भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ६७

हुये आभूषणों की ध्वनि को मिलाती हुई क्यों भागी जा रही हो ? जिस प्रकार हनुमान ने विश्वावसुनामक गन्धर्व की उस बहिन सुभद्रा का हरण किया था उसी प्रकार यह मैं ( शकार ) तुम्हारा ( बलात् ) हरण कर रहा हूँ ॥ २५ ॥

टीका—रामभीता=रामचन्द्रभीता, द्रौपदी इव = द्रुपदपुत्रीतुल्या, ( त्वम्=वसन्तसेना ) झणज्झणायमानबहुभूषणशब्दमिश्रम्=झणत् झणत्-इति अव्यक्तशब्दं कुर्वताम् = झणज्झणायमानाम्, बहूनां भूषणानाम् = अलङ्काराणाम्, शब्देन=अव्यक्तध्वनिना, मिश्रम् = मिश्रितं यथा स्यात् तथेति क्रियाविशेषणम्, किम्=किमर्थम्, पलायसे=प्रधावसि, अत्र केचित्-झणज्झणमिति बहुभूषणशब्दमिश्रम्=इत्यन्वयं कृत्वा व्याचख्युस्तन्न, प्राकृते एकस्यैव पदस्य प्रयोगात्, मध्ये 'इबि' शब्दप्रश्लेषस्यायुक्तत्वाच्चेति बोध्यम् । यथा=येन प्रकारेण, हनूमान्=पवनपुत्रः, विश्वावसोः=एतन्नामकस्य प्रसिद्धगन्धर्वस्य, ताम्=विश्रुताम्, भगिनीम् इव=स्वसारम् इव, (त्वाम्=वसन्तसेनाम्) एषः=उपस्थितः (अहम्=शकारः), इति=अनेन रूपेण, सहसा=शीघ्रमेव बलपूर्वकम्; हरामि=अपनयामि, अत्र यथा, इव-शब्दद्वयं सादृश्यार्थं प्रयुक्तमिति पुनरुक्तम्, एकेनैव निर्वाहात् । द्रौपदी दुर्योधनभीता, न रामभीता, सुभद्रा श्रीकृष्णस्य भगिनी, न विश्वावसोः । सुभद्रा अर्जुनेनापहारिता न हनूमता — एताः असङ्गतयः शकारवचनत्वान्न दोषप्रदाः, विदूषकस्येव शकारस्यापि हास-कारित्वात् । प्रसिद्धिविरुद्धवर्णनात् हतोपमालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥२५॥

विमर्श—झाणज्झणत्-बहुभूषणशद्दमिश्रम् - इस प्राकृत की संस्कृत छाया अलग-२ प्राप्त होती है—( १ ) झाणत् झणत् बहुभूषणशब्दमिश्रम् ( २ ) झणज्झणमिति भूषणशब्दमिश्रम्, ( ३ ) झणज्झणायमान-बहुभूषणशब्दमिश्रम् । प्रथम एवं तृतीय पाठ वाले विद्वान् इसे क्रियाविशेषण मानते हैं । द्वितीय पाठ वाले विद्वान् 'अलग-अलग पद मानकर — बहुभूषणशब्दमिश्रम् झणज्झणम् इति कुर्वती--ऐसी योजना करते हैं । परन्तु दो पृथक-पृथक् पदों की कल्पना करना और 'कुर्वंती' आदि क्रिया पद का आक्षेप करना कहाँ तक उचित है, यह विचारणीय है । इस श्लोक में 'यथा' और 'इव' दो समानार्थक शब्द होने से पदा-धिक्य दोष है । इसी प्रकार जो उपमायें हैं वे शास्त्र-पुराणादि-विरुद्ध हैं अतः हतोपमा अलंकार है ( १ ) द्रौपदी राम से नहीं, दुर्योधन से भयभीत हुई थी, ( २ ) सुभद्रा विश्वावसु की नहीं, श्रीकृष्ण की बहिन थी, ( २ ) इसका हरण हनुमान ने नहीं, अर्जुन ने किया था । शकार का स्थान यहाँ विदूषक के समान ही प्रतीत होता है । अतः ये असंगतियाँ सामाजिकों के परिहास के लिये की गई हैं । इस प्रकार दोषकोटि में नहीं आती हैं । इसमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ २५ ॥