मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ६५
**विटः—**प्रसरसि भयविक्लवा किमर्थं प्रचलितकुण्डलघृष्टगण्डपार्श्वा । विटजननखघट्टितेव वीणा जलधर-गर्जित-भीतसारसीव ॥२४॥
यहाँ गणना करने पर वास्तव में ग्यारह नाम होते हैं परन्तु शकार के वचन असंगत होते हैं-यह मान कर 'दश' समझना चाहिये । इसी प्रकार एषा, एषा-यह दो बार है और 'वेशवधूः, सु-वेश-निलया, वेशाङ्गना वेशिका-इनमें 'वेश' शब्द का चार बार प्रयोग भी उचित नहीं है किन्तु शकार की उक्ति समझकर यहाँ भी दोष नहीं मानना चाहिये । वेशिका-वेशः=वेश्यालयः अस्ति अस्याः इस अर्थ में "अत इनिठनौ" [ पा. सू, ५।२।११५ ] से मत्वर्थीय ठन् = इक प्रत्यय हुआ है । दश नामकानि-यहाँ प्रिय अर्थ में 'क' प्रत्यय है, दश प्यारे नाम रखे हैं। गणेश आदि देवता तक बारह नामों का उच्चारण करने पर प्रसन्न होकर इच्छा पूरी कर देते हैं, परन्तु यह वसन्तसेना वेश्या होकर भी दश नाम उच्चारण किये जाने पर भी मेरे ऊपर प्रसन्न नहीं हो रही है। यह आश्चर्य की बात है। शकार का यह अभिप्राय है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है—सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ २३ ॥
**अन्वयः—**प्रचलित-कुण्डल-घृष्टगण्डपार्श्वा, विट-जन-नखघट्टिता, वीणा, इव, जलधर-गर्जित-भीत-सारसी, इव, भयविक्लवा, ( सती ), किमर्थम्, प्रसरसि ॥२४॥
**शब्दार्थ—**प्रचलित-कुण्डल-घृष्टगण्डपार्श्वा=हिलते हुये कुण्डलों से रगड़े गये ( चिह्नित ) कपोल भाग वाली, ( इसीलिये ) विट-जन-नख-घट्टिता=विट जनों के नाखूनों से ( बजाने ) से घिसी हुई, वीणा इव=वीणा के समान, जलधर-गर्जित-भीत-सारसी इव=मेघों की गर्जना से डरी हुई सारसी के समान, भयविक्लवा=भय से व्याकुल ( होती हुई तुम ), किमर्थम्=किसलिये, प्रसरसि=भागी जा रही हो ? ॥ २४ ॥
**अर्थ—**हिलते हुये कुण्डलों के कारण रगड़ खाये हुये कपोलस्थल वाली, ( अतएव ) विटजनों के नाखूनों के द्वारा ( बजायी जाने के कारण ) घिसी हुई ( चिह्नविशेष से युक्त ) वीणा के समान, ( तथा ) मेघों की गर्जना से डरी हुई सारसी के समान भयातुर ( होती हुई ) तुम क्यों भागी जा रही हो ? ॥ २४ ॥
**टीका—**प्रचलितकुण्डलघृष्ट-गण्डपार्श्वा = प्रचलिताभ्याम् = चञ्चलाभ्याम्, कुण्डलाभ्याम् = कर्णाभूषण-विशेषाभ्याम्, घृष्टौ = घर्षणयुक्तौ गण्डयोः = कपोलयोः पार्श्वौ = कर्णसमीपप्रदेशौ यस्याः सा तादृशी, अत एव, विटजन-नखघट्टिता—विटजनानाम् = विलासप्रियजनानाम्-नखैः=अङ्गुल्यग्रैः घट्टिता=प्राप्तघर्षा, सन्ताडिता वा, वीणा इव=वाद्यविशेष इव, जलधरगर्जित-भीत-सारसी इव = जलधरस्य=
५ मृ०