मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ११५
(परिक्रम्य निष्क्रान्तो )
विदू०---भोदि ! रदणिए ! ण क्खु दे अअं अवमाणो तत्तभवदो चारु-दत्तस्स णिवेदइदव्वो। दोग्गच्चपीडिअस्स मण्णे दिउणदरा पीडा हुविस्सदि। ( भवति ! रदनिके ! न खलु ते अयमपमानस्तत्रभवतश्चारुदत्तस्य निवेद-यितव्यः। दौर्गत्यपीडितस्य मन्ये द्विगुणतरा पीडा भविष्यति । )
रद०---अज्ज मित्तेअ ! रदणिआ क्खु अहं संजदमुही। ( आर्य ! मैत्रेय ! रदनिका खल्वहं संयतमुखी । )
विदू०---एव्वं णेदं । ( एवं न्विदम् । )
चारु०---[ वसन्तसेनामुद्दिश्य । ] रदनिके ! मारुताभिलाषी प्रदोषसमय-शीतार्त्तो रोहसेनः। ततः प्रवेश्यतामभ्यन्तरमयम्। अनेन प्रावारकेण छादयैनम् । ( इति प्रावारकं प्रयच्छति । )
वसन्त०---( स्वगतम् ) कथं परिअणो त्ति मं अवगच्छदि ! ( प्रावारकं गृहीत्वा समाघ्राय च स्वगतं सस्पृहम् । ) अम्महे ! जादीकुसुमवासिदो पावा-
अथवा पहले नंगी कर ली किन्तु उसे कन्धे पर रखना सम्भव न होने से पुनः कोश = म्यान में रख ली। (३) अथवा शकार तो परस्परविरोधी अथवा असंगत बोलता ही है अतः उसके वक्तव्य की सार्थकता विचारणीय नहीं है। बुक्क्यमानः— बुक्क भषणे, भषणम्=श्वरवः—कुत्ते की आवाज को बुक्क कहते हैं, हिन्दी में जिसे भौं-भौं कहते हैं। यहाँ कर्म ( वाच्य ) में-यक् और शानच् है—$\sqrt{\text{बुक्क}}$+य+शानच्। शरणम्=गृह और रक्षक के लिये प्रयुक्त होता है, यहाँ गृह अर्थ है। इसमें उपमा अलंकार और उपजाति छन्द है।। ५२ ।।
( घूम कर दोनों निकल जाते हैं । )
अर्थ—विदूषक— हे रदनिके ! श्रीमान् चारुदत्त से अपना यह अपमान मत कहना। क्योंकि दरिद्रता से पीड़ित उन्हें दूनी पीड़ा होगी, ऐसा मैं समझता हूँ। ( अर्थात् उन्हें और अधिक मानसिक क्लेश होगा। )
रदनिका— आर्य मैत्रेय ! मैं रदनिका अपने मुख ( जिह्वा ) पर नियन्त्रण रखने वाली हूँ।
**विदूषक—**हाँ, ऐसा ही हो।
चारुदत्त—( वसन्तसेना को लक्षित करके ) वायुसेवन का इच्छुक रोहसेन ( इस समय ) सायंकालीन शीत से व्याकुल ( हो रहा है ) अतः इसे भीतर पहुँचा दो। इस वस्त्र से इसे आवृत कर दो ( उड़ा दो। ) ( इस प्रकार कह कर उत्तरीय =दुपट्टा देता है । )
वसन्तसेना—( स्वगत ) क्या ( धोखे से ) मुझे अपनी नौकरानी समझ रहे हैं ? ( उत्तरीय को लेकर और सूंघ कर, उत्सुकतापूर्वक स्वगत ) अहो !