भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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११० | मृच्छकटिकम्

विदू०—पुणो वि ऋद्धीए अज्जचारुदत्तस्स (पुनरपि ऋद्ध्या आर्य चारुदत्तस्य)

शकारः—अले ले दुट्ठवडुका ! भणेशि मम वअणेण तं दलिद्दचालु-दत्तकं--एशा शशुवण्णा शहिलण्णा णव-णाडअदंशणुट्टिठदा शुत्तधालिव्व वशन्तशेणा णाम मणिआदालिआ कामदेवाअदणुज्जाणादो पहुदि तुमं अणुलत्ता, अम्हेहिं बलक्कालाणुणीअमाणा, तुह गेहं पविट्ठा। ता जइ मम हत्थे शअं ज्जेव पट्टाविअ एणं शमप्पेशि, तदो अधिअलणे ववहालं विणा लहु णिज्जादमाणाह तव मए अणुबद्धा पोदी हुविश्शदि । आहु अणिज्जादमाणाह मलणान्ति के वेले हुविशदि। अवि अ पेक्ख पेक्खं- (अरे रे दुष्टवटुक ! भणिष्यसि मम वचनेन तं दरिद्रचारुदत्तकम्--'एषा ससुवर्णा, सहिरण्या नव-नाटक-दर्शनोत्थिता सूत्रधारीव वसन्तसेना नाम गणिकादारिका, कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति त्वामनुरक्ता अस्माभिर्बलात्कारानुनीयमाना तव गेहं प्रविष्टा ।। तद्यदि मम हस्ते स्वयमेव प्रस्थाप्य एनां समर्पयसि, ततोऽधिकरणे व्यवहारं विना शीघ्रं निर्यातयतस्तव मयानुबद्धा प्रीतिर्भविष्यति, अथवा अनि-र्यातयत मरणान्तकं वैरं भविष्यति। अपि च प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व---)

कक्कालुका गोच्छड़-लित्तवेण्टा, शाके अ शुक्खे तलिदे हु मांसे।
भत्ते अ हेमन्तिअ-लत्तिशिद्धे लीणे अ वेले ण हु होदि पूदि ॥ ५१ ॥

विदूषक— फिर आर्य चारुदत्त की समृद्धि से।

शकार— अरे रे दुष्ट ब्राह्मण के बच्चे ! मेरे वचन से (मेरी ओर से) उस दरिद्र चारुदत्त से कहना—"सोने से अलंकृत और सोने से युक्त, नवीन नाटक के प्रदर्शन के लिये उठकर खड़ी हुई सूत्रधारी=प्रमुख नटी के समान वसन्तसेना नामक वेश्यापुत्री, कामदेवायतन नामक उद्यान में जाने से लेकर तुम पर अनुरक्त हो जाने वाली, हम लोगों द्वारा बलपूर्वक मनायी जानी हुई भी, तुम्हारे घर चली गयी है। इसलिये (तुम) स्वयं भेजकर इसे मेरे हाथों में सौंप दोगे, तो न्यायालय में मुकदमा किये बिना, शीघ्र वापस कर देने वाले तुम्हारे साथ मेरी प्रगाढ मित्रता बन जायगी। अथवा वापस न भेजने वाले तुम्हारी (मेरे साथ) मरणपर्यन्त रहने वाली दुश्मनी हो जायगी। और भी देखो, देखो—

अन्वय :— गोमयलिप्तवृन्ता, कर्कालुका, शुष्कम्, शाकं च, तलितम्, मांसम्, च, हैमन्तिकरात्रिसिद्धम्, भक्तञ्च, खलु, वेलायाम् लीनायाम्, पूति, न, भवति, खलु ॥ ५१ ॥

शब्दार्थ— गोमयलिप्तवृन्ता=गोबर से लपेटे हुये डण्ठल वाली, कर्कालुका=कुम्हड़ी (कूष्माण्डी=कुम्हणी), शुष्कम्=सूखा हुआ, शाकम्=साग, सब्जी, =