भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

प्रथमोऽङ्कः ११७

( उपसृत्य रदनिका विदूषकश्च )
विदू०-- भो इअं सा रदणिआ । ( भोः ! इयं सा रदनिका । )
चारु०-- इयं सा रदनिका ! इयमपरा का ?

अविज्ञातावसक्तेन दूषिता मम वाससा ।

वसन्त०-- [ स्वगतम् । ] णं भूविदा । ( ननु भूषिता । )


( विदूषक और रदनिका समीप में जाकर )
अर्थ--विदूषक-- अरे ! वह रदनिका तो यह है ।
अन्वयः-- अविज्ञातावसक्तेन, मम, वाससा, दूषिता, ( या ), शरदभ्रेण, छादिता, चन्द्रलेखा, इव, दृश्यते ॥ ५४ ॥

शब्दार्थ-- अविज्ञातावसक्तेन = अज्ञानता के कारण स्पर्श किये हुये, मम= मुझ चारुदत्त के, वाससा=वस्त्र से, दूषिता=दूषित की गई, ( या=जो यह पर स्त्री है, वह ) शरदभ्रेण=शरदऋतु के मेघ से, छादिता=ढकी हुई, चन्द्रलेखा=चन्द्रमा की कला, इव = के समान, दृश्यते = दिखाई दे रही है अर्थात् शोभित हो रही है ॥ ५४ ॥

टीका-- अविज्ञातावक्तेन = अविज्ञाता अतएवावसक्तेन = अङ्गलग्नेन, यद्वा अविज्ञातेन=अज्ञानेन भावेक्तःबोध्यः अवसिक्तेन, यद्वा मया अविज्ञातायाम् अज्ञान-विषयायाम् अवसिक्तेन = लग्नेन इत्येकमेव पदम्, मम=चारुदत्तस्य, वाससा=उत्तरीयेण, दूषिता = भ्रष्टा, परपुरुषसंसृष्टवस्त्रस्पर्शात् दोषयुक्ता जातेति भावः; या=परस्त्री, शरदभ्रेण = शरत्कालीनमेघेन, छादिता=आवृता, चन्द्रलेखा=चन्द्रस्य इन्दोः लेखा = कला, इव = यथा, दृश्यते=अवलोक्यते । अत्रोपमालंकार, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ५४ ॥

विमर्श-- अविज्ञातावसिक्तेन-(१) इसमें दो पद हैं--(क) अविज्ञाता अत-एव ( ख ) अवसिक्तेन' नहीं मालूम थी अतः शरीर पर रखे हुये वस्त्र से, (२) अविज्ञातं यथा स्यात् तथा-न जानने के कारण स्पर्श किये हुये, ( ग ) कथञ्चित् भाव अर्थ में मानकर अविज्ञातेन = अज्ञानेन, अवसिक्तेन । यहाँ तत्कालीन सामाजिक मान्यता का संकेत मिलता है कि अन्य पुरुष के शरीर से स्पृष्ट वस्त्र का स्पर्श कर लेने मात्र से ही अन्य की स्त्री सतीत्व से पतित हो जाती थी । साथ ही चारुदत्त के चरित्र की उदात्तता भी सूचित होती है । उपमा अलंकार है और पथ्यावक्त्र छन्द है । लक्षण युजोजैन सरिद्भर्तुः पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ॥५४॥

अर्थ--चारुदत्त-- यह ( यह हमलोगों की ) रदनिका है ? तो यह दूसरी कौन है ?
अज्ञानता के कारण मेरे वस्त्र से दूषित हो गई ।
वसन्तसेना-- (अपने में) अरे, मैं तो अलंकृत हुई हूँ ।