भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः १२१

वसन्त०-—एदिणा अणुचिदभूमिआरोहणेण अवरज्झा अज्जं सीसेण पणमिअ पसादेमि। (एतेनानुचितभूमिकारोहणेन अपराद्धा आर्यं शीर्षेण प्रणम्य प्रसादयामि।)

विदू०भो ! दुवेवि तुम्हे सुखं पणमिअ कलमकेदारा अण्णोण्णं सीसेण सीसं समाअदा। अहं पि इमिणा करहजाणुसरिसेण सीसेण दुवेवि तुम्हे पसादेमि। (भो ! द्वावपि युवां सुखं प्रणम्य कलमकेदारौ अन्योन्यं शीर्षेण शीर्षं समागतौ। अहमपि अमुना करभजानुसदृशेन शीर्षेण द्वावपि युवां प्रसादयामि।) (इत्युत्तिष्ठति)

चारु०-—भवतु, तिष्ठतु प्रणयः। वसन्त०---[स्वगतम्।] चदुरो मधुरो अ अअं उवण्णासो। ण जुत्तं अज्ज एरिसेण इध आअदाए मए पडिवसिदुं। भोदु, एव्वं दाव भणिस्सं। (प्रकाशम्) अज्ज ! जइ एव्वं अहं अज्जस्स अणुग्गेज्झा, ता इच्छे अहं इमं अलङ्कारअं अज्जस्स गेहे णिक्खिविदुं। अलङ्कारस्स णिमित्तं एदे पावा अणुसरन्ति। (चतुरो मधुरश्चायमुपन्यासः। न युक्तमद्य ईदृशेन इह आगतया


घर के भीतर चलीजाओ—यह कही जाती हुई भी, दुर्भाग्य से उपस्थापित दयनीय दशा को देख कर (भीतर) नहीं गयी। (वेश्या होने के नाते) यद्यपि बहुत बोलने वाली है परन्तु इस समय मुझ पुरुष की संगति से धृष्टतापूर्वक अधिक नहीं बोल रही है। अर्थात् चुप-चाप खड़ी है॥ ५६॥

(प्रकाश) माननीये वसन्तसेने ! ठीक से न जानने के कारण अपरिज्ञात (न पहचानी गयी) तुम्हारे साथ नौकरानी के समान व्यवहार करने का अपराधी बन गया हूँ। अतः शिर से आपकी प्रार्थना करता हूँ, मनाता हूँ।

वसन्तसेना—इस भूमि में अनुचित प्रवेश करने से (अथवा पक्षद्वार से अनुचित ढंग से आपके घर में प्रवेश करने से) अपराधिनी मैं आर्य को शिर से प्रणाम करके प्रसन्न कर रही हूँ।

विदूषक—ओ हो ! आप दोनों सुख से प्रणाम करके धान की दो क्यारियों के समान परस्पर शिर से मिल चुके। मैं भी इस समय ऊँट के बच्चे की जांघ के समान (लम्बे) शिर से आप दोनों को प्रसन्न कर रहा हूँ, मना रहा हूँ।

(ऐसा कह कर उठता है।)

चारुदत्त—छोड़ो, प्रणय (औपचारिकता) को जाने दो।

वसन्तसेना—(अपने आप) यह कथन चतुरतापूर्ण और मधुर है। आज इस प्रकार (बिना आमन्त्रित की हुई) आयी हुई मुझे इस (चारुदत्त) के साथ रहना