भागों में एक-एक दो शिखा । कुण्डपायो में तीन शिखाएँ अंगिरा और भृगु गोत्र वाले पाँच शिखा । फलतः प्रवर और ऋषि के भेद के अनुसार शिखा की संख्या निर्धारित होती है। पूर्वपक्षियों ने प्रदर्शित शिखा कर्म अर्थात् गोत्र विशेष में पृथक्-पृथक् भाग में निबद्ध शिखाओं के अनुसार इसका भी भिन्न-भिन्न रूप से कर्तव्य का निर्धारण किया है। जैसे शिखा कर्म सभी व्यक्तियों के लिए समान रूप में कर्तव्य नहीं है, वैसे ही होलाका आदि कर्म भी सभी के लिए कर्तव्य नहीं है। जैसे भृगु गोत्रियों के लिए पंच अवदान अर्थात् चक्र आदि विधिविहित संस्कारात्मक खण्डकरण आदि शास्त्रीय कर्म का निर्वाह होता है। किन्तु होलाका आदि के लिए वैसा विनियोग नहीं है। इस लिए यह सभी के लिए कर्तव्य है। दर्शनात्= शिखा कर्म में शास्त्रीय व्यवस्था देखी गयी है, अतः विनियोगःस्यात्=विशेष नियोग या नियम हो सकता है, किन्तु शिखा भेद के कारण बालक के गोत्र की अवगति और गोत्रानुसार शिखाओं की व्यवस्था है, किन्तु प्रकृत कर्म में न तो कोई ऐसा दृष्ट साधन है और न तो कोई नियमित हेतु है जिससे इन कर्मों को व्यक्ति विशेष के लिए व्यवस्थित किया जा सके ॥ १७ ॥ लिङ्गाभावाच्च नित्यस्य ॥१८॥ शा० भा०-इदं पदेभ्यः केभ्यश्चिदुत्तरं सूत्रम् । कानि तानि पदानि ? अथ किमर्थं न लिङ्गाद् व्यवस्था ? यथा 'शुक्लो होता' इति । नास्ति तन्नित्य-