मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ११३
विदू०—भणिस्सं । ( भणिष्यामि । )
शकारः—[ अपवार्य । ] चेडे ! गडे शच्चकं ज्जेव भावे ? । ( चेट ! गतः सत्यमेव भावः ? )
चेटः—अध इं । ( अथ किम् । )
शकारः—ता शिग्घं अवक्ककम्मह् । ( तत् शीघ्रंमपक्रामावः । )
चेटः—ता गेण्हदु भट्टके अशिम् । ( तत् गृह्णातु भट्टारकः असिम् । )
शकारः—तव ज्जेव हत्थे चिट्ठदु । ( तवैव हस्ते तिष्ठतु । )
चेटः—एशे भट्टालकस्य, गेण्हदु णं भट्टके अर्शि ।
( एष भट्टारकस्य । गृह्णातु एनं भट्टारकः असिम् । )
शकारः—( विपरीतं गृहीत्वा । )
णिव्वक्कलं मूलकपेशिवण्णं खन्धेण घेत्तूण अ कोशशूत्तं ।
कुक्केहिं कुक्कीहिं अ वुक्कअन्ते जधा शिआले शलणं पलामि ॥५२॥
विमर्श—ससुवर्णा—सुवर्णेन सह—यही अर्थ उचित है, और तात्पर्य सुवर्ण से युक्त अथवा अलङ्कृत । कुछ विद्वानों ने सुष्ठु वर्णैः सह विद्यमाना—यह अर्थ किया है परन्तु इस अर्थ के लिये तो शोभनाः वर्णाः यस्याः सा—इस बहुव्रीहि से ही निर्वाह सम्भव था 'सु' का प्रयोग अधिक है । व्यवहार=मुकदमा । आमरणान्तकम्-यहाँ आमरणम् अथवा मरणान्तकम्=इतना ही उचित है । स्वस्तिकम्-का शोभनम्-यह भी पाठान्तर है । तथा लघुकम्-का सकपटम्-यह पाठान्तर है । प्रासाद-बालाग्रकपोतपालिकायाम् = प्रासाद के बाल=नवनिर्मित, अग्रभाग पर कपोतपालिका=कबूतर-खाना-यह शकार का वचने होने से अस्पष्ट है । मडमडांयिष्यामि-मडमड इस प्रकार का शब्द करते हुये तोड़ डालूँगा । कहीं-कहीं-अन्यथा यदि न भणिष्यसि-ऐसा पाठ मिलता है । यह उचित नहीं है । इसमें 'अन्यथा' अथवा 'यदि न' एक अधिक है । वास्तव में 'अन्यथा यदि भणिष्यसि' यही संगत पाठ है ।
अर्थ—विदूषक-कहूँगा ।
शकार—( अपवार्य-हटकर ) चेट ! क्या भाव सचमुच ही चला गया ।
चेट—और क्या ?
शकार—तब हम दोनों भी शीघ्र चलें ।
चेट—तो स्वामी तलवार ले लें ।
शकार—तुम्हारे ही हाथ में रहे ।
चेट—यह ( तलवार ) आपकी है । स्वामी इस तलवार को ले ले ।
विमर्श—अपवार्य इस परिभाषिक शब्द का यह तात्पर्य है—'रहस्यन्तु यदन्यस्य परावृत्य प्रकाश्यते । तद्भवेदपवारितम्—' सा० द०
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