भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 225

द्वितीयोऽङ्कः १३७

लेखअ-वावड-हिअअं शहिअं दट्टूण झत्ति पब्भट्ठे । एण्हि मग्ग-णिबडिदो कं णु क्खु शलणं पपज्जे ॥ २ ॥ ( लेखक-व्यापृत-हृदयं सभिकं दृष्ट्वा झटिति प्रभ्रष्टः । इदानीं मार्गनिपतितः कं नु खलु शरणं प्रपद्ये ॥ २ ॥ )

ने छोड़ा और घटोत्कच की मृत्यु हो गई। इसी प्रकार जुये में 'शक्ति' नामक एक ऐसी चाल है जिससे विपक्षी जुआरी का हारना निश्चित है। संवाहक अपनी हार को मृत्यतुल्य समझ रहा है। यहाँ दो बार सादृश्य के लिये 'इव' शब्द का प्रयोग है अतः दो उपमायें हैं। गर्दभ्या गर्दभ्या, शक्त्या शक्त्या ये दो यमक हैं। चित्रजाति छन्द है ॥ १ ॥

अन्वयः- लेखकव्यापृतहृदयम्, सभिकम्, दृष्ट्वा, झटिति, प्रभ्रष्टः, इदानीम्, मार्गनिपतितः, (अहम्) कम्, नु, खलु, शरणम्, प्रपद्ये ॥ २ ॥

शब्दार्थ- लेखकव्यापृतहृदयम्=लिखने में व्यस्त चित्तवाले, सभिकम्=जुआरिओं के अध्यक्ष को, दृष्ट्वा=देखकर, झटिति=झटपट, प्रभ्रष्टः=भाग कर निकला हुआ, (और) इदानीम्=इस समय, मार्गनिपतितः=रास्ते पर आकर खड़ा हुआ, (अहम्=मैं संवाहक), किम्=किसकी, नु खलु, (वाक्यालंकार के लिये हैं) शरणम्=शरण में, प्रपद्ये=जाऊँ? ॥ २ ॥

अर्थ- लिखने में लगे हुये सभिक को देख कर झटपट भागकर निकला हुआ और इस समय सड़क पर खड़ा हुआ, मैं अब किसकी शरण में जाऊँ, अर्थात् मेरी रक्षा करने वाला कौन है? ॥ २ ॥

टीका- लेखकव्यापृतहृदयम्=लेखनं लेखः भावे घञ्, लेख एव लेखकः, तत्र व्यापृतम्=संलग्नम्, हृदयम्=चित्तं यस्य तं तादृशम्, लेखनकार्यसंलग्नचित्तम्, सभिकम्=द्यूतक्रीडाध्यक्षम् 'सभिका द्यूतकारकाः' इत्यमरः दृष्ट्वा=विलोक्य, झटिति=शीघ्रमेव, प्रभ्रष्टः=पलाय्य बहिर्निर्गतः, इदानीम्=अधुना, मार्ग-निपतितः=मार्गे=राजपथे, निपतितः=समुपागतः, कम्=जनम्, शरणम्=रक्षितारम्, प्रपद्ये=आश्रयामि, अत्र नु खलु-इति विमर्शो। अत्र गाथावृत्तम्। तल्लक्षणम्—

विषमाक्षरपादत्वात् पादौ रससञ्जसं धर्षवत् । यश्छन्दसि नोक्तमत्र गाथेति तत् सूरिभिः कथितम् ॥

विमर्श- लेखकव्यापृतहृदयम्-लेखनम्=लेखः, भाव में घञ्=अ, पुनः लेख एव लेखकः, स्वार्थ में कन् मानना चाहिये, इस प्रकार लिखने में लगे हुये चित्त वाले यह अर्थ होता है। यहाँ "लेख अ ववड़-" इस प्राकृत में 'क' लोप के स्थान पर 'न' व्यञ्जन का लोप मान लेने से अधिक सरलताया अर्थ हो जाता है।