भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः १२९

वसन्तसेना--( सभ्रूक्षेपम् । ) आं एव्व ? । ( आम् एवम् ? । )
(उपसृत्य)
प्रथमा चेटी--अज्जए ! अत्ता आदिसदि-ण्हादा भविअ देवदाणं पूअं णिव्वत्तेहि त्ति । ( आर्ये ! माता आदिशति-स्नाता भूत्वा देवतानां पूजां निर्वर्तयेति । )
वसन्तसेना--हज्जे ! विण्णवेहि अत्तं, अज्ज ण ण्हाइस्सं ता वम्हणो ज्जेव पूअं णिव्वत्तेदु त्ति । ( हञ्जे ! विज्ञापय मातरम्, अद्य न स्नास्यामि । तद् ब्राह्मण एव पूजां निर्वर्तयतु इति । )
चेटी--जं अज्जआ आणवेदि । (इति निष्क्रान्ता ।) (यदार्य्या आज्ञापयति ।)


वसन्तसेना---( भौं घुमाते हुये ) अच्छा, ऐसा है ।
( पास जाकर )
पहली चेटी---आर्ये ! माता जी यह आज्ञा दे रही हैं -'नहाकर देवताओं की पूजा सम्पन्न कर डालो ।'
वसन्तसेना--सखि ! माता जी से यह कहो कि मैं आज नहीं नहाऊँगी । अतः ब्राह्मण ही पूजा सम्पन्न करें ।
चेटी--आपकी जैसी आज्ञा । ( ऐसा कहकर निकल जाती है । )

टीका--मात्रा=वसन्तसेनाया जनन्या, आर्यासकाशम्=आर्य्यायाः=वसन्तसेनायाः सकाशम्=समीपम्, सन्देशेन=वाचिकेनादेशेन, आलिखन्ती=विचिन्तयन्ती, उपसर्पामि=समीपं गच्छामि, आसनस्था=आसने विराजमाना, सोत्कण्ठा=उत्कण्ठया=औत्सुक्येन सह, मन्त्रयसि=कथयसि, भणितम्=कथितम्, आम्=स्मरणार्थकं स्वीकृतिसूचकमव्ययम्, विज्ञापय=निवेदय ।

विमर्शः---सन्देशेन-यहाँ 'साथ' अथवा 'हेतु' अर्थ में तृतीया है । आलिखन्ती-आङ् उपसर्ग के साथ लिख धातु का अर्थ 'सोचना' हो जाता है । मन्त्रयसि-चुरादिगणीय √मत्रि गुप्तभाषणे धातु लट्लकार प्रथमपुरुष एकवचन । भणितम्-√भण् + क्त । आदिशति-आङ् + दिश् + लट् लकार प्र. पु. ए. व. । आज्ञापयति-आङ् उपसर्ग चुरादि गणीय √ज्ञा ( नियोगे ) धातु से स्वार्थिक णिच्, पुक्-आ + ज्ञाप् + इ-लट प्र. पु. ए. व. । हज्जे-सखी का सम्बोधन का रूप-'हण्डेहञ्जे हलाह्वानं नीचां चेटीं सखीं प्रति ।' अमरकोश १ । ७ । १५

शब्दार्थ---स्नेहः=प्रेम, पुरोभागिता=छिद्रान्वेषिता, शून्यहृदयत्वेन=शून्य हृदयवाली होने से, हृदयगतम्=मन में बैठे हुये, परहृदय-ग्रहण-पण्डिता=दूसरे के हृदय के भाव को समझने में चतुर, कामः=कामदेव, अनुगृहीतः=अनुगृहीत

६ मृ०