मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः ११६
विदू०--भो वअस्स ! एसो क्खु राजसालो भणादि । ( भो ! वयस्य ! एष खलु राजश्यालो भणति । )
चारु०--किम् ? ।
विदू०--एसा ससुवण्णा सहिलण्णा णव-णाडअ-दंशणुट्ठिदा सूत्तधारिव्व वसन्तसेणा णाम गणिआदालिआ कामदेवाअदणुज्जादो पहुदि तुमं अणुरत्ता, अम्हेहिं बलक्काणुणीअमाणा तुह गेहं पविट्ठा ?
( एषा ससुवर्णा, सहिरण्या नवनाटक-दर्शनोत्थिता सूत्रधारीव वसन्तसेना नाम गणिकादारिका कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति त्वामनुरक्ताऽस्माभिर्बलात्कारानुयमीयमाना तव गेहं प्रविष्टा । )
वसन्त०--[स्वगतम् ।] बलाक्कालाणुणीअमाणेत्ति जं सच्चं अलङ्किदम्हि एदेहिं अक्खरेहिं । (बलात्कारानुनीयमानेति यत्सत्यम्, अलङ्कृताऽस्मि एतैरक्षरैः ।)
अत्र 'अलं परकलत्रशङ्कया' इत्यारभ्य 'अये, इयं वसन्तसेना' इत्यन्तेन नायकोपऽकारिकाया अर्थसम्पत्तेरवगमात् प्रथमं पताकास्थानकमिदम् । तदुक्तम् --
सहसैवार्थसम्पत्तिर्नायकस्योपकारिका ।
पताकास्थानकं सन्धौ प्रथमे तन्मतमिति ॥
अन्ये तु "णं भूषिता=इत्यादिवसन्तसेनोक्त्या 'यया मे जनितः' इत्यादि-चारुदत्तोक्त्या चानयोरन्योन्यमनुरागातिशयवर्णनात् 'तन्निष्पत्तिः परिन्यासः' इति दर्पणोक्तेः परिन्यासो नाम मुखसन्धेरङ्गमित्याहुः ॥ ५५ ॥
विमर्श--स्वगात्रेषु-यह बहुवचन का प्रयोग ठीक नहीं है, क्योंकि 'कुपुरुषस्य' एकवचन है । एक पुरुष का एक ही शरीर होता है । सीदति-षदॢ विशरण-गति-अवसादनेषु, विशरण=अवयवों का विश्लेष, अवसादन=नाश, √षदॢ=सीद + लट्, प्र. पु. ए. व. । पृथ्वीधर के अनुसार यहाँ प्रथम पताकास्थानक है । अन्य लोग मुखसन्धि का परिन्यासनामक अंग मानते हैं ॥ ५५ ॥
अर्थ--विदूषक--हे मित्र ! यह राजश्याल ( शकार ) कहता है--
चारुदत्त--क्या ?
विदूषक--सुवर्ण से अलंकृत, सुवर्ण से युक्त, नवीन नाटक का प्रदर्शन करने के लिये उठकर खड़ी हुई, सूत्रधारी=प्रमुख नटी के समान यह वसन्तसेना नामक वेश्यापुत्री कामदेवायतन नामक उद्यान ( में जाने ) से लेकर तुम पर अनुरक्त हो चुकी है, हम लोगों द्वारा बलपूर्वक मनायी जाती हुई भी तुम्हारे घर के अन्दर चली गयी है ।
वसन्तसेना--( अपने से ) 'बलपूर्वक मनायी जाती हुई' यदि यह सत्य है, तो इन अक्षरों से मैं अलंकृत हो गई हूँ ।