मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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शकारः—झाणज्झणन्तबहुभूषणशद्दमिश्श
किं दोवदी विअ पलाअशि लामभीदा । एशे हरामि शहशत्ति जधा हनूमे विश्शावसुश्श बहिणिं विअ तं शुभद्दं ॥ २५ ॥
( झणज्झणायमानबहुभूषणशब्दमिश्रं किं द्रौपदीव पलायसे रामभीता ।
एष हरामि सहसेति यथा हनूमान् विश्वावसोर्भगिनीमिव तां सुभद्राम् ॥ २५ ॥ )
मेघस्य, गर्जितेन=गर्जनेन, भीता=भयाक्रान्ता, चासौ सारसी=सारसपक्षिणः प्रेयसी इव, भयविक्लवा=भयेन=भीत्या, विक्लवा = व्याकुला, सती, किम् = किमर्थम्, प्रसरसि=प्रपलायसे । अत्र मनोहरत्वात् शब्दवत्त्वाद् वा वीणातुल्यत्वमुक्तमिति पृथ्वीधरः । मालोपमा अलङ्कारः, तल्लक्षणन्तु —
मालोपमा यदैकस्योपमानं बहु दृश्यते । पुष्पिताग्रा वृत्तम्, तल्लक्षणम् —
आयुजि न-युगरेफतो यकारो युजि तु न-जौ-ज-र-लगाश्च पुष्पिताग्रा ।।२४।।
**विमर्श—**प्रस्तुत श्लोक में वसन्तसेना की उपमा वीणा और सारसी से दी गई है। जैसे मनोहर और ध्वनि करने वाली वीणा बजाने से घर्षित हो जाती है वैसे ही कुण्डलों की रगड़ से वसन्तसेना के कपोलों के ऊपर कान के पास घर्षणचिह्न बन रहें हैं। मेघ के तुल्य इन शकारादि के शब्दों को सुनकर सारसी के तुल्य वसन्तसेना भयभीत होकर भाग रही है। ये दो उपमान होने से मालोपमा अलंकार है। और पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ २४ ॥
**अन्वयः—**रामभीता, द्रौपदी, इव, ( त्वम् ) झणज्झणायमानबहुभूषणशब्द-मिश्रम्, किम्, पलायसे, यथा, हनूमान्, विश्वावसोः, ताम्, भगिनीम्, सुभद्राम्, इव, ( त्वाम् ), एषः ( अहम् ), इति, सहसा, हरामि ॥ २५ ॥
**शब्दार्थः—**रामभीता=रामचन्द्र से डरी हुई, द्रौपदी इव=पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी के समान ( त्वम्=तुम ), झणज्झणायमानबहुभूषणशब्दमिश्रम्=झन, झन करने वाले बहुत से आभूषणों की ध्वनि से मिले हुये, किम्=क्यों, पलायसे=भाग रही हो ? ( अर्थात् झन झन करते हुये आभूषणों की ध्वनि को अपने साथ लेती हुयी ध्वनितुल्य गति से क्यों भागी जा रही हो ? ), यथा=जिस प्रकार, हनूमान्=पवनपुत्र द्वारा, विश्वावसोः = विश्वावसु नामक गन्धर्व की, ताम्=उस प्रसिद्ध, भगिनीम् इव=बहिन के समान, ( त्वाम्=तुमको ), एषः=यह ( अहम्=मैं शकार ) इति=इस प्रकार ( बलपूर्वक ) हरामि=हरण करके ले जा. रहा हूँ ॥ २५ ॥
**अर्थ—शकार—**राम से डरी हुई द्रौपदी के समान (तुम) झन झन करते