भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१३८ | मृच्छकटिकम्

ता जाव एदे शहिअ-जूदिअरा अण्णदो मं अण्णेसन्ति, ताव इदो विप्पडीवेहिं पादेहिं एदं शुण्णदेउलं पविशिअ देवीभविशं (बहुविधं नाट्यं कृत्वा तथा स्थितः ।) (तद्यावत् एतौ सभिक-द्यूतकरौ अन्यतो मामन्विष्यतः, तावत् इतो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यामेतत् शून्यदेवकुलं प्रविश्य देवीभविष्यामि ।)

(ततः प्रविशति माथुरो द्यूतकरश्च)

माथुरः—अले भट्टा ! दशसुवण्णाह लुद्धु जूदरु पपलीणु पपलीणु । ता गेण्ह गेण्ह, चिट्ठ चिट्ठ, दूलात् पदिट्ठोसि । (अरे भट्टारक ! दशसुवर्णस्य रुद्धो द्यूतकरः प्रपलायितः, प्रपलायितः । तद् गृहाण, गृहाण । तिष्ठ, तिष्ठ । दूरात् प्रदृष्टोऽसि ।)

द्यूतकरः

जइ वज्जसि पादालं इंदं शलणं च जासि ।
सहिअं वज्जिअ एक्कं रुद्दो वि ण रक्खिदुं तरइ ॥ ३ ॥
(यदि व्रजसि पातालमिन्द्रं शरणं च यासि ।
सभिकं वर्जयित्वैकं रुद्रोऽपि न रक्षितुं तरति ॥ ३ ॥)


**सभिकम्=**सभा=द्यूतप्रेमियों का क्रीडास्थल, उसकी व्यवस्था करने वाले प्रमुख जुआरी को। कालें के अनुसार अग्निपुराण, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य-स्मृति एवम् इसकी टीका मिताक्षरा आदि ग्रन्थों में सभिक एवं द्यूतसम्बन्धी नियमों का विस्तृत उल्लेख है ॥ २ ॥

शब्दार्थ—अन्यतः=दूसरी ओर, विप्रतीपाभ्याम्=विपरीत, उल्टे, शून्यदेव-कुलम्=प्रतिमादि से रहित देवमन्दिर में, देवीभविष्यामि=देवता की मूर्ति बने जाता हूँ।

अर्थ—जब तक ये सभिक और द्यूतकर दूसरी ओर मुझे खोजते हैं तब तक (मैं) इधर उल्टे पैरों से इस देवप्रतिमादि से शून्य मन्दिर में प्रवेश करके देवता (के स्थान पर) मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूँ।

(इसके बाद माथुर और जुआरी का प्रवेश)

**अर्थ—माथुर—**अरे स्वामिन् ! दश सुवर्ण के सिक्कों आदि के कारण पकड़ कर रोका गया जुआरी भाग गया, भाग गया । इस लिये पकड़ो, पकड़ो । रुको, रुको, दूर से देख लिये गये हो ।

अन्वयः—यदि, पातालम्, व्रजसि, इन्द्रम्, च, शरणम्, यासि, तथापि, एकम्, सभिकम्, वर्जयित्वा, रुद्रः, अपि, (त्वाम्), रक्षितुम्, न, तरति ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—यदि=अगर, पातालम्=पाताल में, व्रजसि=जाते हो, च=अथवा, इन्द्रम्=इन्द्र (स्वर्गलोक) की, शरणम्=आश्रय में, यासि=जाते हो, (तथापि=तो भी) एकम्=अकेले, सभिकम्=द्यूतक्रीडाध्यक्ष को, वर्जयित्वा=छोड़ कर, रुद्रः=शिव भी, (त्वाम्=तुम्हें), रक्षितुम्=रक्षा करने के लिये, न=नहीं, तरति=पार पा सकता है ॥ ३ ॥