भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214
१२६मृच्छकटिकम्

( सानुरागम् ) भवति ! वसन्तसेने ! इदं भवत्या गृहम्, प्रविशतु भवती ।

( वसन्तसेना सानुरागमवलोकयन्ती निष्क्रान्ता । )

चारु०--वयस्य ! गता वसन्तसेना । तदेहि, गृहमेव गच्छावः ।

राजमार्गो हि शून्योऽयं रक्षिणः सञ्चरन्ति च ।
वञ्चना परिहर्त्तव्या बहुदोषा हि शर्वरी ॥ ५८ ॥


वर्णन से यह लगता है कि चारुदत्त और मैत्रेय दोनों ही वसन्तसेना के साथ गये थे । इसलिये उदास होकर चारुदत्त कहता है 'मित्र ! वसन्तसेना चली गई, तो हम लोग भी घर ही चलें । जो हो, यहाँ नाटकीय दृष्टि से कुछ अपूर्णता प्रतीत होती है ॥ ५७ ॥

( प्रेम से ) माननीये वसन्त-सेने ! यह आपका घर (आ गया) है । आप इसमें प्रवेश करें ।

( वसन्तसेना अनुराग के साथ देखती हुई निकल गई ) ।

**अन्वयः—**हि, अयम्, राजमार्गः, शून्यः रक्षिणः, च, सञ्चरन्ति, वञ्चना, परिहर्त्तव्या, हि, शर्वरी, बहुदोषा ॥ ५८ ॥

**शब्दार्थः—**हि=निश्चित ही, अयम्=जिस पर हम लोग चल रहे हैं वह, राजमार्गः=प्रमुख रास्ता, शून्यः=यातायात से रहित है, रक्षिणः=सिपाही लोग, सञ्चरन्ति=गस्त लगा रहे हैं । वञ्चना=( वसन्तसेना के अलंकारों की ) चोरी रूपी ठगाई को, परिहर्त्तव्या=बचाना है, हि=क्योंकि, शर्वरी=रात, बहुदोषा=बहुत प्रकार के दोषों से भरी होती है ॥ ५८ ॥

**अर्थ—चारुदत्त—**मित्र ! वसन्तसेना चली गई । अतः चलो, हम दोनों भी घर चलें ।

( श्लोकार्थ ) अधिक देर हो चुकी है ) निश्चित रूप से, यह राजमार्ग आने जानेवालों से रहित है और राजपुरुष (सिपाही) लोग गस्त लगा रहे हैं । (वसन्त-सेना के स्वर्णाभूषणों की चोरी रूपी ) ठगाई को बचाना है क्योंकि रात बहुत दोषों से परिपूर्ण होती है, अर्थात् रात में ही अनेक अपराध होते हैं ॥ ५८ ॥

टीका— हि=यतः, अयम् = अस्माभिः आश्रीयमाणः, राजमार्गः = राजपथः, प्रमुखमार्गः, शून्यः = गमनागमनकर्तृ रहितः, च = तथा, रक्षिणः = रक्षापुरुषाः, सञ्चरन्ति=इतस्ततः भ्राम्यन्ति, वञ्चना=वसन्तसेना-स्वर्णाभूषणापहाररूपा प्रतारणा, परिहर्त्तव्या = निवारणीया, हि=यतः, शर्वरी = रात्रिः, बहुदोषा=विविधापराध-कृत्यपरिपूर्णा भवति । अतः वसन्तसेनायाः आभूषणानां रक्षार्थमस्माभिः शीघ्रं गन्तव्यमिति भावः । अर्थान्तरन्यासः अलंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ५८ ॥