मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः १२७
(परिक्रम्य ।) इदञ्च सुवर्णभाण्डं रक्षितव्यं त्वया रात्रौ, वर्द्धमानके-नापि दिवा।
विदू०-जध भवं आणवेदि । ( यथा भवानाज्ञापयति ।)
इति निष्क्रान्तौ।
।। इति मृच्छकटिकेऽलङ्कारन्यासो नाम प्रथमोऽङ्कः ।।
**विमर्श-**चारुदत्त के मन में यह आशंका होने लगी कि कहीं राजश्यालक या उसके किसी सम्बन्धी ने रात में देख लिया तो पकड़ लिये जाने की सम्भावना है। साथ ही वसन्तसेना के स्वर्णाभूषण टूटे फूटे घर में रखे हैं। कोई भी चुरा सकता है। अतः यथाशीघ्र ही घर चलना अनिवार्य है क्योंकि अधिकांश अपराध कार्य रात में ही हुआ करते हैं। यहाँ काव्यलिङ्ग तथा अर्थान्तरन्यास की अङ्गाङ्गि-भावने स्थिति होने से संकर अलंकार है और पथ्यावक्र छन्द है ।। ५८ ।।
(घूमकर ) इस स्वर्णाभूषणों के डिब्बा की रक्षा रात में आपको करनी है और दिन में वर्द्धमानक को ।
विदूषक- आपकी जैसी आज्ञा ।
( इस प्रकार दोनों चले जाते ।)
।। इस प्रकार मृच्छकटिक में अलङ्कारन्यास ( आभूषणों की धरोहर ) नामक प्रथम अङ्क समाप्त हुआ ।।
।। जयशङ्कर-लाल-त्रिपाठि-विरचित भावबोधिनी-व्याख्या में मृच्छकटिक का प्रथम अङ्क समाप्त हुआ ।।