भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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११४मृच्छकटिकम्

( निर्वल्कलं मूलकपेशिवर्णं स्कन्धेन गृहीत्वा च कोषसुप्तम् ।
कुक्कुरैः कुक्कुरीभिश्च बुक्कद्यमानो यथा शृगालः शरणं प्रयामि ) ॥५२॥

अन्वयः— निर्वल्कलम्, मूलकपेशिवर्णम्, कोशसुप्तम्, च, (असिम्), स्कन्धेन, गृहीत्वा, कुक्कुरैः, कुक्कुरीभिः, च, बुक्क्यमान, शृगालः, यथाः ( अहम् ) शरणम्, व्रजामि ॥ ५२ ॥

शब्दार्थ— निर्वल्कलम्=वृक्ष की छाल से बने म्यान से रहित=बाहर निकली, हुई, अर्थात् नंगी, मूलकपेशिवर्णम्=मूली के छिलके के समान रंगवाली, च=और कोषसुप्तम्=पहले म्यान में रखी जा चुकी, ( असिम्=तलवार को ), स्कन्धेन=कन्धे से ( = पर ), गृहीत्वा=लेकर, कुक्कुरैः=कुत्तों, च=और, कुक्कुरीभिः=कुतियों के द्वारा, बुक्यमानः=भौंका जाता हुआ, ( अर्थात् जिसके पीछे कुत्ते और कुतियाँ भौंक रहीं हैं ), शृगालः यथा=सियार के समान, ( अहम्=शकार ), शरणम्=अपने घर जाता हूँ ॥ ५२ ॥

अर्थः—शकार— ( उल्टी पकड़कर )
नंगी ( म्यान से बाहर ) तथा मूली के छिलके के समान रंगवाली, (बाद में), कोष ( म्यान ) में रखली गई तलवार को कन्धे पर लटका कर (रख कर), कुत्ते और कुतियाँ जिसके पीछे भौंक रहे हैं, ऐसे सियार के समान घर जा रहा हूँ ॥५२॥

टीका— निर्वल्कलम्=निर्गतं वल्कलम्=तरुत्वक्, लक्षणया तद्गुविनिर्मितः कोशः यस्य यस्माद्वा तत्, विकोशमित्यर्थः, मूलकपेशिवर्णम्=मूलकस्य=एतन्नामकशाक-विशेषस्य, पेशी=त्वक्, तद्वर्णं इव वर्णो यस्य तत् शुभ्रोज्ज्वलमित्यर्थः, कोशसुप्तम्=कोशावस्थितम्, कोशावस्थितं कृतेवेति भावः, असिम्, स्कन्धेन=अंशप्रदेशेन, तदुपरीति भावः, गृहीत्वा=धृत्वा, कुक्कुरैः=श्वभिः, कुक्कुरीभिः=शुनीभिः, च, वुक्कद्यमानः=शब्द्व्यायमानः, भौं भौं इति शब्दैः अनुगम्यमानः, शृगालः=जम्बूकः, यथा=यद्वत्, तद्वत् अहम्=शकारः, शरणम्=गृहम् 'शरण गृहरक्षित्रोः' इत्यमरः, प्रयामि=प्रधा-वामि । अत्र 'निर्वल्कलम्' 'कोशसुप्तम्' इत्यनयोविरोधपरिहारायेदं वक्तव्यम्—यत् पूर्वं—कोशाद् बहिष्कृतम्, किन्तु तादृशस्य नग्नस्य स्कन्धोपरिस्थापनासम्भवेन पुनः कोशे स्थापितम् अथवा प्रधानपुरुषत्वात् तस्य कोशस्योपरि एकं वस्त्रखण्ड-मप्यासीत्, तद्दूरीकृतम्, केवलं कोश एव तस्य खड्गस्योपरि आसीत् । अथवा शकारवचनत्वात् विरोधो न चिन्तनीयः । अत्रोपमालंकारः, उपजाति वृत्तम् ॥५२॥

विमर्शः— निर्वल्कलम्=वल्कलनिर्मित म्यान से निकाली हुई, तथा कोश-सुप्तम्=म्यान में रखी हुई—इन में परस्पर विरोध है अतः यह मान लेना चाहिए कि ( १ ) म्यान के ऊपर और एक किसी वस्त्र आदि का आवरण रहा होगा जिसे शकार ने निकाल दिया इस प्रकार तलवार म्यान में ही रह गई । ( २ )