मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः १२५
**शब्दार्थ—हि=**निश्चित ही, **कामिनीगण्डपाण्डुः=**सुन्दरी युवती के गालों के समान उज्ज्वल, **ग्रहगणपरिवारः=**ग्रह-नक्षत्ररूपी परिवार वाला, **राजमार्गप्रदीपः=**राजमार्ग पर प्रकाश करने वाला दीपक, **शशाङ्कः=**चन्द्रमा, **उदयति=**उदित हो रहा है, **हि=**निश्चित, **यस्य=**जिस चन्द्रमा की, **गौराः=**श्वेतवर्णवाली उजली, **रश्मयः=**किरणें, **स्रुतजले=**निकले=सूखे हुये जल वाले, **पङ्के=**कीचड़ में, **क्षीरधाराः इव=**दूध की धाराओं के समान, तिमिरनिकरमध्ये = अन्धकारसमूह के मध्य में, **पतन्ति=**गिर रहीं हैं ॥ ५७ ॥
**अर्थ—चारुदत्त—**मैत्रेय ! अच्छा, दीपिकाओं को रहने दो । देखो
सुन्दर युवती के गालों के समान उज्ज्वल, ग्रह-नक्षत्ररूपी परिवार वाला, तथा राजमार्ग का प्रकाशक=दीपक चन्द्रमा निश्चित ही उदित हो रहा है । जिस चन्द्रमा की श्वेत किरणें, सूखे हुये जलवाले (काले) कीचड़ में दूध की धाराओं के समान, अन्धकार के मध्य में गिर रहीं हैं ॥ ५७ ॥
**टीका—कामिनीगण्डपाण्डुः=**कामिन्याः=तरुण्याः गण्डः=कपोल इव पाण्डुः=पाण्डुवर्णः=गौरवर्णः, **ग्रहगणपरिवारः=**ग्रहाणाम्=ग्रहनक्षत्रादीनां गणः=समूह एव परिवारः=परितो वेष्टनकारकः यस्य सः ग्रहनक्षत्रपरिवृतः, **राजमार्गप्रदीपः=**राजमार्गस्य प्रकाशकः दीपः, **शशाङ्कः=**चन्द्रः, **हि=**निश्चयेन, **उदयति=**उद्गच्छति, उदेति, **यस्य=**चन्द्रस्य, **गौराः=**शुभ्राः, **रश्मयः=**किरणाः, **स्रुतजले=**स्रुतम्=निर्गतं जलं यस्मात् तादृशे, **पङ्के=**कर्दमे, **क्षीरधाराः=**दुग्धस्य प्रवाहाः, **इव=**यथा, **तिमिरनिकरमध्ये=**अन्धकार-समूहस्य मध्ये=आभ्यन्तरे, **पतन्ति=**प्रविशन्ति, अन्धकारतां दूरीकृत्य श्वेततामुत्पादयन्ति । उपमा रूपकं चालंकारौ, मालिनी वृत्तम्-तल्लक्षणम्-न-न-म य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकैः ॥ ५७ ॥
**विमर्श—ग्रहगणपरिवारः=**यहाँ ग्रह का तात्पर्य यह है कि सूर्य के अतिरिक्त सभी ग्रह तारे के रूप में प्रकाशित होते हैं। अतः तारागणरूपी परिवार वाला—इसमें रूपक अलंकार है । कामिनीगण्डपाण्डुः-में सादृश्यवाचक का लोप होने से लुप्तोपमा है और **क्षीरधारा इव-**यहाँ भी उपमा है। जैसे किसी कीचड़ का पानी निकल जाय या सूख जाय और उसमें दूध की धारायें बहा दी जांय उस उस समय जैसा रूप बनता है वैसा ही चन्द्रोदय के समय अन्धकार का बनता है । इसमें मालिनी छन्द है । लक्षण --
'न-न-म-य-य-युतेयं मालिनी भोगिलोकैः ।"
यहाँ चारुदत्त यद्यपि चन्द्रोदय का वर्णन करता है तथापि वसन्तसेना के घर की ओर जाने के अभिनय का कोई संकेत नहीं है । साथ ही आगे चारुदत्त ने वसन्तसेना के घर का संकेत जब किया तो वह अपने घर जाती है । आगे के