भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१३० मृच्छकटिकम्

मदनिका—अज्जए ! सिणेहि पुच्छदि ण पुरोभाइदा, ता किं णेदं ? । ( आर्ये ! स्नेहः पृच्छति, न पुरोभागिता, तत् किं न्विदम् ? )

वसन्तसेना—मदणिए ! केर्रिसि मं पेक्खसि ? । ( मदनिके ! कीदृशीं मां प्रेक्षसे ? )

मदनिका—अज्जआए सुण्णहिअअत्तणेण जाणामि-हिअअगदं कंपि अज्जआ अहिलसदि त्ति । ( आर्यायाः शून्यहृदयत्वेन जानामि, हृदयगतं कमपि आर्या अभिलषतीति । )

वसन्तसेना—सुट्ठु तुए जाणिदं । परहिअअग्गहणपण्डिआ मदणिआ क्खु तुमं । ( सुष्ठु त्वया ज्ञातम् । परहृदयग्रहणपण्डिता मदनिका खलु त्वम् । )

मदनिका—पिअं मे पिअं । कामो क्खु णाम असो भअवं अणुगहीदो महूसवो तरुणजणस्य । ता कहेदु अज्जआ, कि राआ राअवल्लहो वा सेवीअदि ? ( प्रियं मे प्रियम् । कामः खलु नामैष भगवाननुगृहीतो महोत्सवस्तरुणजनस्य । तत् कथयतु आर्या, किं राजा राजवल्लभो वा सेव्यते ? )

वसन्तसेना—हज्जे रमिदुमिच्छामि, ण सेविदुं । (हज्जे ! रन्तुमिच्छामि, न सेवितुम् । )


हुआ, महोत्सवः=बहुत बड़ा उत्सव, रन्तुम्=रमण करने के लिये, अनेक-नगरा-भिगमन-जनित-विस्तारः=अनेक नगरों में ( व्यापारादि के लिये ) जाने से बढ़ी हुई धन सम्पत्तिवाला, काम्यते=चाहा जाता है ।

अर्थमदनिका—( तुम्हारे प्रति मेरा ) प्रेम यह पूछ रहा है न कि छिद्रान्वेषण का भाव ।

वसन्तसेना—मदनिके ! तुम मुझे कैसी देख रही हो ?

मदनिका—आर्या के शून्य हृदय वाली होने से समझती हूँ कि आर्या हृदय में विराजमान किसी को चाह रहीं हैं ।

वसन्तसेना—तुमने बिल्कुल ठीक समझा । दूसरे के हृदय की भावना को समझने में चतुर तुम मदनिका हो ।

मदनिका—यह तो मेरे लिये बहुत अच्छा है, बहुत अच्छा है । यह तो भगवान कामदेव अनुगृहीत हुआ जो कि समस्त युवकों का महान उत्सव है । तो आर्या बतलावें कि क्या कोई राजा अथवा राजा का प्रिय आपके द्वारा चाहा जा रहा है ?

वसन्तसेना—रमण ( कामक्रीडा ) करना चाहती हूँ न कि ( किसी धनी की ) सेवा करना ।