भारतकोश
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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

१२२ मृच्छकटिकम्

मया 'प्रतिवस्तुम्। भवतु, एवं तावत् भणिष्यामि। आर्य ! यद्येवम् अहमार्यस्य अनुग्राह्या, तदिच्छाम्यहमिमलङ्कारमार्यस्य गेहे निक्षेप्तुम् । अलङ्कारस्य निमित्तमेते पापा अनुसरन्ति ।)
चारुदत्तः— अयोग्यमिदं न्यासस्य गृहम् ।
वसन्त०— अज्ज ! अलीअं । पुरुसेसु णासा णिक्खिविअन्ति, ण पुण गेहेसु ! ( आर्य ! अलीकम् । पुरुषेषु न्यासा निक्षिप्यन्ते, न पुनर्गेहेषु ।)
चारुदत्तः— मैत्रेय ! गृह्यतामयमलङ्कारः ।
वसन्त०— अणुग्गहिदम्हि । [ इत्यलङ्कारमर्पयति । ] ( अनुगृहीतास्मि । )
विदू०— ( गृहीत्वा । ) सोत्थि भोदिए । ( स्वस्ति भवत्यै । )
चारु०— धिङ् मूर्ख ! न्यासः खल्वयम् !
विदू०— [ अपवार्य । ] जइ एव्वं, ता चोरेहिं अवहरीअदु । ( यद्येवम्, तत् चोरैरपह्रियताम् । )
चारु०— अचिरेणैव कालेन—
विदू०— एसो से अम्हाणं विण्णासो ? । (एषः अस्या अस्माकं विन्यासः ?)
चारु०— निर्यातयिष्ये ।
वसन्त०— अज्ज ! इच्छे अहं इमिणा अज्जेण अणुगच्छिज्जन्ती सकं गेहं गन्तुं । ( आर्य ! इच्छाम्यहम् अनेनार्येण अनुगम्यमाना स्वकं गेहं गन्तुम् । )


ठीक नहीं है। अच्छा, तो इस प्रकार कहती हूँ। ( प्रकाश ) आर्य ! यदि आप के द्वारा मुझ पर इस प्रकार का अनुग्रह किया जा रहा है तो यह स्वर्णाभूषण आपके घर रखना चाहती हूँ। आभूषणों के कारण ही ये पापी लोग मेरा पीछा कर रहे हैं।
**चारुदत्त—**यह ( मेरा घर ) धरोहर रखने योग्य नहीं है।
**वसन्तसेना—**आर्य ! यह असत्य है। अधिकारी पुरुषों के पास में धरोहर रक्खी जाती हैं न कि घरों में।
**चारुदत्त—**मैत्रेय ! यह स्वर्णाभूषण ले लो।
**वसन्तसेना—**मैं अनुगृहीत हूँ। ( यह कह आभूषण दे देती है।
विदूषक— ( लेकर ) आपका कल्याण हो ।
**चारुदत्त—**धिक्कार है मूर्ख ! यह तो धरोहर है।
विदूषक—( अलग हटकर ) यदि ऐसा है तो चोर चुरा ले जाँय ।
**चारुदत्त—**बहुत शीघ्र ही—
**विदूषक—**यह इसकी धरोहर हमारे पास है।
**चारुदत्त—**वापस कर दूंगा ।
**वसन्तसेना—**आर्य मैं इन ( विदूषक ) महोदय के साथ अपने घर जाना चाहती हूँ ।

प्रथमोऽङ्कः १२३

चारु०--मैत्रेय ! अनुगच्छ तत्रभवतीम् ।
विदू०--तुमं ज्जेव एदं कलहंसगामिणीं अणुगच्छन्तो राअहंसो विअ सोहसि । अहं उण वह्मणो जंहि तंहि जणेहिं चउप्पहोवणीदो विअ उवहारो कुक्कुरेहिं विअ खज्जमाणो विवज्जिस्सं । ( त्वमेव एतां कलहंसगामिनीम् अनुगच्छन् राजहंस इव शोभसे । अहं पुनर्ब्राह्मणः यस्मिन् तस्मिन् जनैः चतु-ष्पथोउपनीतः इवोपहारः कुक्कुरैरिव खाद्यमानो विपत्स्ये । )
चारु०--एवं भवतु, स्वयमेवानुगच्छामि तत्रभवतीम् । तद्राजमार्गवि-श्वासयोग्याः प्रज्वाल्यन्तां प्रदीपिकाः ।
विदू०--वड्ढमाणअ ! पज्जालेहि पदीविआओ । ( वर्द्धमानक ! प्रज्वा-लय प्रदीपिकाः । )
चेटः-- [ जनान्तिकम् । ] अले ! तेल्लेण विणा पदीविआओ पज्जाली-अन्ति ? । ( अरे ? । तैलेन विना प्रदीपिकाः, प्रज्वाल्यन्ते ? । )
विदू०-- [ जनान्तिकम् । ] भो ! ताओ क्खु अम्हाणं पदीविआओ अव-माणिद-णिद्धण-कामुआ विअ गणिआ णिस्सिणेहाओ दाणिं संवुत्ता । ( भोः ! ताः खल्वस्माकं प्रदीपिकाः, अपमानित-निर्द्धन-कामुका इव गणिकाः, निस्नेहा इदानीं संवृत्ताः । )


चारुदत्त-- मैत्रेय ! सम्माननीया के साथ जाओ ।

विदूषक-- कलहंसी के समान सुन्दर गमन करने वाली इनके साथ जाते हुये राजहंस के समान आप की ही शोभा है । और मैं ( दुर्बल ) ब्राह्मण ( रास्ते में दुष्ट शकारादि के द्वारा ) उसी प्रकार मारा डाला जाऊँगा जिस प्रकार लोगों द्वारा इधर उधर चौराहों पर रखी हुई बलि को कुत्ते खा डालते हैं ।

चारुदत्त-- ऐसा ही हो । इन श्रीमती जी के साथ मैं ही जा रहा हूँ । इस लिये राजमार्ग में विश्वासयोग्य ( अर्थात् न बुझने वाले ) दीपों को जलाओ ।

विदूषक-- वर्द्धमानक ! दीपक जलाओ ।

चेट-- ( अलग विदूषक से ) अरे ! बिना तेल के कहीं दीपक जलाये जाते हैं ।

विदूषक-- ( अलग चेट से ) अरे ? हमारी वे लालटेनें ( प्रदीपिका ), धनहीन कामुक व्यक्तियों को अपमानित करने वाली, वेश्याओं के समान इस समय स्नेहरहित ( प्रेमरहित, तेलरहित ) हो गई हैं ।

टीका--अपरिज्ञातपरिजनापचारेण=अपरिज्ञातायां त्वयि ( वसन्तसेवा याम् ) परिजनवदुपचारेण=आज्ञाकरणादिरूपेण, अपराधः=अपराधी, अनुचितभूमिकारोहेण= भूमिका=चारुदत्तभवनम्, तस्याम् आरोहणम्=प्रवेशः, अनुचितं च यद् भूमिका-रोहणम्, वेश्यात्वात् तव गृहे मम प्रवेशोऽयोग्यः, स मया विहितः अतोऽहमेव तवा-

१२४ | मृच्छकटिकम्

चारु०—मैत्रेय ! भवतु ! कृतं प्रदीपिकाभिः । पश्य—

उदयति हि शशाङ्कः कामिनीगण्डपाण्डुर्गृहगणपरिवारो राजमार्गप्रदीपः ।
तिमिरनिकरमध्ये रश्मयो यस्य गौराः स्रु तजल इव पङ्के क्षीरधाराःपतन्ति॥

पराधीनी, कलमकेदारों=कलमः=शालिविशेषः, 'शालयः कलमाद्याश्च' (अमरकोशः) केदारः=क्षेत्रं ताविव मिलिताविति भावः । करभजानुसदृशेन=करभः=उष्ट्रशिशुः, तस्य जानुः, तत्सदृशेन=समानेन, लम्बायमानेनेत्यर्थः, प्रसादयामि=प्रसन्नौ करवाणि, प्रणयः=स्नेहः, औपचारिकतेति भावः, चतुरः=चातुर्ययुक्तः, मधुरः=माधुर्ययुक्तश्च, उपन्यासः=कथनम्, अलङ्कारकम्-आभूषणम् प्रियार्थे क प्रत्ययः, पापाः=अकार्य-कारिणः शकारादयः, न्यासस्य=निक्षेपस्य, पुरुषेषु=जनेषु, वैषयिकेऽधिकरणे सप्तमी, निक्षिप्यन्ते=स्थाप्यन्ते, निर्यांतयिष्ये=प्रत्यर्पयिष्ये, चतुष्पथोपनोतः=चतुष्पथः=यत्र चत्वारो मार्गा मिलन्ति, तत्र उपनीतः=स्थापितः, उपहारः=बलिः, विपत्स्ये=मरिष्यामि, अपमानितनिर्धनकामुकाः=अपमानिताः निर्धनाः कामुकाः याभिस्ताः, निःस्नेहः=स्नेहः=तैलम्, अनुरागश्च, निर्गतः स्नेहः याभ्यस्ताः, अनुरागशून्याः, तैल-शून्याश्चेतिभावः ।

**विमर्श—**अनुचितभूमिकारोहणेन—इसमें अनुचित यह विशेषण 'भूमिका' का है अथवा आरोहण का ? कुछ लोगों के अनुसार 'भूमिका' का है । वसन्तसेना वेश्या थी, चारुदत्त का घर (भूमिका) उसके प्रवेशयोग्य नहीं था । दूसरे मत में भूमिका-रोहण अनुचित था, उसका घर में प्रवेश करना ही अपराध था । कलमकेदारों—धान और क्यारी । करभ-जानु-सदृशेन—ऊँट के बच्चे की जांघ के समान । प्रणयः = औपचारिकता । प्रतिवस्तुम्—प्रति + $\sqrt{}$वस् + तुमुन्—$\sqrt{}$वस् धातु अनिट् है । अलंकारकम्—प्रिय अर्थ में 'क' प्रत्यय है । अचिरेणैव कालेन—इस चारुदत्त के के कथन को "एष अस्या अस्माकं विन्यासः" इस विदूषकवचन से नहीं जोड़ना चाहिये, अपितु आगे के 'निर्यांतयिष्ये' के साथ मिलाकर अर्थ करना चाहिये । चतुष्पथोपनोतः = चौराहे पर रखा हुआ । विपत्स्ये—मारा जाऊँगा । अपमानित-निर्धनकामुका गणिका इव—निर्धन कामुकों को अपमानित करने वाली वेश्याओं के सदृश । विदूषक का यह कथन वसन्तसेना वेश्या को लक्षित करके चारुदत्त से साभिप्राय कहा गया है । निःस्नेहाः = स्नेह का अर्थ प्रेम और (२) तेल दोनों है । वेश्या प्रेमरहित और प्रदीपिकायें तेलरहित हैं ।

**अन्वयः—**कामिनीगण्डपाण्डुः ग्रहगणपरिवारः, राजमार्गप्रदीपः, शशाङ्कः, उदयति, हि, यस्य, गौराः, रश्मयः, स्रुतजले, पङ्के, क्षीरधाराः, इव, तिमिरनिकर-मध्ये, पतन्ति ॥ ५७ ॥

प्रथमोऽङ्कः १२५

**शब्दार्थ—हि=**निश्चित ही, **कामिनीगण्डपाण्डुः=**सुन्दरी युवती के गालों के समान उज्ज्वल, **ग्रहगणपरिवारः=**ग्रह-नक्षत्ररूपी परिवार वाला, **राजमार्गप्रदीपः=**राजमार्ग पर प्रकाश करने वाला दीपक, **शशाङ्कः=**चन्द्रमा, **उदयति=**उदित हो रहा है, **हि=**निश्चित, **यस्य=**जिस चन्द्रमा की, **गौराः=**श्वेतवर्णवाली उजली, **रश्मयः=**किरणें, **स्रुतजले=**निकले=सूखे हुये जल वाले, **पङ्के=**कीचड़ में, **क्षीरधाराः इव=**दूध की धाराओं के समान, तिमिरनिकरमध्ये = अन्धकारसमूह के मध्य में, **पतन्ति=**गिर रहीं हैं ॥ ५७ ॥

**अर्थ—चारुदत्त—**मैत्रेय ! अच्छा, दीपिकाओं को रहने दो । देखो

सुन्दर युवती के गालों के समान उज्ज्वल, ग्रह-नक्षत्ररूपी परिवार वाला, तथा राजमार्ग का प्रकाशक=दीपक चन्द्रमा निश्चित ही उदित हो रहा है । जिस चन्द्रमा की श्वेत किरणें, सूखे हुये जलवाले (काले) कीचड़ में दूध की धाराओं के समान, अन्धकार के मध्य में गिर रहीं हैं ॥ ५७ ॥

**टीका—कामिनीगण्डपाण्डुः=**कामिन्याः=तरुण्याः गण्डः=कपोल इव पाण्डुः=पाण्डुवर्णः=गौरवर्णः, **ग्रहगणपरिवारः=**ग्रहाणाम्=ग्रहनक्षत्रादीनां गणः=समूह एव परिवारः=परितो वेष्टनकारकः यस्य सः ग्रहनक्षत्रपरिवृतः, **राजमार्गप्रदीपः=**राजमार्गस्य प्रकाशकः दीपः, **शशाङ्कः=**चन्द्रः, **हि=**निश्चयेन, **उदयति=**उद्गच्छति, उदेति, **यस्य=**चन्द्रस्य, **गौराः=**शुभ्राः, **रश्मयः=**किरणाः, **स्रुतजले=**स्रुतम्=निर्गतं जलं यस्मात् तादृशे, **पङ्के=**कर्दमे, **क्षीरधाराः=**दुग्धस्य प्रवाहाः, **इव=**यथा, **तिमिरनिकरमध्ये=**अन्धकार-समूहस्य मध्ये=आभ्यन्तरे, **पतन्ति=**प्रविशन्ति, अन्धकारतां दूरीकृत्य श्वेततामुत्पादयन्ति । उपमा रूपकं चालंकारौ, मालिनी वृत्तम्-तल्लक्षणम्-न-न-म य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥ ५७ ॥

**विमर्श—ग्रहगणपरिवारः=**यहाँ ग्रह का तात्पर्य यह है कि सूर्य के अतिरिक्त सभी ग्रह तारे के रूप में प्रकाशित होते हैं। अतः तारागणरूपी परिवार वाला—इसमें रूपक अलंकार है । कामिनीगण्डपाण्डुः-में सादृश्यवाचक का लोप होने से लुप्तोपमा है और **क्षीरधारा इव-**यहाँ भी उपमा है। जैसे किसी कीचड़ का पानी निकल जाय या सूख जाय और उसमें दूध की धारायें बहा दी जांय उस उस समय जैसा रूप बनता है वैसा ही चन्द्रोदय के समय अन्धकार का बनता है । इसमें मालिनी छन्द है । लक्षण --

'न-न-म-य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकैः ।"

यहाँ चारुदत्त यद्यपि चन्द्रोदय का वर्णन करता है तथापि वसन्तसेना के घर की ओर जाने के अभिनय का कोई संकेत नहीं है । साथ ही आगे चारुदत्त ने वसन्तसेना के घर का संकेत जब किया तो वह अपने घर जाती है । आगे के

१२६मृच्छकटिकम्

( सानुरागम् ) भवति ! वसन्तसेने ! इदं भवत्या गृहम्, प्रविशतु भवती ।

( वसन्तसेना सानुरागमवलोकयन्ती निष्क्रान्ता । )

चारु०--वयस्य ! गता वसन्तसेना । तदेहि, गृहमेव गच्छावः ।

राजमार्गो हि शून्योऽयं रक्षिणः सञ्चरन्ति च ।
वञ्चना परिहर्त्तव्या बहुदोषा हि शर्वरी ॥ ५८ ॥


वर्णन से यह लगता है कि चारुदत्त और मैत्रेय दोनों ही वसन्तसेना के साथ गये थे । इसलिये उदास होकर चारुदत्त कहता है 'मित्र ! वसन्तसेना चली गई, तो हम लोग भी घर ही चलें । जो हो, यहाँ नाटकीय दृष्टि से कुछ अपूर्णता प्रतीत होती है ॥ ५७ ॥

( प्रेम से ) माननीये वसन्त-सेने ! यह आपका घर (आ गया) है । आप इसमें प्रवेश करें ।

( वसन्तसेना अनुराग के साथ देखती हुई निकल गई ) ।

**अन्वयः—**हि, अयम्, राजमार्गः, शून्यः रक्षिणः, च, सञ्चरन्ति, वञ्चना, परिहर्त्तव्या, हि, शर्वरी, बहुदोषा ॥ ५८ ॥

**शब्दार्थः—**हि=निश्चित ही, अयम्=जिस पर हम लोग चल रहे हैं वह, राजमार्गः=प्रमुख रास्ता, शून्यः=यातायात से रहित है, रक्षिणः=सिपाही लोग, सञ्चरन्ति=गस्त लगा रहे हैं । वञ्चना=( वसन्तसेना के अलंकारों की ) चोरी रूपी ठगाई को, परिहर्त्तव्या=बचाना है, हि=क्योंकि, शर्वरी=रात, बहुदोषा=बहुत प्रकार के दोषों से भरी होती है ॥ ५८ ॥

**अर्थ—चारुदत्त—**मित्र ! वसन्तसेना चली गई । अतः चलो, हम दोनों भी घर चलें ।

( श्लोकार्थ ) अधिक देर हो चुकी है ) निश्चित रूप से, यह राजमार्ग आने जानेवालों से रहित है और राजपुरुष (सिपाही) लोग गस्त लगा रहे हैं । (वसन्त-सेना के स्वर्णाभूषणों की चोरी रूपी ) ठगाई को बचाना है क्योंकि रात बहुत दोषों से परिपूर्ण होती है, अर्थात् रात में ही अनेक अपराध होते हैं ॥ ५८ ॥

टीका— हि=यतः, अयम् = अस्माभिः आश्रीयमाणः, राजमार्गः = राजपथः, प्रमुखमार्गः, शून्यः = गमनागमनकर्तृ रहितः, च = तथा, रक्षिणः = रक्षापुरुषाः, सञ्चरन्ति=इतस्ततः भ्राम्यन्ति, वञ्चना=वसन्तसेना-स्वर्णाभूषणापहाररूपा प्रतारणा, परिहर्त्तव्या = निवारणीया, हि=यतः, शर्वरी = रात्रिः, बहुदोषा=विविधापराध-कृत्यपरिपूर्णा भवति । अतः वसन्तसेनायाः आभूषणानां रक्षार्थमस्माभिः शीघ्रं गन्तव्यमिति भावः । अर्थान्तरन्यासः अलंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ५८ ॥

प्रथमोऽङ्कः १२७

(परिक्रम्य ।) इदञ्च सुवर्णभाण्डं रक्षितव्यं त्वया रात्रौ, वर्द्धमानके-नापि दिवा।

विदू०-जध भवं आणवेदि । ( यथा भवानाज्ञापयति ।)

इति निष्क्रान्तौ।

।। इति मृच्छकटिकेऽलङ्कारन्यासो नाम प्रथमोऽङ्कः ।।


**विमर्श-**चारुदत्त के मन में यह आशंका होने लगी कि कहीं राजश्यालक या उसके किसी सम्बन्धी ने रात में देख लिया तो पकड़ लिये जाने की सम्भावना है। साथ ही वसन्तसेना के स्वर्णाभूषण टूटे फूटे घर में रखे हैं। कोई भी चुरा सकता है। अतः यथाशीघ्र ही घर चलना अनिवार्य है क्योंकि अधिकांश अपराध कार्य रात में ही हुआ करते हैं। यहाँ काव्यलिङ्ग तथा अर्थान्तरन्यास की अङ्गाङ्गि-भावने स्थिति होने से संकर अलंकार है और पथ्यावक्र छन्द है ।। ५८ ।।

(घूमकर ) इस स्वर्णाभूषणों के डिब्बा की रक्षा रात में आपको करनी है और दिन में वर्द्धमानक को ।

विदूषक- आपकी जैसी आज्ञा ।

( इस प्रकार दोनों चले जाते ।)

।। इस प्रकार मृच्छकटिक में अलङ्कारन्यास ( आभूषणों की धरोहर ) नामक प्रथम अङ्क समाप्त हुआ ।।

।। जयशङ्कर-लाल-त्रिपाठि-विरचित भावबोधिनी-व्याख्या में मृच्छकटिक का प्रथम अङ्क समाप्त हुआ ।।

द्वितीयोऽङ्कः (द्यूतकर-संवाहक)

द्वितीयोऽङ्कः

( प्रविश्य )

चेटी—अत्ताए अज्जआसआसं सन्देसेण पेसिदम्हि। ता जाव पविसिअ अज्जआसआसं गच्छामि। (परिक्रम्यावलोक्य च) एसा अज्जआ हिअएण किंपि आलिहन्ती चिट्ठदि। ता जाव उपसप्पामि। (मात्रा आर्यासकाशं सन्देशेन प्रेषितास्मि। तद्यावत् प्रविश्य आर्यासकाशं गच्छामि। एषा आर्या हृदयेन किमप्यालिखन्ती तिष्ठति। तद्यावत् उपसर्पामि।)

(ततः प्रविशति आसनस्था सोत्कण्ठा वसन्तसेना मदनिका च।)
वसंत०---हञ्जे! तदो तदो?। (चेटि! ततस्ततः?)
चेटी—अज्जए! ण किंपि मन्तेसि। किं तदो तदो?। (आर्ये! न किमपि मन्त्रयसि। किं ततस्ततः?)
बसन्त०---किं मए भणिदं?। (किं मया भणितम्?)
चेटी—तदो तदो ति। (ततस्तत इति?)


शब्दार्थः— मात्रा=वसन्तसेना की माता के द्वारा, आर्यासकाशम्=सम्माननीय वसन्तसेना के पास, सन्देशेन=सन्देश के साथ या सन्देश देने के कारण, प्रविश्य=उसके कमरे में प्रवेश करके, हृदयेन=मन से, आलिखन्ती=सोचती हुई, उपसर्पामि=पास जाती हूँ, सोत्कण्ठा=उत्कण्ठायुक्त, मन्त्रयसि=कह रही हो, सभ्रूविक्षेपम्=भौंह को टेढ़ी करते हुये, आम्=अच्छा, हाँ, स्नाता=नहायी हुई, निवर्तय=सम्पन्न करो, हञ्जे=सखि।

अर्थ--चेटी- (प्रवेश करके) माता ने मुझे माननीया वसन्तसेना के पास सन्देश के साथ भेजा है। तो तब तक प्रवेश करके आर्या के पास जाती हूँ। (घूमकर और देख कर) यह आर्या मन से (में) कुछ सोचती हुई बैठी हैं। तो इनके समीप चलती हूँ।

(इसके बाद आसन पर बैठी हुई, उत्कण्ठित, वसन्तसेना और मदनिका प्रवेश करतीं हैं।)

वसन्तसेना—सखि! इसके बाद?
चेटी—आर्ये! आपने कुछ भी तो नहीं कहा है। तब 'उसके बाद?' (ऐसा) क्यों (पूछ रही है)?
वसन्तसेना—मैंने क्या कहा?
चेटी--'इसके बाद' ऐसा।

द्वितीयोऽङ्कः १२९

वसन्तसेना--( सभ्रूक्षेपम् । ) आं एव्व ? । ( आम् एवम् ? । )
(उपसृत्य)
प्रथमा चेटी--अज्जए ! अत्ता आदिसदि-ण्हादा भविअ देवदाणं पूअं णिव्वत्तेहि त्ति । ( आर्ये ! माता आदिशति-स्नाता भूत्वा देवतानां पूजां निर्वर्तयेति । )
वसन्तसेना--हज्जे ! विण्णवेहि अत्तं, अज्ज ण ण्हाइस्सं ता वम्हणो ज्जेव पूअं णिव्वत्तेदु त्ति । ( हञ्जे ! विज्ञापय मातरम्, अद्य न स्नास्यामि । तद् ब्राह्मण एव पूजां निर्वर्तयतु इति । )
चेटी--जं अज्जआ आणवेदि । (इति निष्क्रान्ता ।) (यदार्य्या आज्ञापयति ।)


वसन्तसेना---( भौं घुमाते हुये ) अच्छा, ऐसा है ।
( पास जाकर )
पहली चेटी---आर्ये ! माता जी यह आज्ञा दे रही हैं -'नहाकर देवताओं की पूजा सम्पन्न कर डालो ।'
वसन्तसेना--सखि ! माता जी से यह कहो कि मैं आज नहीं नहाऊँगी । अतः ब्राह्मण ही पूजा सम्पन्न करें ।
चेटी--आपकी जैसी आज्ञा । ( ऐसा कहकर निकल जाती है । )

टीका--मात्रा=वसन्तसेनाया जनन्या, आर्यासकाशम्=आर्य्यायाः=वसन्तसेनायाः सकाशम्=समीपम्, सन्देशेन=वाचिकेनादेशेन, आलिखन्ती=विचिन्तयन्ती, उपसर्पामि=समीपं गच्छामि, आसनस्था=आसने विराजमाना, सोत्कण्ठा=उत्कण्ठया=औत्सुक्येन सह, मन्त्रयसि=कथयसि, भणितम्=कथितम्, आम्=स्मरणार्थकं स्वीकृतिसूचकमव्ययम्, विज्ञापय=निवेदय ।

विमर्शः---सन्देशेन-यहाँ 'साथ' अथवा 'हेतु' अर्थ में तृतीया है । आलिखन्ती-आङ् उपसर्ग के साथ लिख धातु का अर्थ 'सोचना' हो जाता है । मन्त्रयसि-चुरादिगणीय √मत्रि गुप्तभाषणे धातु लट्लकार प्रथमपुरुष एकवचन । भणितम्-√भण् + क्त । आदिशति-आङ् + दिश् + लट् लकार प्र. पु. ए. व. । आज्ञापयति-आङ् उपसर्ग चुरादि गणीय √ज्ञा ( नियोगे ) धातु से स्वार्थिक णिच्, पुक्-आ + ज्ञाप् + इ-लट प्र. पु. ए. व. । हज्जे-सखी का सम्बोधन का रूप-'हण्डेहञ्जे हलाह्वानं नीचां चेटीं सखीं प्रति ।' अमरकोश १ । ७ । १५

शब्दार्थ---स्नेहः=प्रेम, पुरोभागिता=छिद्रान्वेषिता, शून्यहृदयत्वेन=शून्य हृदयवाली होने से, हृदयगतम्=मन में बैठे हुये, परहृदय-ग्रहण-पण्डिता=दूसरे के हृदय के भाव को समझने में चतुर, कामः=कामदेव, अनुगृहीतः=अनुगृहीत

६ मृ०

१३० मृच्छकटिकम्

मदनिका—अज्जए ! सिणेहि पुच्छदि ण पुरोभाइदा, ता किं णेदं ? । ( आर्ये ! स्नेहः पृच्छति, न पुरोभागिता, तत् किं न्विदम् ? )

वसन्तसेना—मदणिए ! केर्रिसि मं पेक्खसि ? । ( मदनिके ! कीदृशीं मां प्रेक्षसे ? )

मदनिका—अज्जआए सुण्णहिअअत्तणेण जाणामि-हिअअगदं कंपि अज्जआ अहिलसदि त्ति । ( आर्यायाः शून्यहृदयत्वेन जानामि, हृदयगतं कमपि आर्या अभिलषतीति । )

वसन्तसेना—सुट्ठु तुए जाणिदं । परहिअअग्गहणपण्डिआ मदणिआ क्खु तुमं । ( सुष्ठु त्वया ज्ञातम् । परहृदयग्रहणपण्डिता मदनिका खलु त्वम् । )

मदनिका—पिअं मे पिअं । कामो क्खु णाम असो भअवं अणुगहीदो महूसवो तरुणजणस्य । ता कहेदु अज्जआ, कि राआ राअवल्लहो वा सेवीअदि ? ( प्रियं मे प्रियम् । कामः खलु नामैष भगवाननुगृहीतो महोत्सवस्तरुणजनस्य । तत् कथयतु आर्या, किं राजा राजवल्लभो वा सेव्यते ? )

वसन्तसेना—हज्जे रमिदुमिच्छामि, ण सेविदुं । (हज्जे ! रन्तुमिच्छामि, न सेवितुम् । )


हुआ, महोत्सवः=बहुत बड़ा उत्सव, रन्तुम्=रमण करने के लिये, अनेक-नगरा-भिगमन-जनित-विस्तारः=अनेक नगरों में ( व्यापारादि के लिये ) जाने से बढ़ी हुई धन सम्पत्तिवाला, काम्यते=चाहा जाता है ।

अर्थमदनिका—( तुम्हारे प्रति मेरा ) प्रेम यह पूछ रहा है न कि छिद्रान्वेषण का भाव ।

वसन्तसेना—मदनिके ! तुम मुझे कैसी देख रही हो ?

मदनिका—आर्या के शून्य हृदय वाली होने से समझती हूँ कि आर्या हृदय में विराजमान किसी को चाह रहीं हैं ।

वसन्तसेना—तुमने बिल्कुल ठीक समझा । दूसरे के हृदय की भावना को समझने में चतुर तुम मदनिका हो ।

मदनिका—यह तो मेरे लिये बहुत अच्छा है, बहुत अच्छा है । यह तो भगवान कामदेव अनुगृहीत हुआ जो कि समस्त युवकों का महान उत्सव है । तो आर्या बतलावें कि क्या कोई राजा अथवा राजा का प्रिय आपके द्वारा चाहा जा रहा है ?

वसन्तसेना—रमण ( कामक्रीडा ) करना चाहती हूँ न कि ( किसी धनी की ) सेवा करना ।

द्वितीयोऽङ्कः १२१

मदनिका—विज्जाविसेसालङ्किदो किं को वि बह्मणजुवा कामोअदि ?
( विद्याविशेषालंकृतः किं कोऽपि ब्राह्मणयुवा काम्यते ? )
वसन्तसेना—पूअणीओ मे वम्हणजणो ! ( पूजनीयो मे ब्राह्मणजनः । )
मदनिका—किं अणेअ-णअराभिगमण-जणिद-विहव-वित्धारो वाणिअ-जुवा वा कामीअदि । ( किम् अनेक-नगराभिगमन-जनित-विभवविस्तारो वाणिज-युवा वा काम्यते ? )

मदनिका— तो क्या तुम विशेषविद्या के पारंगत किसी ब्राह्मण युवक को चाह रही हो ?
वसन्तसेना— ब्राह्मण लोग तो मेरे पूजायोग्य हैं ।
मदनिका— तो फिर क्या अनेक नगरों में व्यापार के लिये घूम कर विस्तृत वैभव रखने वाले युवा व्यापारी को चाह रही हो ?

टीका— स्नेहः=अनुरागः, पुरोभागिता=दोषैकदर्शिता, ‘दोषैकदृक् पुरो भागी’ त्यमरः, कीदृशीम्=कीदृशरूपाम्, शून्यहृदयत्वेन=शून्यम्=अविद्यमानं हृदयं यस्याः सा तस्याः भावस्तेन, अन्यमनस्कतयेति भावः, परहृदयग्रहणपण्डिता=अन्यदीय-हृद्गतभावग्रहणचतुरा, मदनिका=मदनः=कामः अस्ति यस्याः सा, कामयुक्तेतिभावः, अन्वर्थकनामवती त्वमसीति बोध्यम्, तरुण-जनस्य=युवजनस्य, महोत्सवः=महान् चासौ उत्सवः=हर्षः, अनुगृहीतः=अनुकम्पितः, राजवल्लभः=राजप्रियः, रन्तुम्=क्रीडितुम्, सेवितुम्=शुश्रूषितम्, विद्याविशेषालंकृतः=विद्याविशेषे पारङ्गतः, काम्यते=अभिलष्यते, पूजनीयः = पूजायोग्यः, अनेक-नगराभिगमन-जनित-विभवविस्तारः=अनेक-नगरेषु व्यापारार्थमभिगमनेन जनितः=उत्पादितः, अर्जितः, विभवस्य=धनादेः, विस्तारः=आधिक्यम्, यस्य सः, वाणिजयुवा=वणिक्तरुणः ।

विमर्श— ‘को क्खु णाम अज्ज अत्तभोदिये अणुग्गहिदो महूसवे तरुणजणो’ प्राकृत का ‘कः खलु नाम अद्य अत्रभवत्या अनुगृहीतो महोत्सवे तरुणजनः,’ यह भी पाठान्तर उपलब्ध होता है । यहाँ जो पाठ रखा गया है उसमें पूरा एक वाक्य मानकर अर्थ करना चाहिये । पुरोभागिता - ‘दोषैकदृक् पुरोभागी’ ( अमरकोश ३।१।४६) के अनुसार - दोष देखने वाला पुरोभागी कहा जाता है । भाव अर्थ में तल् प्रत्यय करके तृतीया एकवचन का रूप है । रन्तुमिच्छामि न सेवितुम् .... वसन्तसेना का आशय यह है कि मैं इच्छानुसार कामोपभोग करना चाहती हूँ न कि किसी धनसम्पन्न पुरुष की सेवा में उपस्थित होकर उसकी इच्छानुसार चलना चाहती हूँ । वाणिजयुवा — ‘वैदेहकः सार्थवाहः, नैगमो वाणिजो वणिक्’ ( अमरकोश २।६।७८ ) के अनुसार वाणिज शब्द भी है ।

१३२ मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना—हञ्जे ! उवारूढसिणेहं पि पणइजणं परिच्चहअ देसंतरागम- णेण वाणिअजणो महन्तं विओअजं दुक्खं उप्पादेदि । ( हञ्जे ! उपारूढस्नेह- मपि प्रणयिजनं परित्यज्य देशान्तरगमनेन वाणिजजनो महत् वियोगजं दुःखमुत्पा- दयति । ) मदनिका—अज्जए ! ण राजा, ण राजवल्लहो, ण बम्हणो, ण वाणिअ- जणो ! ता को दाणि सो भट्टिदारिआए कामीअदि ? ( आर्ये ! न राजा, न राजवल्लभः न ब्राह्मणः, न वाणिग्जनः । तत् क इदानीं सः भर्तृदारिकया काम्यते ? ) वसन्तसेना—हञ्जे ! तुमं मए सह कामदेवाअदणुज्जाणं गदा आसि। ( हञ्जे ! त्वं मया सह कामदेवायतनोद्यानं गता आसीः ? ) मदनिका—अज्जए ! गदह्नि । ( आर्ये ! गतास्मि । ) वसन्तसेना—तहवि मं उदासीणां विअ पुच्छसि ? (तथापि मामुदासीनेव पृच्छसि ? ) मदनिका—जाणिदं । किं सो ज्जेव्व जेण अज्जआ सरणाअदा अब्भुव- वण्णा ? ( ज्ञातम् । कि स एव, येनार्य्या शरणागता अभ्युपपन्ना ? )


शब्दार्थ—उपारूढस्नेहम् = अत्यन्त प्रेमयुक्त, प्रणयिजनम् = अनुरागी व्यक्ति को, कामदेवायतनोद्यानम् = कामदेवायतन नामक बगीचा में, उदासीनेव = अनभिज्ञ सी, शरणागता = शरण में आई हुई, अभ्युपपन्ना = स्वीकार करली गई थी, किन्ना- मधेयः = किस नामवाला, श्रेष्ठिचत्वरे = सेठों की चोक में, सुगृहीतनामधेयः = सम्माननीय नाम वाले, दरिद्र-पुरुषसंक्रांतमनाः = दरिद्र पुरुष में मन रमाने वाली, अवचनीया = अनिन्दनीय ।

अर्थ—वसन्तसेना— सखि ! अत्यधिक प्रेम करने वाले भी जन ( प्रेयसी या पत्नी ) को छोड़कर विदेशगमन के द्वारा बनियां लोग बहुत अधिक दुःख उत्पन्न कराते हैं ।

मदनिका— आर्ये ! न राजा, न राजा का प्रिय, न ब्राह्मण और न वणिक् जन ( को चाहती हो । ) तो इस समय वह कौन है जिसे आदरणीया आप चाह रहीं है ?

वसन्तसेना— सखि ! तुम मेरे साथ कामदेवायतन उद्यान में गई थी ?

मदनिका— आर्ये ! गई थी ।

वसन्तसेना— तो भी अनभिज्ञ सी ( होकर ) मुझ से पूछ रही हो ।

मदनिका— समझ गई । क्या उन्हें ही (चाह रही हैं), जिन्होंने शरण में आई हुई आपको स्वीकार कर अनुगृहीत किया था ?

द्वितीयोऽङ्कः १३३

वसन्तसेना--किं णामहेओ क्खु सो ? (किंनामधेयः खलु सः ? )
मदनिका--सो क्खु सेट्ठिचत्तरे पडिवसदि। ( स खलु श्रेष्ठिचत्वरे प्रतिवसति । )
वसन्तसेना--अइ ! णामं से पुच्छिदासि। ( अयि ! नामास्य पृष्टासि । )
मदनिका--सो क्खु अज्जए ! सुग्गहीदणामहेओ अज्जचारुदत्तो णाम। ( स खलु आर्ये ! सुगृहीतनामधेय आर्यचारुदत्तो नाम । )
वसन्तसेना--( सहर्षम् । ) साहु ! मदणिए ! साहु। सुट्ठु तुए जाणिदं। ( साधु मदनिके ! साधु, सुष्ठु त्वया ज्ञातम् ! )
मदनिका--( स्वगतम् ) एवं दाव । ( प्रकाशम् ) अज्जए ! दलिद्दो क्खु सो सुणीअदि। ( एवं तावत् । आर्ये ! दरिद्रः खलु स श्रूयते । )
वसन्तसेना--अदो ज्जेव कामीअदि। दलिद्दपुरिससङ्कन्तमणा क्खु गणिआ लोए अवंचणीआ भोदि। ( अत एवं काम्यते ! दरिद्रपुरुषसंक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवर्चनीया भवति । )


वसन्तसेना--उनका क्या नाम है ?
मदनिका--वे सेठों की चौक ( वस्ती ) में रहते हैं ।
वसन्तसेना--मैंने उनका नाम पूछा है ।
मदनिका--आर्ये ! सुन्दर नामवाले वे आर्य चारुदत्त हैं ।
वसन्तसेना--( हर्ष के साथ ) वाह मदनिके ! वाह, तुमने ठीक समझा ।
मदनिका--( अपने आप ) तो अब ऐसा ( कहूँ ) । ( प्रकट रूप से ) आर्ये ! सुना जाता है कि वे दरिद्र हैं ।
वसन्तसेना--इसीलिए तो चाहती हूँ ( प्रेम करती हूँ । ) क्योंकि निर्धन पुरुष से प्रेम करने वाली वेश्या की निन्दा लोक में नहीं होती है ।

**टीका--**उपारूढस्नेहम्=उपारूढः=विवृद्धः, स्नेहः=अनुरागः यस्य तं तादृशम्, प्रणयिजनम्=अनुरागिजनम्, उदासीना इव= अनभिज्ञा इव, शरणागता = शरणम् आश्रयम्, याचमाना आगता, शरणार्थिनी इति भावः, अभ्युपपन्ना=शरणप्रदानेना-नुकम्पिता, किन्नामधेयः=किन्नामकः, नामशब्दात् स्वार्थे धेयप्रत्ययः, सुगृहीतनाम-धेयः=सुगृहीतम् = दातृत्वेन सुष्ठु गृहीतं नामधेयं यस्य सः, दरिद्र-पुरुष-सङ्क्रान्त-मनाः=सङ्क्रान्तम्=अत्यनुरक्तम्, मनः=चित्तम्, दरिद्रपुरुषे = निर्धनजने सङ्क्रान्तं मनो यस्याः सा, एतादृशी, अवचनीया = अनिन्दनीया, धनलोलुपा वेश्या इति प्रसिद्धिविरुद्धाचरणात् मम निन्दा नैव भविष्यतीति भावः ।

विमर्शः--शरणागता--'शरणं गृहरक्षित्रोः' अमरकोश के अनुसार रक्षक के समीप आयी । अभ्युपपन्ना--अभि उप इन दो उपसर्गों के साथ--√ पद् + क्त में द् + त = न्न होने के बाद स्त्री प्रत्यय-टाप् है ।

१३४मृच्छकटिकम्

मदनिका--अज्जए ! किं हीणकुसुमं सहआरवादवं महुअरीओ उण सेवन्ति ? ( आर्ये ! किं हीनकुसुमं सहकारपादपं मधुकर्य्यः पुनः सेवन्ते ? )

वसन्तसेना--अदो ज्जेव तावो महुअरीओ वुच्चन्ति । ( अत एव ता मधुकर्य्य उच्यन्ते )

मदनिका--अज्जए ! जइ सो मणीसिदो, ता कीसदाणिं सहसा ण अहिसारीअदि ? ( आर्ये ! यदि स मनीषिताः, तत् किमर्थमिदानीं सहसा नाभिसार्य्यते ? )

वसन्तसेना--हज्जे ! सहसा अहिसारीअन्तो पच्चआरदुव्वलदाए मा दाव सो जणो दुल्ल्हदंसणो पुणो भविस्सस्सदि । ( हञ्जे ! सहसा अभिसार्य्यमाणः प्रत्युपकारदुर्बलतया मा तावत् स जनो दुर्लभदर्शनः पुनर्भाविष्यति । )

मदनिका--किं अदो ज्जेव सो अलङ्कारओ तस्स हत्थे णिक्खित्तो ? । ( किम् अत एव सोऽलङ्कारस्तस्य हस्ते निक्षिप्तः ? )

वसन्तसेना--हज्जे ! सुट्ठु दे जाणिदं । ( हञ्जे ! सुष्ठु ते ज्ञातम् । )

( नेपथ्ये )

अले भट्टा ! दश--सुवण्णस्स लुद्ध जूदअरु पपलीणू पपलीणू । ता गेण्ह, गेण्ह, चिट्ठ, चिट्ठ, दूलात् पद्दिट्ठोसि ? । ( अरे भट्टारक ! दशसुवर्णस्य रुद्धो द्यूतकरः प्रपलायितः प्रपलायितः । तद् गृह ण, गृहाण ! तिष्ठ तिष्ठ, दूरात् प्रदृष्टोऽसि )


नामधेयः--भाग, रूप, नाम शब्दों से स्वार्थ में 'धेय' प्रत्यय होता है ।
अवचनीया--वच् + अनीयर् निन्दा अर्थ में है, न वचनीया = अवचनीया ।

अर्थ--मदनिका--क्या फूलों ( मञ्जरियों ) से हीन आम के वृक्ष का पुनः सेवन मधुकरियां ( भ्रमरियां ) करती हैं ?

वसन्तसेना--इसीलिए तो उन्हें मधुकरी कहा जाता है ।

मदनिका--आर्ये ! यदि वह आपका मनपसन्द है तो इसी समय क्यों नहीं छिपकर उससे मिलती हैं ?

वसन्तसेना--गुप्त रूप से ( अचानक ) मिलने पर ( धन आदि देकर ) प्रत्युपकार ( बदला ) करने में असमर्थ होने के कारण कहीं ऐसा न हो जाय कि पुनः उनका दर्शन ही न हो सके ।

मदनिका--क्या इसी लिये वह स्वर्णाभूषण उनके हाथ में ( धरोहर रूप से ) रखा गया है ?

वसन्तसेना--तुमने ठीक समझा ।

( नेपथ्य में )

अरे स्वामिन् ! दश सुवर्ण ( उस समय प्रचलित सिक्का आदि ) के कारण पकड़ पर रखा गया जुआँरी भाग गया, भाग गया । अतः पकड़ो, पकड़ो, ठहरो ठहरो, दूर से तुझे देख लिया है ।

द्वितीयोऽङ्कः १३५

( प्रविश्य अपटीक्षेपेण संभ्रान्तः । )

संवाहकः—कट्टे एशे जूदिअलभावे। हीमाणाहे ! (कष्ट एष द्यूतकरभावः। आश्चर्यम् !)


**टीका—**हीनकुसुमम्=हीनानि=निर्गतानि कुसुमानि यस्मात् यस्य वा तम्, मञ्जरीरहितम्, सहकारपादपम्=आम्रवृक्षम्, मधुकर्य्यः=भ्रमर्य्यः, न सेवन्ते=नैवाश्रयन्ति । मधुकर्य्यः=मधु=क्षौद्रं कुर्व्वन्ति इति अन्वर्थोपपादनार्थं पुष्पितसहकारवृक्षस्यैव सेवनमावश्यकमित्यर्थः। अत्र पृथ्वीधरः- मधुकुर्व्वन्ति=सेवन्ते, मत्ता इत्यर्थः । मधु कुर्व्वन्त्येव केवलं न स्वयं सेवन्ते । तथा गणिका धनार्थमेव केवलं स्वदेहं परोपकरणीकृत्य अलब्धरतयो वृथाजन्मभाजो भवन्तीत्यर्थः ।' मनीषितः=मनसः=हृदयस्य, ईषितः=वाञ्छितः, सहसा=झटिति अविचारपूर्वकमिति भावः, अभिसार्यते=दूत्यादिद्वारा स्वयं वाऽभिसारः क्रियते, सहसा=विस्रम्भोत्पादनात् पूर्वमेव, अभिसार्यमाणः = अभिसरणविषयीक्रियमाणः, प्रत्युपकारदुर्बलतया = प्रत्युपकारे=ममाभिसरणरूपोपकारस्य प्रतिदाने, दुर्बलतया=असमर्थतया धनाद्यभावादित्यर्थः, दुर्लभदर्शनः=दुर्लभम्=दुष्प्राप्यम्, दर्शनम्=साक्षात्कारः मेलनं वा, मा भविष्यतीत्यत्र काकुः, न भविष्यति ? अर्थात् प्रत्युपकारासमर्थतया व्रीडया न कदाप्यात्मानं मां दर्शयिष्यति अतो न सहसाऽभिसार्यते । निक्षिप्तः=स्थापितः । दशसुवर्णस्य=दशानां सुवर्णानां समाहारः दशसुवर्णम्, तस्य=तात्कालिक-दशसंख्याक-सुवर्ण-मुद्रासमूहस्येत्यर्थः, हेतौ षष्ठी । रुद्धः=तद्दानाय परिगृहीतः, गृहाण=धारय, प्रदृष्टोऽसि=अवलोकितोऽसि मयेति शेषः । 'नासूचितस्य पात्रस्य प्रवेशो निर्गमोऽपि च' इत्युक्तेः पलायमानस्य संवाहकस्य प्रवेशं सूचयन्नेपथ्ये माथुरो वदति—'अले भट्टा' इत्यादि ।

**विमर्शः—**मधुकर्यः=मधु को बनाती या एकत्रित ही करती हैं, स्वयं सेवन नहीं कर पाती हैं । इसी प्रकार वेश्यायें भी धनादि के लिये अपने शरीर का विक्रय करती है, रतिसुख नहीं पाती हैं अतः उनका जन्म व्यर्थ है । दुर्लभदर्शनः मा भविष्यति—वसन्तसेना का आशय यह है कि जब तक उसे मुझपर पूरा विश्वास नहीं हो जाता है, तब तक अचानक मिलना ठीक नहीं है । क्योंकि आवेश में कुछ करने के बाद वह उसके प्रत्युपकार-स्वरूप धनादि मुझे नहीं दे सकेगा । फलस्वरूप अत्यन्त लज्जित होकर फिर कभी भी नहीं मिलना चाहेगा । अतः मुझे पहले उसका विश्वास जीतना है । दशसुवर्णस्य उस समय सोने का प्रचलित सिक्का आदि रहा होगा । अभिसारिका—

अभिसारयते कान्तं या मन्मथवशम्वदा ।
स्वयं वाभिसरत्येषा धीरैरुक्ताभिसारिका ॥

१३६ | मृच्छकटिकम्

णव-बन्धण-मुक्काए विअ गद्दहीए हा ! ताडिदोम्हि गद्दहीए । अङ्गलाअमुक्काए विअ शत्तीए घडुक्को विअ घादिदोम्हि शत्तीए ॥१॥ ( नव-बन्धन-मुक्तयेव गर्दभ्या हा ताडितोऽस्मि गर्दभ्या । अङ्गराज-मुक्तयेव शक्त्या घटोत्कच इव घातितोऽस्मि शक्त्या ॥ १ ॥ )


अन्वयः—हा ! नवबन्धनमुक्तया, गर्दभ्या, इव, गर्दभ्या, ताडितः, अस्मि, अङ्गराजमुक्तया, शक्त्या, घटोत्कचः, इव, शक्त्या, ( अहम् ) घातितः, अस्मि ॥ १ ॥

शब्दार्थः—हा=हाय ? नवबन्धनमुक्तया=पहली बार बनाये गये बन्धन से छूटी हुई, ( खुलकर भागती हुई ), गर्दभ्या इव=गधी के समान, गर्दभ्या=जुआ खेलने की कौड़ी के द्वारा, ताडितः=मारा गया हूँ, अङ्गराजमुक्तया = कर्ण के द्वारा चलायी गयी ( छोड़ी गयी ), शक्त्या = शक्तिनामक अस्त्रविशेष के द्वारा, घटोत्कचः=भीमसेन एवं हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच के, इव=समान, शक्त्या=ज्यूय की कौड़ी की एक विशेष चाल के द्वारा, ( अहम्=मैं संवाहक ), घातितः=मारा गया, अस्मि=हूँ ॥ १ ॥

( बिना पर्दा उठाये घबराये हुये प्रवेश करके )

अर्थसंवाहक—आश्चर्य ? जुआरीपन बड़ा ही कष्टदायक है—हाय ! सबसे पहले लगाये गये बंधन ( रस्सी ) आदि से छूटी हुई ( भागती हुई ) गधी के समान गर्दभी ( जुये में प्रयुक्त होने वाली कौड़ी अथवा पाशा ) के द्वारा मैं मार दिया गया हूँ ( हरा दिया गया हूँ )। अङ्गराज कर्ण के द्वारा चलायी ( छोड़ी ) गई शक्ति ( नामक अस्त्र ) के द्वारा घटोत्कच के समान ( मैं ) शक्ति ( जुये की कौड़ियों की एक विशेष चाल ) से मार दिया गया हूँ, ( मरणतुल्य हार हो गयी है ) ॥ १ ॥

टीकाहा=कष्टम्, नवबन्धनमुक्तया=नवम्=प्रथमम्, यत् बन्धनम्, रज्ज्वादिनां धारणम्, तस्मात् मुक्तया=स्वतन्त्रया, गर्दभ्या=रासभ्या, इव=तुल्यम्, गर्दभ्या=वराटिकया, ताडितः=दण्डितः, पराजितः,, अस्मि, अङ्गराजमुक्तया=कर्णेन प्रक्षिप्तया, शक्त्या=तन्नामकास्त्रविशेषेण, घटोत्कचः=हिडिम्बाभीमयोः पुत्रः, इव=यथा, शक्त्या=द्यूतक्रीडासम्बन्धिवेलनविशेषेण, (अहम्=संवाहकः ) घातितः=मारितः, अस्मि=भवामि, अत्र इव-शब्दद्वयप्रयोगात् उपमाद्वयम्, यमकद्वयञ्च । चित्रजातिः वृत्तम् ॥ १ ॥

विमर्श—नवबन्धन-मुक्तया—उच्छृङ्खल गधी जब पहली बार रस्सी आदि से बांधी जाती है और उसे तोड़कर या खुल जाने पर जैसे अनवरत दुलत्ती चला चलाकर लोगों को मारा करती है उसी प्रकार गर्दभी=वरांटिका=कौड़ी ने संवाहक को पीट डाला । घटोत्कचः इव—भीमसेन एवं हिडिम्बा राक्षसी का पुत्र घटोत्कच था । वह महाभारत के युद्ध में कौरवों का प्रचुर संहार करने लगा था । तब एक व्यक्ति का निश्चित वध कर डालने वाली शक्ति को कर्ण

द्वितीयोऽङ्कः १३७

लेखअ-वावड-हिअअं शहिअं दट्टूण झत्ति पब्भट्ठे । एण्हि मग्ग-णिबडिदो कं णु क्खु शलणं पपज्जे ॥ २ ॥ ( लेखक-व्यापृत-हृदयं सभिकं दृष्ट्वा झटिति प्रभ्रष्टः । इदानीं मार्गनिपतितः कं नु खलु शरणं प्रपद्ये ॥ २ ॥ )

ने छोड़ा और घटोत्कच की मृत्यु हो गई। इसी प्रकार जुये में 'शक्ति' नामक एक ऐसी चाल है जिससे विपक्षी जुआरी का हारना निश्चित है। संवाहक अपनी हार को मृत्यतुल्य समझ रहा है। यहाँ दो बार सादृश्य के लिये 'इव' शब्द का प्रयोग है अतः दो उपमायें हैं। गर्दभ्या गर्दभ्या, शक्त्या शक्त्या ये दो यमक हैं। चित्रजाति छन्द है ॥ १ ॥

अन्वयः- लेखकव्यापृतहृदयम्, सभिकम्, दृष्ट्वा, झटिति, प्रभ्रष्टः, इदानीम्, मार्गनिपतितः, (अहम्) कम्, नु, खलु, शरणम्, प्रपद्ये ॥ २ ॥

शब्दार्थ- लेखकव्यापृतहृदयम्=लिखने में व्यस्त चित्तवाले, सभिकम्=जुआरिओं के अध्यक्ष को, दृष्ट्वा=देखकर, झटिति=झटपट, प्रभ्रष्टः=भाग कर निकला हुआ, (और) इदानीम्=इस समय, मार्गनिपतितः=रास्ते पर आकर खड़ा हुआ, (अहम्=मैं संवाहक), किम्=किसकी, नु खलु, (वाक्यालंकार के लिये हैं) शरणम्=शरण में, प्रपद्ये=जाऊँ? ॥ २ ॥

अर्थ- लिखने में लगे हुये सभिक को देख कर झटपट भागकर निकला हुआ और इस समय सड़क पर खड़ा हुआ, मैं अब किसकी शरण में जाऊँ, अर्थात् मेरी रक्षा करने वाला कौन है? ॥ २ ॥

टीका- लेखकव्यापृतहृदयम्=लेखनं लेखः भावे घञ्, लेख एव लेखकः, तत्र व्यापृतम्=संलग्नम्, हृदयम्=चित्तं यस्य तं तादृशम्, लेखनकार्यसंलग्नचित्तम्, सभिकम्=द्यूतक्रीडाध्यक्षम् 'सभिका द्यूतकारकाः' इत्यमरः दृष्ट्वा=विलोक्य, झटिति=शीघ्रमेव, प्रभ्रष्टः=पलाय्य बहिर्निर्गतः, इदानीम्=अधुना, मार्ग-निपतितः=मार्गे=राजपथे, निपतितः=समुपागतः, कम्=जनम्, शरणम्=रक्षितारम्, प्रपद्ये=आश्रयामि, अत्र नु खलु-इति विमर्शो। अत्र गाथावृत्तम्। तल्लक्षणम्—

विषमाक्षरपादत्वात् पादौ रससञ्जसं धर्षवत् । यश्छन्दसि नोक्तमत्र गाथेति तत् सूरिभिः कथितम् ॥

विमर्श- लेखकव्यापृतहृदयम्-लेखनम्=लेखः, भाव में घञ्=अ, पुनः लेख एव लेखकः, स्वार्थ में कन् मानना चाहिये, इस प्रकार लिखने में लगे हुये चित्त वाले यह अर्थ होता है। यहाँ "लेख अ ववड़-" इस प्राकृत में 'क' लोप के स्थान पर 'न' व्यञ्जन का लोप मान लेने से अधिक सरलताया अर्थ हो जाता है।

१३८ | मृच्छकटिकम्

ता जाव एदे शहिअ-जूदिअरा अण्णदो मं अण्णेसन्ति, ताव इदो विप्पडीवेहिं पादेहिं एदं शुण्णदेउलं पविशिअ देवीभविशं (बहुविधं नाट्यं कृत्वा तथा स्थितः ।) (तद्यावत् एतौ सभिक-द्यूतकरौ अन्यतो मामन्विष्यतः, तावत् इतो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यामेतत् शून्यदेवकुलं प्रविश्य देवीभविष्यामि ।)

(ततः प्रविशति माथुरो द्यूतकरश्च)

माथुरः—अले भट्टा ! दशसुवण्णाह लुद्धु जूदरु पपलीणु पपलीणु । ता गेण्ह गेण्ह, चिट्ठ चिट्ठ, दूलात् पदिट्ठोसि । (अरे भट्टारक ! दशसुवर्णस्य रुद्धो द्यूतकरः प्रपलायितः, प्रपलायितः । तद् गृहाण, गृहाण । तिष्ठ, तिष्ठ । दूरात् प्रदृष्टोऽसि ।)

द्यूतकरः

जइ वज्जसि पादालं इंदं शलणं च जासि ।
सहिअं वज्जिअ एक्कं रुद्दो वि ण रक्खिदुं तरइ ॥ ३ ॥
(यदि व्रजसि पातालमिन्द्रं शरणं च यासि ।
सभिकं वर्जयित्वैकं रुद्रोऽपि न रक्षितुं तरति ॥ ३ ॥)


**सभिकम्=**सभा=द्यूतप्रेमियों का क्रीडास्थल, उसकी व्यवस्था करने वाले प्रमुख जुआरी को। कालें के अनुसार अग्निपुराण, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य-स्मृति एवम् इसकी टीका मिताक्षरा आदि ग्रन्थों में सभिक एवं द्यूतसम्बन्धी नियमों का विस्तृत उल्लेख है ॥ २ ॥

शब्दार्थ—अन्यतः=दूसरी ओर, विप्रतीपाभ्याम्=विपरीत, उल्टे, शून्यदेव-कुलम्=प्रतिमादि से रहित देवमन्दिर में, देवीभविष्यामि=देवता की मूर्ति बने जाता हूँ।

अर्थ—जब तक ये सभिक और द्यूतकर दूसरी ओर मुझे खोजते हैं तब तक (मैं) इधर उल्टे पैरों से इस देवप्रतिमादि से शून्य मन्दिर में प्रवेश करके देवता (के स्थान पर) मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूँ।

(इसके बाद माथुर और जुआरी का प्रवेश)

**अर्थ—माथुर—**अरे स्वामिन् ! दश सुवर्ण के सिक्कों आदि के कारण पकड़ कर रोका गया जुआरी भाग गया, भाग गया । इस लिये पकड़ो, पकड़ो । रुको, रुको, दूर से देख लिये गये हो ।

अन्वयः—यदि, पातालम्, व्रजसि, इन्द्रम्, च, शरणम्, यासि, तथापि, एकम्, सभिकम्, वर्जयित्वा, रुद्रः, अपि, (त्वाम्), रक्षितुम्, न, तरति ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—यदि=अगर, पातालम्=पाताल में, व्रजसि=जाते हो, च=अथवा, इन्द्रम्=इन्द्र (स्वर्गलोक) की, शरणम्=आश्रय में, यासि=जाते हो, (तथापि=तो भी) एकम्=अकेले, सभिकम्=द्यूतक्रीडाध्यक्ष को, वर्जयित्वा=छोड़ कर, रुद्रः=शिव भी, (त्वाम्=तुम्हें), रक्षितुम्=रक्षा करने के लिये, न=नहीं, तरति=पार पा सकता है ॥ ३ ॥

द्वितीयोऽङ्कः १३६

माथुरः—कहिं कहिं सुसहिअ-विप्पलम्भआ !

पलासि ले ! भअपलिवेविदङ्गआ । पदे पदे समं-विसमं खेलेन्तआ कुलं जसं अधिकसणं कलेन्तआ ॥ ४ ॥

( कुत्र, कुत्र सुसभिकविप्रलम्भक ! पलायसे रे भयपरिवेपिताङ्गक ! । पदे पदे समविषमं स्खलन् कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन् ॥ ४ ॥


अर्थ— यदि तुम ( अपनी रक्षा के लिये जमीन के अन्दर ) पाताल चले जाओ, अथवा इन्द्र की शरण में ( स्वर्गलोक ) चले जाओ, ( तो भी ) सभिक अकेले को छोड़कर भगवान् शिव भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

टीका— यदि=चेत् पातालम्=पृथिव्याः अधोदेशम्, व्रजसि=गच्छसि, इन्द्रम्=देवराजम्, शरणम्=रक्षितारम्, आश्रयं वा, यासि=गच्छसि, तथापि, एकम्=केवलम्, सभिकम्=द्यूताध्यक्षम् मां माथुरमिति भावः, वर्जयित्वा=त्यक्त्वा, रुद्रः=भगवान् शङ्करः, अपि त्वाम्, =संवाहकम्, रक्षितुम्=त्रातुम्, न=नैव, तरति=पारयति, समर्थो भवतीति भावः । एवञ्च ते पलायनं व्यर्थमेवेति बोध्यम् । आर्या वृत्तम् ॥ ३ ॥

विमर्श— इन्द्रं शरणम्-यहाँ इन्द्र रक्षक के पास जाते हो-यह आशय है । सभिकम्-इसके विषय में प्रथम पद्य में लिखा जा चुका है । तरति-'तॄ प्लवनतरणयोः' धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन । यहाँ पार करना अर्थ है । रुद्रः-शिव के लिये यह सार्थक प्रयोग है । यहाँ आर्या छन्द है ॥ ३ ॥

अन्वयः— रे सुसभिक-विप्रलम्भक !, भयपरिवेपिताङ्गक, पदे पदे, समविषमं, स्खलन्, कुलम्, यशः, अतिकृष्णम्, कुर्वन्, कुत्र, कुत्र, पलायसे ॥ ४ ॥

शब्दार्थ— रे=अरे, सुसभिक-विप्रलम्भक=सज्जन, न्यायकारी सभिक को धोखा देने वाले, भयपरिवेपिताङ्गक=भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, पदे पदे=प्रत्येक कदम पर, सम-विषमम् = ऊँचे नीचे, स्खलन्=गिरते पड़ते, लड़खड़ाते हुये, कुलम्=अपने वंश को, और यशः=अपने यश को, अतिकृष्णम्=अत्यन्त कलुषित करते हुये, कुत्र कुत्र=कहाँ कहाँ, पलायसे=भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥

अर्थ— अरे ! ( मेरे जैसे ) सज्जन, न्यायप्रेमी द्यूतक्रीडाध्यक्ष को धोखा देने वाले, भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, ( संवाहक तुम ), पग-पग पर ऊपर नीचे गिरते हुये, लड़खड़ाते हुये, अपने कुल और यश को कलुषित करते हुये कहाँ-कहाँ भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥

टीका— रे ! =अरे !, सुसभिक-विप्रलम्भक = सज्जनस्य न्यायप्रियस्य द्यूत-क्रीडाध्यक्षस्य वञ्चक !, भयपरिवेपिताङ्गक = भयेन=मत्तः भीत्या, परिवेपितानि=

१४० मृच्छकटिकम्

द्यूतकरः—( पदं वीक्ष्य ) एसो वज्जदि, इमं पणट्ठा पदवी । (एष व्रजति, इयं प्रनष्टा पदवी ।)

माथुरः—( आलोक्य सवितर्कम् ) अरे ! विप्पदीवु पादू । पाडिमा-शुण्णु देउलु । ( विचिन्त्य ) धुत्तु जूदरु विप्पदीवेहिं पादेहिं देउलं पविट्टो । (अरे ! विप्रतीपौ पादौ, प्रतिमाशन्यं देवकुलम्, धूर्तो द्यूतकरो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यां देवकुलं प्रविष्टः ।)

द्यूतकरः— ता अणुसरेम्ह । ( ततोऽनुसरावः ।)

माथुरः— एव्वं भोदु । ( एवं भवतु ।)

( उभौ देवकुलप्रवेशं निरूपयतः । दृष्ट्वाऽन्योन्यं संज्ञाय्य )

द्यूतकरः— कथं कट्ठमयी पडिमा ? ( कथ काष्ठमयी प्रतिमा ? )


कम्पितानि, थरथरायमाणानि अङ्गानि यस्य तत्सम्बुद्धौ, पदे-पदे=प्रतिपदम्, सम-विषमम्=उच्चावचस्थानम्, समविषमं वा यथा स्यात् तथा स्खलन्=पतन्, कुलम्=वंशम्, यशः=स्वकीयां कीर्तिञ्च, अतिकृष्णम् = अतिकलुषिताम्, कुर्वन् = विदधत्, पलायसे=प्रधावसि । अत्र रुचिरा वृत्तम् ॥ ४ ॥

विमर्श— कहिं कहिं-इस प्राकृत का संस्कृत रूपान्तर कुछ ग्रन्थों में 'कस्मिन् कस्मिन्' है और कुछ में 'कुत्र कुत्र' । कुत्र से भाव अधिक स्पष्ट होता है । सुसभिक-विप्रलम्भक-इससे माथुर अपने को अच्छा 'सभिक' कहना चाहता है । कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन्--इस कथन से संवाहक को रोकने के लिये विवश करना चाहता है । पलायसे -- परा + √अय् + लट् आत्मनेपद प्रथम पु० एकवचन उप-सर्गस्यायतौ' [पा० सू०।२।१६] से रेफ का लकार । समविषमम्-यह क्रियाविशेषण है । इसमें रुचिरा छन्द है । लक्षण ---

जमौ सजौ गिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः ॥ ४ ॥

अर्थ—द्यूतकर—( पैर के चिह्न को देख कर ) यह जाता है ( जा चुका है ) । यह पदचिह्न समाप्त हो गये ।

माथुर—( देख कर विचारपूर्वक ) अरे ! उलटे पैर हैं । मन्दिर मूर्ति से रहित है । ( सोचकर ) धूर्त ( चालक ) जुआरी उल्टे पैरों से मन्दिर में गया है ।

द्यूतकर— तो हम दोनों पदचिह्नों का अनुसरण करें ।

माथुर— ऐसा ही हो ।

( दोनों मन्दिर में प्रवेश करने का अभिनय करते हैं, देखकर और एक दूसरे को इशारा करके )

द्यूतकर— क्या यह लकड़ी की मूर्ति है ?

द्वितीयोऽङ्कः १४१

**माथुरः—**अले ! ण हु ण हु । शैलपडिमा । ( इति बहुविधं चालयति, संज्ञाप्य च ) एव्वं भोदु ! एहि जूढं किलेम्ह । ( अरे ! न खलु न खलु, शैलप्रतिमा । एवं भवतु । एहि द्यूतं क्रीडावः )

( बहुविधं द्यूतं क्रीडतः )

संवाहकः— ( द्यूतेच्छाविकारसंवरणं बहुविधं कृत्वा ) ( स्वगतम् ) अले ! ( अरे ! )

कत्ताशद्दे णिण्णाणअश्श हलइ हडकं मणुश्शश्श ।
ढक्काशद्दे व्व णडाधिवश्श पब्भट्टलज्जश्श ॥ ५ ॥
( कत्ताशब्दो निर्नाणकस्य हरति हृदयं मनुष्यस्य ।
ढक्काशब्द इव नराधिपस्य प्रभ्रष्टराज्यस्य ॥ ५ ॥ )


**माथुर—**अरे, नहीं, नहीं । पत्थर की मूर्ति है । ( ऐसा कहकर अनेक बार हिलाता है और इशारा करके ) अच्छा, ऐसा हो । आओ, हम दोनों जुआ खेलें ।
( दोनों अनेक प्रकार से जुआ खेलते हैं । )

**टीका—**पदम्-पदचिह्नममित्यर्थः, पदवी=पदपङ्क्तिः, 'अयनं वर्त्म मार्गाध्व-पन्थानः पदवी सृतिः' अमरकोषः ( २।१।१५ ), प्रनष्टा = अदृष्टा, विप्रतीपो=विपरीतो, प्रतिमाहीनम् = मूर्तिरहितम्, देवकुलम् = देवमन्दिरम्, निरूपयतः=नाटयतः, अन्योन्यम्=परस्परम्, संज्ञाप्य = संकेतं दत्त्वा, काष्ठमयी = दारुनिर्मिता, शैलप्रतिमा=शिलाया इदं शैलम्=पाषाणखण्डम्, तन्निर्मिता मूर्तिरिति भावः ।

**अन्वयः—**अरे ! कत्ताशब्दः, निर्नाणकस्य, मनुष्यस्य, हृदयम्, प्रभ्रष्टराज्यस्य, नराधिपस्य ( हृदयम् ), ढक्काशब्द, इव, हरति ॥ ५ ॥

**शब्दार्थ—**कत्ताशब्दः = जिससे जुआ खेला जाता है उस कौड़ी की आवाज, निर्नाणकस्य=नाणक=पैसों से रहित, गरीब, मनुष्यस्य=आदमी के, हृदयम्=मन को, प्रभ्रष्टराज्यस्य=हारे हुये राज्य वाले, नराधिपस्य=राजा के, ( हृदय को ), ढक्का-शब्दः=भेरी की आवाज, इव=के समान, हरति=खींचता है, आकृष्ट करता है ॥५॥

**अर्थ—**संवाहक-( जुआ खेलने की इच्छा को बहुत प्रकार से रोक कर ) ( अपने आप ) अरे—कौड़ियों की आवाज निर्धन व्यक्ति के मन को उसी प्रकार खींच लेती है जिस प्रकार छीने गये राज्य वाले राजा के मन को भेरी की आवाज ॥ ५ ॥

**टीका—**अरे !=अहो !, कत्ताशब्दः=द्यूतकरणम्=द्यूतक्रीडा यया सा कत्ता, तस्याः शब्दः=ध्वनिः, निर्नाणकस्य=निर्गतं नाणकम्=धनादिकं यस्य यस्माद् वा, तस्य, निर्धनस्येति भावः, पुरुषस्य=मनुष्यस्य, हृदयम्=चित्तम्, प्रभ्रष्टराज्यस्य=प्रभ्रष्टम्=शत्रुभिरपहृतम्, राज्यम्=राज्यलक्ष्मीः यस्य सः, तस्य, नराधिपस्य=नरपतेः, हृदयम्, ढक्काशब्दः=भेरीध्वनिः, इव=यथा, हरति=बलात् तत्र नयति,