भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१४० मृच्छकटिकम्

द्यूतकरः—( पदं वीक्ष्य ) एसो वज्जदि, इमं पणट्ठा पदवी । (एष व्रजति, इयं प्रनष्टा पदवी ।)

माथुरः—( आलोक्य सवितर्कम् ) अरे ! विप्पदीवु पादू । पाडिमा-शुण्णु देउलु । ( विचिन्त्य ) धुत्तु जूदरु विप्पदीवेहिं पादेहिं देउलं पविट्टो । (अरे ! विप्रतीपौ पादौ, प्रतिमाशन्यं देवकुलम्, धूर्तो द्यूतकरो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यां देवकुलं प्रविष्टः ।)

द्यूतकरः— ता अणुसरेम्ह । ( ततोऽनुसरावः ।)

माथुरः— एव्वं भोदु । ( एवं भवतु ।)

( उभौ देवकुलप्रवेशं निरूपयतः । दृष्ट्वाऽन्योन्यं संज्ञाय्य )

द्यूतकरः— कथं कट्ठमयी पडिमा ? ( कथ काष्ठमयी प्रतिमा ? )


कम्पितानि, थरथरायमाणानि अङ्गानि यस्य तत्सम्बुद्धौ, पदे-पदे=प्रतिपदम्, सम-विषमम्=उच्चावचस्थानम्, समविषमं वा यथा स्यात् तथा स्खलन्=पतन्, कुलम्=वंशम्, यशः=स्वकीयां कीर्तिञ्च, अतिकृष्णम् = अतिकलुषिताम्, कुर्वन् = विदधत्, पलायसे=प्रधावसि । अत्र रुचिरा वृत्तम् ॥ ४ ॥

विमर्श— कहिं कहिं-इस प्राकृत का संस्कृत रूपान्तर कुछ ग्रन्थों में 'कस्मिन् कस्मिन्' है और कुछ में 'कुत्र कुत्र' । कुत्र से भाव अधिक स्पष्ट होता है । सुसभिक-विप्रलम्भक-इससे माथुर अपने को अच्छा 'सभिक' कहना चाहता है । कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन्--इस कथन से संवाहक को रोकने के लिये विवश करना चाहता है । पलायसे -- परा + √अय् + लट् आत्मनेपद प्रथम पु० एकवचन उप-सर्गस्यायतौ' [पा० सू०।२।१६] से रेफ का लकार । समविषमम्-यह क्रियाविशेषण है । इसमें रुचिरा छन्द है । लक्षण ---

जमौ सजौ गिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः ॥ ४ ॥

अर्थ—द्यूतकर—( पैर के चिह्न को देख कर ) यह जाता है ( जा चुका है ) । यह पदचिह्न समाप्त हो गये ।

माथुर—( देख कर विचारपूर्वक ) अरे ! उलटे पैर हैं । मन्दिर मूर्ति से रहित है । ( सोचकर ) धूर्त ( चालक ) जुआरी उल्टे पैरों से मन्दिर में गया है ।

द्यूतकर— तो हम दोनों पदचिह्नों का अनुसरण करें ।

माथुर— ऐसा ही हो ।

( दोनों मन्दिर में प्रवेश करने का अभिनय करते हैं, देखकर और एक दूसरे को इशारा करके )

द्यूतकर— क्या यह लकड़ी की मूर्ति है ?