मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ | मृच्छकटिकम्
चारु०--
छादिता शरदभ्रेण चन्द्रलेखेव दृश्यते ॥ ५४ ॥
अथवा, न युक्तं परकलत्रदर्शनम् ।
**विदू०--**भो अलं परकलत्तदंसणसङ्काए । एसा वसन्तसेणा कामदेवा-अदणुज्जाणादो पहुदि भवन्तमणुरत्ता । ( भोः ! अलं परकलत्रदर्शनशङ्कया । एषा वसन्तसेना कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति भवन्तमनुरक्ता । )
**चारु०--**अये इयं वसन्तसेना ! । [ स्वगतम् । ]
यया मे जनितः कामः क्षीणे विभवविस्तरे । क्रोधः कुपुरुषस्येव स्वगात्रेष्वेव सीदति ॥ ५५ ॥
**चारुदत्त--**शरद् ऋतु के मेघ से आच्छादित चन्द्रमा की कला के समान दिखाई दे रही है ॥ ५४ ॥
अथवा, दूसरे की स्त्री को देखना ठीक नहीं है ।
**विदूषक--**अरे मित्र ! दूसरे की स्त्री की शंका मत कीजिये । कामदेवायतन नामक उद्यान ( में जाने ) से लेकर आप पर अनुरक्त हो जाने वाली वसन्तसेना है ।
**अन्वयः--**विभवविस्तरे, क्षीणे ( अपि सति ) यया, जनितः, मे, कामः, कुपुरुषस्य, क्रोधः, इव, स्वगात्रेषु, एव, सीदति ॥ ५५ ॥
**शब्दार्थ--**विभवविस्तरे=विस्तृत वैभव, क्षीणे=विनष्ट हो जाने पर (भी), यया=जिस वसन्तसेना के द्वारा, जनितः=उत्पन्न कराया गया, मे=मुझ चारुदत्त का, कामः=कामवासना, कुपुरुषस्य=कायर पुरुष के, क्रोधः इव=गुस्सा के समान, स्वगात्रेषु=अपने शरीर में, एव=ही, सीदति=विनष्ट हो रही है ॥ ५५ ॥
**अर्थ--चारुदत्त--**अरे यह वसन्तसेना है ! ( अपने से )
विपुल धनराशि ( या भाग्य ) विनष्ट हो जाने पर ( भी ) जिस वसन्तसेना द्वारा उत्पन्न कराई गई कामवासना, कायर=असमर्थ पुरुष की गुस्सा के समान, अपने शरीर में ही समाप्त हो जा रही है । ( अर्थात् असमर्थ व्यक्ति क्रुद्ध होने पर भी दूसरे का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है उसका क्रोध अपने शरीर तक ही सीमित रह जाता है उसी प्रकार मेरी कामवासना भी मेरे तक ही सीमित है ॥ ५५ ॥
टीका--विभवविस्तरे=धनादिराशौ, क्षीणे=विनष्टे, सत्यपि, यया=वसन्त-सेनया, जनितः=उत्पादितः, मे=चारुदत्तस्य, कामः=कामुकी प्रवृत्तिः, सम्भोगवासना' कुपुरुषस्य=असमर्थपुरुषस्य, भीरुजनस्य वा, क्रोधः=कोपः, इव=यथा, स्वगात्रेषु=स्वशरीरेषु, एव, अत्र बहुवचनप्रयोगश्चिन्तनीयः, सीदति=विनश्यति, कर्त्तव्या-सामर्थ्यात् प्रव्यक्तो न भवतीति भाव, । अत्रोपमालंकारः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ।