भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः १३६

माथुरः—कहिं कहिं सुसहिअ-विप्पलम्भआ !

पलासि ले ! भअपलिवेविदङ्गआ । पदे पदे समं-विसमं खेलेन्तआ कुलं जसं अधिकसणं कलेन्तआ ॥ ४ ॥

( कुत्र, कुत्र सुसभिकविप्रलम्भक ! पलायसे रे भयपरिवेपिताङ्गक ! । पदे पदे समविषमं स्खलन् कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन् ॥ ४ ॥


अर्थ— यदि तुम ( अपनी रक्षा के लिये जमीन के अन्दर ) पाताल चले जाओ, अथवा इन्द्र की शरण में ( स्वर्गलोक ) चले जाओ, ( तो भी ) सभिक अकेले को छोड़कर भगवान् शिव भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

टीका— यदि=चेत् पातालम्=पृथिव्याः अधोदेशम्, व्रजसि=गच्छसि, इन्द्रम्=देवराजम्, शरणम्=रक्षितारम्, आश्रयं वा, यासि=गच्छसि, तथापि, एकम्=केवलम्, सभिकम्=द्यूताध्यक्षम् मां माथुरमिति भावः, वर्जयित्वा=त्यक्त्वा, रुद्रः=भगवान् शङ्करः, अपि त्वाम्, =संवाहकम्, रक्षितुम्=त्रातुम्, न=नैव, तरति=पारयति, समर्थो भवतीति भावः । एवञ्च ते पलायनं व्यर्थमेवेति बोध्यम् । आर्या वृत्तम् ॥ ३ ॥

विमर्श— इन्द्रं शरणम्-यहाँ इन्द्र रक्षक के पास जाते हो-यह आशय है । सभिकम्-इसके विषय में प्रथम पद्य में लिखा जा चुका है । तरति-'तॄ प्लवनतरणयोः' धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन । यहाँ पार करना अर्थ है । रुद्रः-शिव के लिये यह सार्थक प्रयोग है । यहाँ आर्या छन्द है ॥ ३ ॥

अन्वयः— रे सुसभिक-विप्रलम्भक !, भयपरिवेपिताङ्गक, पदे पदे, समविषमं, स्खलन्, कुलम्, यशः, अतिकृष्णम्, कुर्वन्, कुत्र, कुत्र, पलायसे ॥ ४ ॥

शब्दार्थ— रे=अरे, सुसभिक-विप्रलम्भक=सज्जन, न्यायकारी सभिक को धोखा देने वाले, भयपरिवेपिताङ्गक=भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, पदे पदे=प्रत्येक कदम पर, सम-विषमम् = ऊँचे नीचे, स्खलन्=गिरते पड़ते, लड़खड़ाते हुये, कुलम्=अपने वंश को, और यशः=अपने यश को, अतिकृष्णम्=अत्यन्त कलुषित करते हुये, कुत्र कुत्र=कहाँ कहाँ, पलायसे=भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥

अर्थ— अरे ! ( मेरे जैसे ) सज्जन, न्यायप्रेमी द्यूतक्रीडाध्यक्ष को धोखा देने वाले, भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, ( संवाहक तुम ), पग-पग पर ऊपर नीचे गिरते हुये, लड़खड़ाते हुये, अपने कुल और यश को कलुषित करते हुये कहाँ-कहाँ भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥

टीका— रे ! =अरे !, सुसभिक-विप्रलम्भक = सज्जनस्य न्यायप्रियस्य द्यूत-क्रीडाध्यक्षस्य वञ्चक !, भयपरिवेपिताङ्गक = भयेन=मत्तः भीत्या, परिवेपितानि=