मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः
( प्रविश्य )
चेटी—अत्ताए अज्जआसआसं सन्देसेण पेसिदम्हि। ता जाव पविसिअ अज्जआसआसं गच्छामि। (परिक्रम्यावलोक्य च) एसा अज्जआ हिअएण किंपि आलिहन्ती चिट्ठदि। ता जाव उपसप्पामि। (मात्रा आर्यासकाशं सन्देशेन प्रेषितास्मि। तद्यावत् प्रविश्य आर्यासकाशं गच्छामि। एषा आर्या हृदयेन किमप्यालिखन्ती तिष्ठति। तद्यावत् उपसर्पामि।)
(ततः प्रविशति आसनस्था सोत्कण्ठा वसन्तसेना मदनिका च।)
वसंत०---हञ्जे! तदो तदो?। (चेटि! ततस्ततः?)
चेटी—अज्जए! ण किंपि मन्तेसि। किं तदो तदो?। (आर्ये! न किमपि मन्त्रयसि। किं ततस्ततः?)
बसन्त०---किं मए भणिदं?। (किं मया भणितम्?)
चेटी—तदो तदो ति। (ततस्तत इति?)
शब्दार्थः— मात्रा=वसन्तसेना की माता के द्वारा, आर्यासकाशम्=सम्माननीय वसन्तसेना के पास, सन्देशेन=सन्देश के साथ या सन्देश देने के कारण, प्रविश्य=उसके कमरे में प्रवेश करके, हृदयेन=मन से, आलिखन्ती=सोचती हुई, उपसर्पामि=पास जाती हूँ, सोत्कण्ठा=उत्कण्ठायुक्त, मन्त्रयसि=कह रही हो, सभ्रूविक्षेपम्=भौंह को टेढ़ी करते हुये, आम्=अच्छा, हाँ, स्नाता=नहायी हुई, निवर्तय=सम्पन्न करो, हञ्जे=सखि।
अर्थ--चेटी- (प्रवेश करके) माता ने मुझे माननीया वसन्तसेना के पास सन्देश के साथ भेजा है। तो तब तक प्रवेश करके आर्या के पास जाती हूँ। (घूमकर और देख कर) यह आर्या मन से (में) कुछ सोचती हुई बैठी हैं। तो इनके समीप चलती हूँ।
(इसके बाद आसन पर बैठी हुई, उत्कण्ठित, वसन्तसेना और मदनिका प्रवेश करतीं हैं।)
वसन्तसेना—सखि! इसके बाद?
चेटी—आर्ये! आपने कुछ भी तो नहीं कहा है। तब 'उसके बाद?' (ऐसा) क्यों (पूछ रही है)?
वसन्तसेना—मैंने क्या कहा?
चेटी--'इसके बाद' ऐसा।