मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ मृच्छकटिकम्
मया 'प्रतिवस्तुम्। भवतु, एवं तावत् भणिष्यामि। आर्य ! यद्येवम् अहमार्यस्य अनुग्राह्या, तदिच्छाम्यहमिमलङ्कारमार्यस्य गेहे निक्षेप्तुम् । अलङ्कारस्य निमित्तमेते पापा अनुसरन्ति ।)
चारुदत्तः— अयोग्यमिदं न्यासस्य गृहम् ।
वसन्त०— अज्ज ! अलीअं । पुरुसेसु णासा णिक्खिविअन्ति, ण पुण गेहेसु ! ( आर्य ! अलीकम् । पुरुषेषु न्यासा निक्षिप्यन्ते, न पुनर्गेहेषु ।)
चारुदत्तः— मैत्रेय ! गृह्यतामयमलङ्कारः ।
वसन्त०— अणुग्गहिदम्हि । [ इत्यलङ्कारमर्पयति । ] ( अनुगृहीतास्मि । )
विदू०— ( गृहीत्वा । ) सोत्थि भोदिए । ( स्वस्ति भवत्यै । )
चारु०— धिङ् मूर्ख ! न्यासः खल्वयम् !
विदू०— [ अपवार्य । ] जइ एव्वं, ता चोरेहिं अवहरीअदु । ( यद्येवम्, तत् चोरैरपह्रियताम् । )
चारु०— अचिरेणैव कालेन—
विदू०— एसो से अम्हाणं विण्णासो ? । (एषः अस्या अस्माकं विन्यासः ?)
चारु०— निर्यातयिष्ये ।
वसन्त०— अज्ज ! इच्छे अहं इमिणा अज्जेण अणुगच्छिज्जन्ती सकं गेहं गन्तुं । ( आर्य ! इच्छाम्यहम् अनेनार्येण अनुगम्यमाना स्वकं गेहं गन्तुम् । )
ठीक नहीं है। अच्छा, तो इस प्रकार कहती हूँ। ( प्रकाश ) आर्य ! यदि आप के द्वारा मुझ पर इस प्रकार का अनुग्रह किया जा रहा है तो यह स्वर्णाभूषण आपके घर रखना चाहती हूँ। आभूषणों के कारण ही ये पापी लोग मेरा पीछा कर रहे हैं।
**चारुदत्त—**यह ( मेरा घर ) धरोहर रखने योग्य नहीं है।
**वसन्तसेना—**आर्य ! यह असत्य है। अधिकारी पुरुषों के पास में धरोहर रक्खी जाती हैं न कि घरों में।
**चारुदत्त—**मैत्रेय ! यह स्वर्णाभूषण ले लो।
**वसन्तसेना—**मैं अनुगृहीत हूँ। ( यह कह आभूषण दे देती है।
विदूषक— ( लेकर ) आपका कल्याण हो ।
**चारुदत्त—**धिक्कार है मूर्ख ! यह तो धरोहर है।
विदूषक—( अलग हटकर ) यदि ऐसा है तो चोर चुरा ले जाँय ।
**चारुदत्त—**बहुत शीघ्र ही—
**विदूषक—**यह इसकी धरोहर हमारे पास है।
**चारुदत्त—**वापस कर दूंगा ।
**वसन्तसेना—**आर्य मैं इन ( विदूषक ) महोदय के साथ अपने घर जाना चाहती हूँ ।