मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
१३८ | मृच्छकटिकम्
ता जाव एदे शहिअ-जूदिअरा अण्णदो मं अण्णेसन्ति, ताव इदो विप्पडीवेहिं पादेहिं एदं शुण्णदेउलं पविशिअ देवीभविशं (बहुविधं नाट्यं कृत्वा तथा स्थितः ।) (तद्यावत् एतौ सभिक-द्यूतकरौ अन्यतो मामन्विष्यतः, तावत् इतो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यामेतत् शून्यदेवकुलं प्रविश्य देवीभविष्यामि ।)
(ततः प्रविशति माथुरो द्यूतकरश्च)
माथुरः—अले भट्टा ! दशसुवण्णाह लुद्धु जूदरु पपलीणु पपलीणु । ता गेण्ह गेण्ह, चिट्ठ चिट्ठ, दूलात् पदिट्ठोसि । (अरे भट्टारक ! दशसुवर्णस्य रुद्धो द्यूतकरः प्रपलायितः, प्रपलायितः । तद् गृहाण, गृहाण । तिष्ठ, तिष्ठ । दूरात् प्रदृष्टोऽसि ।)
द्यूतकरः—
जइ वज्जसि पादालं इंदं शलणं च जासि ।
सहिअं वज्जिअ एक्कं रुद्दो वि ण रक्खिदुं तरइ ॥ ३ ॥
(यदि व्रजसि पातालमिन्द्रं शरणं च यासि ।
सभिकं वर्जयित्वैकं रुद्रोऽपि न रक्षितुं तरति ॥ ३ ॥)
**सभिकम्=**सभा=द्यूतप्रेमियों का क्रीडास्थल, उसकी व्यवस्था करने वाले प्रमुख जुआरी को। कालें के अनुसार अग्निपुराण, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य-स्मृति एवम् इसकी टीका मिताक्षरा आदि ग्रन्थों में सभिक एवं द्यूतसम्बन्धी नियमों का विस्तृत उल्लेख है ॥ २ ॥
शब्दार्थ—अन्यतः=दूसरी ओर, विप्रतीपाभ्याम्=विपरीत, उल्टे, शून्यदेव-कुलम्=प्रतिमादि से रहित देवमन्दिर में, देवीभविष्यामि=देवता की मूर्ति बने जाता हूँ।
अर्थ—जब तक ये सभिक और द्यूतकर दूसरी ओर मुझे खोजते हैं तब तक (मैं) इधर उल्टे पैरों से इस देवप्रतिमादि से शून्य मन्दिर में प्रवेश करके देवता (के स्थान पर) मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूँ।
(इसके बाद माथुर और जुआरी का प्रवेश)
**अर्थ—माथुर—**अरे स्वामिन् ! दश सुवर्ण के सिक्कों आदि के कारण पकड़ कर रोका गया जुआरी भाग गया, भाग गया । इस लिये पकड़ो, पकड़ो । रुको, रुको, दूर से देख लिये गये हो ।
अन्वयः—यदि, पातालम्, व्रजसि, इन्द्रम्, च, शरणम्, यासि, तथापि, एकम्, सभिकम्, वर्जयित्वा, रुद्रः, अपि, (त्वाम्), रक्षितुम्, न, तरति ॥ ३ ॥
शब्दार्थ—यदि=अगर, पातालम्=पाताल में, व्रजसि=जाते हो, च=अथवा, इन्द्रम्=इन्द्र (स्वर्गलोक) की, शरणम्=आश्रय में, यासि=जाते हो, (तथापि=तो भी) एकम्=अकेले, सभिकम्=द्यूतक्रीडाध्यक्ष को, वर्जयित्वा=छोड़ कर, रुद्रः=शिव भी, (त्वाम्=तुम्हें), रक्षितुम्=रक्षा करने के लिये, न=नहीं, तरति=पार पा सकता है ॥ ३ ॥
द्वितीयोऽङ्कः १३६
माथुरः—कहिं कहिं सुसहिअ-विप्पलम्भआ !
पलासि ले ! भअपलिवेविदङ्गआ । पदे पदे समं-विसमं खेलेन्तआ कुलं जसं अधिकसणं कलेन्तआ ॥ ४ ॥
( कुत्र, कुत्र सुसभिकविप्रलम्भक ! पलायसे रे भयपरिवेपिताङ्गक ! । पदे पदे समविषमं स्खलन् कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन् ॥ ४ ॥
अर्थ— यदि तुम ( अपनी रक्षा के लिये जमीन के अन्दर ) पाताल चले जाओ, अथवा इन्द्र की शरण में ( स्वर्गलोक ) चले जाओ, ( तो भी ) सभिक अकेले को छोड़कर भगवान् शिव भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ३ ॥
टीका— यदि=चेत् पातालम्=पृथिव्याः अधोदेशम्, व्रजसि=गच्छसि, इन्द्रम्=देवराजम्, शरणम्=रक्षितारम्, आश्रयं वा, यासि=गच्छसि, तथापि, एकम्=केवलम्, सभिकम्=द्यूताध्यक्षम् मां माथुरमिति भावः, वर्जयित्वा=त्यक्त्वा, रुद्रः=भगवान् शङ्करः, अपि त्वाम्, =संवाहकम्, रक्षितुम्=त्रातुम्, न=नैव, तरति=पारयति, समर्थो भवतीति भावः । एवञ्च ते पलायनं व्यर्थमेवेति बोध्यम् । आर्या वृत्तम् ॥ ३ ॥
विमर्श— इन्द्रं शरणम्-यहाँ इन्द्र रक्षक के पास जाते हो-यह आशय है । सभिकम्-इसके विषय में प्रथम पद्य में लिखा जा चुका है । तरति-'तॄ प्लवनतरणयोः' धातु से लट् प्रथमपुरुष एकवचन । यहाँ पार करना अर्थ है । रुद्रः-शिव के लिये यह सार्थक प्रयोग है । यहाँ आर्या छन्द है ॥ ३ ॥
अन्वयः— रे सुसभिक-विप्रलम्भक !, भयपरिवेपिताङ्गक, पदे पदे, समविषमं, स्खलन्, कुलम्, यशः, अतिकृष्णम्, कुर्वन्, कुत्र, कुत्र, पलायसे ॥ ४ ॥
शब्दार्थ— रे=अरे, सुसभिक-विप्रलम्भक=सज्जन, न्यायकारी सभिक को धोखा देने वाले, भयपरिवेपिताङ्गक=भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, पदे पदे=प्रत्येक कदम पर, सम-विषमम् = ऊँचे नीचे, स्खलन्=गिरते पड़ते, लड़खड़ाते हुये, कुलम्=अपने वंश को, और यशः=अपने यश को, अतिकृष्णम्=अत्यन्त कलुषित करते हुये, कुत्र कुत्र=कहाँ कहाँ, पलायसे=भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥
अर्थ— अरे ! ( मेरे जैसे ) सज्जन, न्यायप्रेमी द्यूतक्रीडाध्यक्ष को धोखा देने वाले, भय के कारण कांपते हुये अङ्गों वाले, ( संवाहक तुम ), पग-पग पर ऊपर नीचे गिरते हुये, लड़खड़ाते हुये, अपने कुल और यश को कलुषित करते हुये कहाँ-कहाँ भागे जा रहे हो ॥ ४ ॥
टीका— रे ! =अरे !, सुसभिक-विप्रलम्भक = सज्जनस्य न्यायप्रियस्य द्यूत-क्रीडाध्यक्षस्य वञ्चक !, भयपरिवेपिताङ्गक = भयेन=मत्तः भीत्या, परिवेपितानि=
१४० मृच्छकटिकम्
द्यूतकरः—( पदं वीक्ष्य ) एसो वज्जदि, इमं पणट्ठा पदवी । (एष व्रजति, इयं प्रनष्टा पदवी ।)
माथुरः—( आलोक्य सवितर्कम् ) अरे ! विप्पदीवु पादू । पाडिमा-शुण्णु देउलु । ( विचिन्त्य ) धुत्तु जूदरु विप्पदीवेहिं पादेहिं देउलं पविट्टो । (अरे ! विप्रतीपौ पादौ, प्रतिमाशन्यं देवकुलम्, धूर्तो द्यूतकरो विप्रतीपाभ्यां पादाभ्यां देवकुलं प्रविष्टः ।)
द्यूतकरः— ता अणुसरेम्ह । ( ततोऽनुसरावः ।)
माथुरः— एव्वं भोदु । ( एवं भवतु ।)
( उभौ देवकुलप्रवेशं निरूपयतः । दृष्ट्वाऽन्योन्यं संज्ञाय्य )
द्यूतकरः— कथं कट्ठमयी पडिमा ? ( कथ काष्ठमयी प्रतिमा ? )
कम्पितानि, थरथरायमाणानि अङ्गानि यस्य तत्सम्बुद्धौ, पदे-पदे=प्रतिपदम्, सम-विषमम्=उच्चावचस्थानम्, समविषमं वा यथा स्यात् तथा स्खलन्=पतन्, कुलम्=वंशम्, यशः=स्वकीयां कीर्तिञ्च, अतिकृष्णम् = अतिकलुषिताम्, कुर्वन् = विदधत्, पलायसे=प्रधावसि । अत्र रुचिरा वृत्तम् ॥ ४ ॥
विमर्श— कहिं कहिं-इस प्राकृत का संस्कृत रूपान्तर कुछ ग्रन्थों में 'कस्मिन् कस्मिन्' है और कुछ में 'कुत्र कुत्र' । कुत्र से भाव अधिक स्पष्ट होता है । सुसभिक-विप्रलम्भक-इससे माथुर अपने को अच्छा 'सभिक' कहना चाहता है । कुलं यशः अतिकृष्णं कुर्वन्--इस कथन से संवाहक को रोकने के लिये विवश करना चाहता है । पलायसे -- परा + √अय् + लट् आत्मनेपद प्रथम पु० एकवचन उप-सर्गस्यायतौ' [पा० सू०।२।१६] से रेफ का लकार । समविषमम्-यह क्रियाविशेषण है । इसमें रुचिरा छन्द है । लक्षण ---
जमौ सजौ गिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः ॥ ४ ॥
अर्थ—द्यूतकर—( पैर के चिह्न को देख कर ) यह जाता है ( जा चुका है ) । यह पदचिह्न समाप्त हो गये ।
माथुर—( देख कर विचारपूर्वक ) अरे ! उलटे पैर हैं । मन्दिर मूर्ति से रहित है । ( सोचकर ) धूर्त ( चालक ) जुआरी उल्टे पैरों से मन्दिर में गया है ।
द्यूतकर— तो हम दोनों पदचिह्नों का अनुसरण करें ।
माथुर— ऐसा ही हो ।
( दोनों मन्दिर में प्रवेश करने का अभिनय करते हैं, देखकर और एक दूसरे को इशारा करके )
द्यूतकर— क्या यह लकड़ी की मूर्ति है ?
द्वितीयोऽङ्कः १४१
**माथुरः—**अले ! ण हु ण हु । शैलपडिमा । ( इति बहुविधं चालयति, संज्ञाप्य च ) एव्वं भोदु ! एहि जूढं किलेम्ह । ( अरे ! न खलु न खलु, शैलप्रतिमा । एवं भवतु । एहि द्यूतं क्रीडावः )
( बहुविधं द्यूतं क्रीडतः )
संवाहकः— ( द्यूतेच्छाविकारसंवरणं बहुविधं कृत्वा ) ( स्वगतम् ) अले ! ( अरे ! )
कत्ताशद्दे णिण्णाणअश्श हलइ हडकं मणुश्शश्श ।
ढक्काशद्दे व्व णडाधिवश्श पब्भट्टलज्जश्श ॥ ५ ॥
( कत्ताशब्दो निर्नाणकस्य हरति हृदयं मनुष्यस्य ।
ढक्काशब्द इव नराधिपस्य प्रभ्रष्टराज्यस्य ॥ ५ ॥ )
**माथुर—**अरे, नहीं, नहीं । पत्थर की मूर्ति है । ( ऐसा कहकर अनेक बार हिलाता है और इशारा करके ) अच्छा, ऐसा हो । आओ, हम दोनों जुआ खेलें ।
( दोनों अनेक प्रकार से जुआ खेलते हैं । )
**टीका—**पदम्-पदचिह्नममित्यर्थः, पदवी=पदपङ्क्तिः, 'अयनं वर्त्म मार्गाध्व-पन्थानः पदवी सृतिः' अमरकोषः ( २।१।१५ ), प्रनष्टा = अदृष्टा, विप्रतीपो=विपरीतो, प्रतिमाहीनम् = मूर्तिरहितम्, देवकुलम् = देवमन्दिरम्, निरूपयतः=नाटयतः, अन्योन्यम्=परस्परम्, संज्ञाप्य = संकेतं दत्त्वा, काष्ठमयी = दारुनिर्मिता, शैलप्रतिमा=शिलाया इदं शैलम्=पाषाणखण्डम्, तन्निर्मिता मूर्तिरिति भावः ।
**अन्वयः—**अरे ! कत्ताशब्दः, निर्नाणकस्य, मनुष्यस्य, हृदयम्, प्रभ्रष्टराज्यस्य, नराधिपस्य ( हृदयम् ), ढक्काशब्द, इव, हरति ॥ ५ ॥
**शब्दार्थ—**कत्ताशब्दः = जिससे जुआ खेला जाता है उस कौड़ी की आवाज, निर्नाणकस्य=नाणक=पैसों से रहित, गरीब, मनुष्यस्य=आदमी के, हृदयम्=मन को, प्रभ्रष्टराज्यस्य=हारे हुये राज्य वाले, नराधिपस्य=राजा के, ( हृदय को ), ढक्का-शब्दः=भेरी की आवाज, इव=के समान, हरति=खींचता है, आकृष्ट करता है ॥५॥
**अर्थ—**संवाहक-( जुआ खेलने की इच्छा को बहुत प्रकार से रोक कर ) ( अपने आप ) अरे—कौड़ियों की आवाज निर्धन व्यक्ति के मन को उसी प्रकार खींच लेती है जिस प्रकार छीने गये राज्य वाले राजा के मन को भेरी की आवाज ॥ ५ ॥
**टीका—**अरे !=अहो !, कत्ताशब्दः=द्यूतकरणम्=द्यूतक्रीडा यया सा कत्ता, तस्याः शब्दः=ध्वनिः, निर्नाणकस्य=निर्गतं नाणकम्=धनादिकं यस्य यस्माद् वा, तस्य, निर्धनस्येति भावः, पुरुषस्य=मनुष्यस्य, हृदयम्=चित्तम्, प्रभ्रष्टराज्यस्य=प्रभ्रष्टम्=शत्रुभिरपहृतम्, राज्यम्=राज्यलक्ष्मीः यस्य सः, तस्य, नराधिपस्य=नरपतेः, हृदयम्, ढक्काशब्दः=भेरीध्वनिः, इव=यथा, हरति=बलात् तत्र नयति,
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जाणामि ण कीलिशं शुमेल-शिहल-पडण-शण्णिहं जूअम् !
तह वि हु कोइलमहुले कत्ताशद्दे मणं हलदि ॥ ६ ॥
( जानामि न क्रीडिष्यामि सुमेरु-शिखर-पतन-सन्निभं द्यूतम् ।
तथापि खलु कोकिलमधुरः कत्ताशब्दो मनो हरति ॥ ६ ॥ )
आकृष्टं करोतीति भावः। एवञ्च सम्मुखे द्यूतक्रीडां पश्यन् कत्ताशब्दं च शृण्वन् आत्मानं वशीकर्तुं न प्रभवामीति बोध्यम्। अत्रोपमा अप्रस्तुतप्रशंसा चेत्यनयोः संसृष्टि ! विपुला वृत्तम् ॥ ५ ॥
अन्वयः—जानामि, सुमेरुशिखरपतनसन्निभम्, द्यूतम्, न, क्रीडिष्यामि, तथापि, कोकिलमधुरः, कत्ताशब्दः, मनः, खलु, हरति ॥ ६ ॥
शब्दार्थ—जानामि=मैं जानता हूँ कि, सुमेरु-शिखरपतन-सन्निभम्=सुमेरु पर्वत की चोटी से गिरने के समान (सुख-चैन के विनाशक), द्यूतम्=जुये को (निर्धन कर्जदार हो जाने के कारण), न=नहीं, क्रीडिष्यामि=खेलूँगा, खेल सकूंगा, तथापि=फिर भी कोकिल-मधुरः=कोयल की आवाज के समान मीठी, कत्ताशब्दः=कौड़ियों की आवाज, मनः=मन को, खलु=निश्चित ही, हरति=खींच रही हैं। (खेलने को विवश कर रही है।) ॥ ६ ॥
अर्थ—मैं यह जानता हूँ कि सुमेरु पर्वत की चोटी से गिरने के समान (महान कष्टप्रद) जुआ (अब कर्जदार होने से) नहीं खेल सकूँगा, फिर भी कोयल के समान मधुर कौड़ियों की आवाज (खनखनाहट) (मेरे) मन को निश्चित ही आकृष्ट कर रही है। (खेलने को विवश कर रही है) ॥ ६ ॥
टीका—जानामि=अहमिदमवगच्छामि यत्, सुमेरु-शिखर-पतन-सन्निभम्=सुमेरुपर्वतस्य शृङ्गात् पतनतुल्यम्, अत्यन्तकष्टप्रदम्, द्यूतम्=द्यूतक्रीडनम्, न=नैव, क्रीडिष्यामि, ऋणग्रस्तत्वात् निर्धनत्वाच्चेति भावः, तथापि=एवं सत्यपि, कोकिलमधुरः=कोकिलतुल्यो मधुरः आकर्षकः, कत्ताशब्दः=कत्ताध्वनिः, खलु, मनः=चित्तम्, हरति=बलादाकर्षति। एवञ्च स्वासामर्थ्यं जानन्नपि तत्राकृष्टो भवामीति भावः। अत्र समाससुप्तोपमालंकारः। आर्याजातिः वृत्तम्। लक्षणन्तु बहुशः पूर्वमुक्तम् ॥ ६ ॥
विमर्श—जानामि-संवाहक अपनी दयनीय दशा और ऊपर लदे हुये कर्ज को सोचते हुये यह जानता है कि उसे अब जुआ खेलने का अवसर मिलना सम्भव नहीं है। कोकिल-मधुरः=कोयल की आवाज के समान मधुर। यहाँ वति प्रत्यय का लोप समास के कारण हुआ है। अतः समाससुप्तोपमा अलंकार है। आर्याजाति छन्द है ॥ ६ ॥
द्वितीयोऽङ्कः १४३
**द्यूतकरः—**मम पाढे मम पाढे। (मम पाठे मम पाठे।)
**माथुरः—**णं हु। मम पाढे मम पाढे। (न खलु ! मम पाठे मम पाठे।)
संवाहकः—(अन्यतः सहसोपसृत्य।) णं मम पाढे। (ननु मम पाठे।)
**द्यूतकरः—**लद्धे गोहे। (लब्धः पुरुषः।)
माथुरः—(गृहीत्वा) अले लुत्तदण्डा ! गहीदोसि। पअच्छ तं दश-सुवण्णं। (अरे लुप्तदण्डक ! गृहीतोऽसि। प्रयच्छ तत् दशसुवर्णम्।)
**संवाहकः—**अज्ज दइस्शं। (अद्य दास्यामि।)
**माथुरः—**अहुणा पअच्छ। (अधुना प्रयच्छ।)
**संवाहकः—**दइस्शं पशादं कलेहि। (दास्यामि, प्रसादं कुरु।)
**माथुरः—**अले ! णं संपदं पअच्छ। (अरे ! ननु साम्प्रतं प्रयच्छ।)
**संवाहकः—**शिलु पडिदि। (इति भूमौ पतति।) (शिरः पतति।)
(उभौ बहुविधं ताडयतः।)
**माथुरः—**एसु तुमं हु जूदिअर-मण्डलीए बद्धोसि। (एष त्वं खलु द्यूतकरमण्डल्या बद्धोऽसि।)
संवाहकः—(उत्थाय सविषादम्) कथं जूदिअल-मण्डलीए बद्धोम्हि। ही, एशे अम्हाणं जूदिअलाणं अलङ्घणीए शमए। ता कुदो दइस्शं। (कथं
अर्थ— **द्यूतकर—**मेरा, दाँव है, मेरा दाँव है।
**माथुर—**नहीं-नहीं, मेरा दाँव है, मेरा दाँव।
संवाहक—(दूसरी ओर से अचानक समीप आकर) नहीं जी, मेरा दाँव है।
द्यूतकर—(भागा जुआरी) पुरुष मिल गया।
माथुर—(पकड़ कर) अरे ! दण्ड (हारा हुआ धन) न देने वाले ! पकड़ लिये गये हो। तो वे दश सुवर्ण (के सिक्के आदि) दो।
**संवाहक—**आज दे दूँगा।
**माथुर—**इसी समय दो।
**संवाहक—**दे दूँगा, कुछ (समय के लिये) कृपा करो।
**माथुर—**अरे ! इसी समय दो।
**संवाहक—**शिर गिर रहा (चक्कर खा रहा) है। (इस प्रकार कह कर पृथ्वी पर गिर जाता है।)
(दोनों अनेक प्रकार से पीटते हैं।)
**माथुर—**इस समय तुम जुआरियों की मण्डली से पकड़ लिये गये हो।
संवाहक—(उठकर बहुत दुःख के साथ) क्या जुआरियों की मण्डली द्वारा
१४४ मृच्छकटिकम्
द्यूतकरमण्डल्या बद्धोऽस्मि । कष्टम् ! एषोऽस्माकं द्यूतकराणामलङ्घनीयः समयः । तस्मात् कुतो दास्यामि ? )
माथुरः--अले ! गण्डे कुल कुल । ( अरे ! गण्डः क्रियताम्, क्रियताम् ।)
संवाहकः--एव्वं कलेमि । ( द्यूतकरमुपसृश्य ) अद्धं ते देमि, अद्धं मे मुञ्चदु । ( एवं करोमि । अर्द्धं ते ददामि, अर्द्धं मे मुञ्चतु । )
द्यूतकरः--एव्वं भोदु । ( एवं भवतु । )
संवाहकः--( सभिकमुगपम्य ) अद्धरश गण्डे कलेमि, अद्धं पि मे अज्जो मुञ्चदु । ( अर्द्धस्य गण्डं करोमि, अर्द्धमपि मे आर्यो मुञ्चतु । )
माथुरः--को दोसु, एव्वं भोदु । ( को दोषः, एवं भवतु । )
पकड़ लिया गया हूँ । कष्ट है ? यह हम-जुआरिओं का अनुल्लंघनीय नियम है । तो कहाँ से दूँ ?
टीका--पाठे = तदानीं द्यूतक्रीडायामवसरबोधनार्थं प्रचलितः शब्दः, साम्प्रतं हिन्द्यां 'दाँव' इति प्रसिद्धम्, लुप्तदण्डक = लुप्तः=न प्रदत्तः, दण्डः=दशसुवर्णात्मकधनं येन तत्सम्बुद्धौ, प्रयच्छ=देहि, प्रसादम् = किञ्चिदधिकावसर-प्रदानरूपम्, शिरः=मस्तकम्, पतति=अस्वस्थतया वेदनामनुभवतीति भावः, द्यूतकरमण्डल्या=द्यूतकराणां समूहेन, बद्धः=गृहीतः, अलङ्घनीयः=अपरिवर्तनीयः, अवश्यं पालनीयः, समयः=नियमः 'समयः शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः' इत्यमरः । कुतः=कस्मात् जनात् साधनाद् वा ।
विमर्श--पाठे-उस समय पारी के लिये यह शब्द प्रचलित था । अलङ्घनीयः समयः=अवश्य पालनीय नियम । 'समय' शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है
समयाः शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः । अमरकोशः ( ३ । ३ । १५८ )
जुआरिओं का यह नियम रहा होगा कि मण्डली से घिर जाने पर जुआ खेलना पड़ता था और हारा धन वापस देना पड़ता था ।
अर्थ--माथुर--अरे ! वादा ( शर्त ) कर लो, कर लो ।
संवाहक--ऐसा ही करता हूँ । ( द्यूतकर के पास जाकर ) आधा मै तुम्हें दे दूंगा, आधा माफ कर दो ।
द्यूतकर--अच्छा, ऐसा ही हो ।
संवाहक-- ( सभिक के पास जाकर ) आधे का वादा ( शर्त ) करता हूँ । और आर्य आप भी मेरा आधा छोड़ दें ।
माथुर--क्या हानि ! ऐसा ही सही ।
द्वितीयोऽङ्कः १४५
संवाहकः—( प्रकाशम् ) अज्ज ! अद्धे तुए मुक्के ? ( आर्य ! अर्द्धं त्वया मुक्तम् ? )
माथुरः—मुक्के । ( मुक्तम् । )
संवाहकः—(द्यूतकरं प्रति) अद्धे तुए वि मुक्के ? । (अर्द्धं त्वयापि मुक्तम् ? )
द्यूतकरः—मुक्के । ( मुक्तम् । )
संवाहकः—संपदं गमिश्शं । ( साम्प्रतं गमिष्यामि । )
माथुरः—पअच्छ तं दशसुवण्णं, कहिं गच्छसि ? ( प्रयच्छ तत् दश-सुवर्णम्, कस्मिन् गच्छसि ? )
संवाहकः—पेक्खध पेक्खध भट्टालआ ! हा संपदं ज्जेव एक्काह अद्धे गण्डे कडे, अवलाह अद्धे मुक्के; तह वि मं अवलं संपदं ज्जेव मग्गदि । ( प्रेक्षध्वं प्रेक्षध्वं भट्टारकाः ! हा ! साम्प्रतमेव एकस्य अर्द्धे गण्डः कृतः अपरस्य अर्द्धं मुक्तम्; तथापि मामबलं साम्प्रतमेव याचते । )
माथुरः—( गृहीत्वा ) धुत्तु ! माथुरु अहं णिउणु । एत्थ तुए ण अहं धुत्तिज्जामि । ता पअच्छ तं लुत्तदण्डआ ! सव्वं सुवण्णं संपदं । ( धूर्त ! माथुरोऽहं निपुणः । अत्र त्वया नाहं धूर्त्यामि, तत् प्रयच्छ तं लुप्तदण्डक ! सर्वं सुवर्णं साम्प्रतम् । )
संवाहकः—कुदो दइश्शं ? । ( कुतो दास्यामि ? )
माथुरः—पिदरं विक्किणिअ पअच्छ । ( पितरं विक्रीय प्रयच्छ । )
संवाहक—( प्रकट रूप से ) आर्य ! आधा तुमने छोड़ दिया, क्षमा कर दिया ?
**माथुर—**हाँ, छोड़ दिया ।
संवाहक—( द्यूतकर से ) आधा आपने भी छोड़ दिया ?
**द्यूतकर—**हाँ, छोड़ दिया ।
संवाहक—( तो ) अब जाता हूँ ।
**माथुर—**वे दश सुवर्ण तो दे, कैसे जा रहे हो ?
**संवाहक—**श्रीमान् जी देखिये, देखिये । हाय ! अभी आधे के लिये वादा किया है और आधा छोड़ दिया है । तो भी मुझ दुर्बल से इसी समय मांगते हैं ।
माथुर—( पकड़ कर ) धूर्त ! मैं चतुर माथुर हूँ । मैं तुम्हारे साथ धूर्तता नहीं कर रहा हूँ । तो अरे दण्डयोग्य अपराधी ! मेरा वह सारा सोना दे ।
**संवाहक—**कहाँ से दूँ ।
**माथुर—**अपने बाप को बेच कर दे ।
**टीका—**गण्डः=निश्चयः, उपस्पृश्य=उपगम्य, मुञ्चतु=त्यजतु, कस्मिन्=कुत्र,
१० मृ०
१४६ | मृच्छकटिकम्
संवाहकः—कुदो मे पिदा ? (कुतो मे पिता ?)
माथुरः—मादरं विक्किणिअ पअच्छ । ( मातरं विक्रीय प्रयच्छ । )
संवाहकः—कुदो मे मादा ? ( कुतो मे माता ? )
माथुरः—अप्पाणं विक्किणिअ पअच्छ । ( आत्मानं विक्रीय प्रयच्छ । )
संवाहकः—कलेध पशादं, णेध मं लाजमग्गं । ( कुरुत प्रसादम् । नयत मां राजमार्गम् । )
माथुरः—पसरु । ( प्रसर )
संवाहकः—एव्वं भोदु । ( परिक्रामति ) अज्जा विक्किणिध मं इमश्श शहिशअश्श हत्यादो दशोहि शुवण्णकेहिं । (दृष्ट्वा आकाशे) कि भणाध ! 'किं कलइश्शि' त्ति । गेहे दे कम्मकले हुविशं । कथं अदइअ पडिवअणं गदे । भोदु, एव्वं इमं अण्णं भणइश्शं । ( पुनस्तदेव पठति ) कथं एशे वि मं अवधीलिअ गदे । हा ! अज्जचारुदत्तश्श विभवे विहडिदे एशे वड्ढामि मंदभाए । ( एवं भवतु । आर्य्याः! क्रीणीध्वं माम् अस्य सभिकस्य हस्तात् दशभिः सुवर्णैः । किं भणथ ? किं करिष्यसि ? इति । गेहे ते कर्मकरो भविष्यामि ।
कस्मिन् हेतौ वा, अबलम् = दुर्बलम्, धूर्तयामि = धूर्तताम् आचरामि = करोमि, प्रयच्छ=देहि ।
**विमर्श—गण्ड—**आजकल के 'वादा' के अर्थ में प्रयुक्त होता था । एक निश्चित समय पर देने की प्रतिज्ञा । साम्प्रतं गमिष्यामि — संवाहक अपनी चतुरता प्रकट करता है क्योंकि जो दश सुवर्ण उधार थे उनमें से पाँच माथुर से छुड़वा लिये और पाँच द्यूतकर से । इस प्रकार अब एक भी देय नहीं है । अतः संवाहक कहता है कि अब जा सकता हूँ । **धूर्तयामि—**आत्मानं धूर्तं करोमि इस अर्थ में 'तत्करोति तदाचष्टे' वार्तिक से धूर्त शब्द से णिच् होकर नामधातु प्रयोग है ।
**अर्थ—संवाहक—**मेरे बाप कहाँ है ।
**माथुर—**अपनी माँ को बेच दो ।
**संवाहक—**मेरी माँ कहाँ है ?
**माथुर—**तो अपने को बेच कर दो ।
**संवाहक—**मुझ पर (यह) कृपा करिये । मुझे राजपथ पर ले चलिये ।
**माथुर—**चलो ।
**संवाहक—**ऐसा हो अर्थात् चलिये । ( घूमता है ) सज्जनों ! इस प्रधान जुआरी के हाथों से मुझे दश सुवर्णों में खरीद लीजिये । ( ऊपर आकाश की ओर देखकर ) 'क्या कह रहे हो' 'क्या काम कर सकते हो ?' मैं आपके घर काम करने वाला नौकर बन सकता हूँ । कैसे, बिना उत्तर दिये हीं चला गया । ( कोई
द्वितीयोऽङ्कः १४७
कथमदत्त्वा प्रतिवचनं गतः ? भवत्वेवम्, इममन्यं भणिष्यामि । कथमेषोऽपि मामवधीर्य्य गतः ? । हा ! आर्य्यचारुदत्तस्य विभवे विघटिते एषो वर्त्ते मन्दभाग्यः । )
**माथुरः—**णं देहि । ( ननु देहि । )
**संवाहकः—**कुदो दइस्शं ? । ( इति पतति ) ( कुतो दास्यामि ? )
( माथुरः कर्षति । )
**संवाहकः—**अज्जा ! पलित्ताअध, पालिताअध । (आर्य्याः ! परित्रायध्वं परित्रायध्वम् । )
( ततः प्रविशति दर्दुरकः । )
**दर्दुरकः—**मोः ! द्यूतं हि नाम पुरुषस्य असिंहासनं राज्यम् ।
बात नहीं ) जाने दो । अब इस दूसरे आदमी से कहता हूँ । ( फिर वही='सज्जनों मुझे इस सभिक के हाथ से दश सुवर्णों में खरीद लें' कहता है । ) क्या, यह भी मेरी उपेक्षा करके चला गया ? हाय ! चारुदत्त का धन नष्ट हो जाने पर ( गरीब हो जाने पर ) मैं अभागा हो गया हूँ ।
**माथुर—**अरे ! दो ।
**संवाहक—**कहाँ से दूँ ? ( यह कह गिर पड़ता है। )
( माथुर खींचता है । )
**संवाहक—**सज्जनो ! बचाइये, बचाइये ।
**टीका—**विक्रीय=विक्रयं कृत्वा, प्रचर=चल, आकाशे=उपरि शून्य-प्रदेशे, भणथ=कथयथ । कर्मकरः=सर्वविधकार्यकरः भृत्यः, प्रतिवचनम्=उत्तरम्, अवधीर्य=उपेक्ष्य, विभवे=धनादौ, विघटिते=विनष्टे सति, तस्मिन् दरिद्रे जाते सति, वर्ते=भवामि, मन्दभाग्यः=हीनभाग्यः, परित्रायध्वम्=रक्षत, रक्षत । रङ्गमचे पात्राभावे सति आकाशे शून्यप्रदेशे विलोक्य यदुच्यते, तदाकाशभाषितमिति लक्षणकारैरुच्यते ।
**विमर्श—**जब रंगमञ्च पर न रहने वाले किसी पात्र को लक्षित कर ऊपर की ओर देखकर कुछ कहा जाता है । उसे आकाश-भाषित कहा जाता है । इसका निम्न लक्षण किया गया है—
किं ब्रवीषीति यन्नाट्ये विना पात्रं प्रयुज्यते ।
श्रुत्वेवानुक्तमप्यर्थं तत् स्यादाकाशभाषितम् ॥
साहित्य-दर्पण ।। ६ ।।
( इसके बाद दर्दुरक प्रवेश करता है । )
१४८ मृच्छकटिकम्
न गणयति पराभवं कुतश्चिद् हरति ददाति च नित्यमर्थजातम् । नृपतिरिव निकाममायदर्शी विभववता समुपास्यते जनेन ॥ ७ ॥
अन्वयः-—(द्यूतं कर्तृ) कुतश्चित्, (अपि), पराभवम्, न, गणयति, नित्यम्, अर्थजातम्, हरति, ददाति, च, विभववता (अपि), जनेन, निकामम्, आयदर्शी, राजा, इव, समुपास्यते ॥ ७ ॥
शब्दार्थः-—द्यूतम् = जुआ, कुतश्चित् = किसी से, भी, पराभवम् = पराजय, या अपमान को, न = नहीं, गणयति = गिनता है, मानता है, नित्यम् = रोज, प्रतिदिन, अर्थजातम् = धन-समुदायको, हरति = ले लेता है, च = और, ददाति = दे देता है, विभववता = धनवान्, भी, जनेन = पुरुष के द्वारा, निकामम् = प्रचुर, आयदर्शी = धनलाभ दिखलाने वाले, राजा इव = राजा के समान, समुपास्यते = सेवित होता है, खेला जाता है ॥ ७ ॥
अर्थ-—संवाहक—जुआ, आदमी के लिये विना सिंहासन का राज्य है ।
(यह जुआ) किसी से भी (होने वाले) अपमान की गणना = परवाह नहीं करता है, प्रतिदिन बहुत धन ले लेता है (हरा देता है), और दे देता है (जिता देता है)। धनवान व्यक्ति के द्वारा (भी) नित्य प्रचुर आय दिखाने वाले राजा के समान सेवित होता है ॥ ७ ॥
टीका-—द्यूतम्, कुतश्चित् = कस्माच्चिद् अपि, पराभवम् = पराजयम्, अपमानम्, न = नैव, गणयति = विचिन्तयति, नित्यम् = प्रतिदिनम्, अर्थजातम् = धनसमूहम्, हरति = पराजयरूपेण हरति, ददाति = विजयरूपेण प्रयच्छति, च, विभववता = धनादिसम्पन्ने-नापि, जनेन = पुरुषेण, निकामम् = प्रचुरम्, आयदर्शी = आयप्रदर्शकः, राजा इव = भूपतिरिव, समुपास्यते = सेव्यते । यथा राजा मानापमाने न विचारयति, कस्यापि सर्वस्वं हरति, कस्मैचिच्च विपुलं धनं ददाति । तथैवेदं द्यूतमपि अस्ति । यथा प्रचुरायप्रदर्शकस्य राज्ञः आराधना अन्येन धनवतापि पुरुषेण क्रियते तथैव द्यूतस्यापि सेवनमधिकायप्रदर्शकमतो धनवतापि पुरुषेण द्यूतमुपसेव्यते । एवञ्च द्यूतस्य राज्ञश्च तुल्यत्वादुपमालंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ॥ ७ ॥
विमर्शः-—दर्दुरक ने द्यूत को राजा के समान माना है। जैसे राजा किसी से हार नहीं मानता है बार बार युद्ध करता रहता है वैसे ही द्यूत में ही होता है। राजा किसी पर अप्रसन्न होकरं सब कुछ ले लेता है और प्रसन्न होने पर बहुत कुछ दे देता है, उसी प्रकार द्यूत भी कभी फकीर बना देता है और कभी मालामाल । जो राजा धनलाभ दिखाने वाला होता है उसकी सेवा में धनी भी, ओर अधिक धनलाभ की कामना से, लगे रहते हैं, वैसे ही लोग जुआ में भी लगे रहते हैं। निकामम् आयदर्शी—इस पुंल्लिङ्ग के स्थान पर 'आयदर्शि' यह नपुंसकलिङ्ग पाठ द्यूत के साथ और अधिक संगत होता है । अथवा—निकाम-मायदर्शि— यह मानकर विविध
द्वितीयोऽङ्कः १४७
अपि च—
द्रव्यं लब्धं द्यूतेनैव दारा मित्रं द्यूतेनैव ।
दत्तं भुक्तं द्यूतेनैव सर्वं नष्टं द्यूतेनैव ॥ ८ ॥
अपि च—
त्रेता-हृतसर्वस्वः पावर-पतनाच्च शोषितशरीरः ।
नर्दित-दर्शितमार्गः कटेन विनिपातितो यामि ॥ ९ ॥
छल प्रपञ्च दिखाने वाला द्यूत और राजा । इसमें उपमा अलंकार और पुष्पिताग्रा छन्द है। लक्षण
'अयुजि न युगरेफतो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा' ॥ ७ ॥
**अन्वयः—**द्यूतेन, एव, द्रव्यम्, लब्धम्, दाराः, मित्रम्, च, द्यूतेन, एव, दत्तम्, भुक्तम्, द्यूतेन एव, सर्वम्, नष्टम् ॥ ८ ॥
**शब्दार्थः—**द्यूतेन = जुआ के द्वारा, एव = ही, द्रव्यम् = धन, लब्धम् = मिला, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, दाराः = स्त्रियाँ, मिलीं, मित्रम् = मित्र, मिला, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, दत्तम् = दिया गया, भुक्तम् = भोग किया गया, द्यूतेन एव = जुआ के द्वारा ही, सर्वम् = सब कुछ, नष्टम् = नष्ट हो गया ॥ ८ ॥
**अर्थ—**और भी,
(मैंने) जुआ से ही धन पाया, जुआ से ही स्त्री (मिली), मित्र मिला, जुआ ने ही (सब कुछ) दिया, भोग किया और जुआ से ही सब कुछ नष्ट हो गया ॥ ८ ॥
**टीका—**मया कर्त्रा, द्यूतेन एव = करणभूतेन द्यूतेन, द्रव्यम् = धनम्, लब्धम् = प्राप्तम्, द्यूतेन एव, दाराः = स्त्रियः, स्त्री वा, लब्धा, मित्रम् = सुहृद्, लब्धम्, द्यूतेनैव कर्त्रा, दत्तम् = प्रदत्तम्, द्यूतेनैव = हेतुना, करणेन वा, सर्वम् = निखिलम्, नष्टम् = विनष्टम् । अत्रैकस्यैव कारकस्यानेक-क्रिया-सम्बन्धात् कारकदीपकमलङ्कारः, विद्युन्मालावृत्तम् ॥ ८ ॥
**विमर्शः—**दर्दुरक यहाँ यह कहता है कि मुझे जो कुछ मिला या खोया वह सब द्यूत के कारण ही हुआ । द्यूतरूपी एक ही कारक का अनेक क्रियाओं के साथ सम्बन्ध होने से कारकदीपक अलंकार है। कुछ ने विषमालंकार माना है। विद्युन्माला छन्द है। लक्षण—मो मो गो गो विद्युन्माला ॥ ८ ॥
**अन्वयः—**त्रेताहृतसर्वस्वः, पावरपतनात्, च, शोषितशरीरः, नर्दितदर्शित-मार्गः, कटेन, विनिपातितः, यामि ॥ ९ ॥
**शब्दार्थ—**त्रेताहृत-सर्वस्वः = त्रेता (तीया नामक एक खास चाल) से सर्वस्व हार जाने वाला, च = और, पावर-पतनात् = पावर = दूआ नामक खेल की चाल गिरने से, शोषित-शरीरः = सूखे निश्चेष्ट शरीर वाला, नर्दित-दर्शित-मार्गः = नर्दित = नडका
१५० मृच्छकटिकम्
( अग्रतोऽवलोक्य ) अयमस्माकं पूर्वसभिको माथुर इत एवाभिवर्त्तते । भवतु, अपक्रमितुं न शक्यते । तदवगुण्ठयाम्यात्मानम् । ( बहुविधं नाट्यं कृत्वा स्थितः । उत्तरीय निरीक्ष्य )
अयं पटः सूत्रदरिद्रतां गतो ह्ययं पटश्छिद्रशतैरलङ्कृतः । अयं पटः प्रावरितुं न शक्यते ह्ययं पटः संवृत एव शोभते ॥ १० ॥
नामक खास चाल से ( हारने के कारण ) दिखाई गयी रास्ता वाला, कटेन=पूरा नामक चाल से, विनिपातितः=गिराया गया, ( मैं ), यामि=जा रहा हूँ ॥ ६ ॥
अर्थ— और भी,
तीया ( नाम की एक खास चाल ) से जिसका सारा धन हरण हो गया, दुआ ( नाम की खास चाल ) के चलने=गिरने से जिसका सारा शरीर सूखा = सुन्न=निश्चेष्ट हो गया, नक्का ( नाम की चाल ) से ( हारने के कारण भागने के लिये जिसे) रास्ता दिखा दिया गया, और पूरा (नामक चाल) से जो गिरा दिया गया, वैसा मैं ( दुःखी ) जा रहा हूँ ॥ ६ ॥
टीका— त्रेताहृत-सर्वस्वः त्रेताख्य-क्रीडा-प्रकार-विशेषेण 'तीया' इति प्रसिद्धेन, हृतम्=गतम् सर्वस्वम् = निखिलं धनं यस्य सः, पावरपतनात् = पावरस्य 'दुआ' इति प्रसिद्धस्य क्रीडनप्रकारस्य, पतनात् = भ्रंशात्, शोषित-शरीरः = शोषितम्=शुष्कताम् = निश्चेष्टतां नीतम्, शरीरम्=देहो यस्य सः तादृशः, नर्दित-दर्शितमार्गः = 'नक्का' इति क्रीडन-प्रकारेण पराजितत्वात् गृहगमनाय दर्शितः=प्रदर्शितः, मार्गः = पन्थाः, यस्य सः, कटेन = 'पूरा' इति ख्यातेन क्रीडनप्रकारेण, विनिपातितः = पराजयात् भूमौ प्रपातितः, यामि = असहायो भूत्वा व्रजामि । प्राचीनकाले द्यूतक्रीडायां त्रेता-पावर-नर्दित-कट-शब्दाः प्रचलिता आसन् तेषां कृतेऽधुना तीया-दुआ-नक्का-पूरा-शब्दाः प्रयुज्यन्ते । आर्यावृत्तम् ॥ ९ ॥
विमर्श— द्यूतक्रीडा में प्रयुक्त होने वाले चार पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग इसमें किया गया—( १ ) त्रेता=तीया ( आजकल तीन, सात, ग्यारह, पन्द्रह ) ( २ ) पावर=दुआ ( दो, छह, दश चौदह वगैरह ) ( ३ ) नर्दित=नक्का ( एक पाँच नौ तेरह ) ( ४ ) कट=पूरा ( चार, आठ, बारह, सोलह ) । इन चारों दावों ने उसे धोखा दिया है, यह उसका भाव है । इसमें आर्या छन्द है ॥ ६ ॥
अर्थ— ( आगे देखकर ) यह हमारा पुराना द्यूत-क्रीडाध्यक्ष माथुर इधर ही आ रहा है । अच्छा, भागना तो सम्भव नहीं है । अतः अपने को छिपा लेता हूँ । ( कई प्रकार से शरीर को ढकने का अभिनय करके खड़ा होता है । उस उत्तरीय वस्त्र को देखकर— )
अन्वयः— अयम्, पटः, सूत्रदरिद्रताम्, गतः, अयम्, पटः, छिद्रशतैः, अलङ्कृतः, अयम्, पटः, प्रावरितुम्, न, शक्यते, अयम्, पटः, संवृतः, एव, शोभते ॥१०॥
द्वितीयोऽङ्कः १५१
अथवा किमयं तपस्वी करिष्यति । यो हि—
पादेनैकेन गगने द्वितीयेन च भूतले ।
तिष्ठाम्युल्लम्बितस्तावद् यावत्तिष्ठति भास्करः ॥ ११ ॥
शब्दार्थ— अयम्=यह (मेरा), पटः=कपड़ा, सूत्रदरिद्रताम्=सूतों की जीर्णता को, गतः=प्राप्त हो चुका है, अयम्=यह, पटः=कपड़ा, छिद्रशतैः=सैकड़ों छेदों से, अलङ्कृतः=सजा हुआ, युक्त है, अयं पटः = यह कपड़ा, प्रावरितुम्=शरीर ढकने के लिये, न शक्यते=नहीं सम्भव है, अयं पटः=यह कपड़ा, हि=निश्चितरूप से, संवृतः= लपेटा, घरी किया हुआ, एव=ही, शोभते=अच्छा लगता है ॥ १० ॥
अर्थ — यह कपड़ा (मेरा दुपट्टा) जीर्ण शीर्ण सूतों वाला हो चुका है। यह कपड़ा सैकड़ों छिद्रों से युक्त है। यह कपड़ा (शरीर) ढकने में समर्थ नहीं है। यह कपड़ा, निश्चित रूप से, लपेटा हुआ ही अच्छा लगता है ॥ १० ॥
टीका— अयम् = हस्तस्थितः, मदीयः, पटः = उत्तरीयम्, सूत्रदरिद्रताम् = सूत्राणाम्=तन्तूनाम्, दरिद्रताम्=जीर्णताम्, गतः=प्राप्तः, अतीव जीर्णोऽभवदिति भावः, अयं पटः=इदमूत्तरीयम्, हि=निश्चयेन, छिद्रशतैः=शताधिकविवरैः, अलङ्कृतः= विभूषितः, युक्तः, अगणितछिद्रयुक्तः इति भावः, अयं पटः = इदमूत्तरीयम्, प्रावरितुम् = आच्छादयितुम्, न=नैव, शक्यते=समर्थ्यते, अयं पट = इदमूत्तरीयम्, संवृतः = परिवेष्टितः, एव, हि = निश्चयेन, शोभते = भाति । अत्र 'अयं पटः' इत्यस्यावृत्त्या अनवीकृतत्वदोषः । वंशस्थबिलं वृत्तम् ॥ १० ॥
विमर्श — प्रावरितुम् — प्र+आङ् + √वृ + तुमुन् ।
संवृतः— सम् + √वृ + क्त । इसमें 'अयं पटः' का चार बार प्रयोग होने से अनवीकृतत्वदोष है। साधारणपात्र का कथन होने से चिन्तनीय नहीं है। इसमें वंशस्थबिल छन्द है । लक्षण— 'जतो तु वंशस्थबिलं जतौ जरौ' ॥ १० ॥
अन्वयः— एकेन, पादेन, गगने, द्वितीयेन, च, भूतले, उल्लम्बितः, तावद्, तिष्ठामि, यावत्, भास्करः, तिष्ठति ॥ ११ ॥
शब्दार्थ— एकेन = एक, पादेन = पैर से, गगने = आकाश में च = और, द्वितीयेन=दूसरे से, भूतले=पृथ्वी पर, उल्लम्बितः=ऊपर लटका हुआ, तावत्=तब तक, तिष्ठामि=रह सकता हूँ, यावत्=जब तक, भास्करः=सूरज, तिष्ठति=[आकाश में लटका] रहता है ॥ ११ ॥
अर्थ— अथवा यह बेचारा (तुच्छ) माथुर मेरा क्या कर सकता है जो मैं— एक पैर से आकाश में [अर्थात् ऊपर करके] और दूसरे से पृथ्वी पर [अर्थात् नीचे करके] तब तक लटका हुआ रह सकता हूँ जब तक कि आकाश में सूरज (लटकता हुआ) रहता है ॥ ११ ॥
टीका— यो अहम्=दर्दुरकः-इति गद्यस्थेनान्वयः—एकेन पादेन=चरणेन,
१५२ मृच्छकटिकम्
माथुरः— देहि देहि । ( देहि देहि । ) ( दापय दापय । )
संवाहकः— कुदो दइश्शं ( कुतो दास्यामि ? )
( माथुरः कर्षति । )
दर्दुरकः— अये ! किमेतदग्रतः (आकाशे) किं भवानाह ? 'अयं द्यूतकरः सभिकेन खलीक्रियते, न कश्चिन्मोचयति' इति ? नन्वयं दर्दुरो मोचयति । ( उपसृत्य ) अन्तरमन्तरम् । ( दृष्ट्वा ) अये ? कथं माथुरो धूर्त्तः, अयमपि तपस्वी संवाहकः ।
यः स्तब्धं दिवसान्तमानतशिरा नास्ते समुल्लम्बितो
यस्योद्धर्षणलोष्टकैरपि सदा पृष्ठे न जातः किणः ।
यस्यैतच्च न कुक्कुरैरहरहर्जङ्घान्तरं चर्व्यते
तस्यात्यायतकोमलस्य सततं द्यूतप्रसङ्गेन किम् ॥ १२ ॥
गगने=आकाशे, च=तथा, द्वितीयेन=अपरेण, भूतले=पृथिव्याम्, एकं पादमूर्ध्वं कृत्वान्यं च पृथिव्यां संस्थाप्य उल्लम्बितः=ऊर्ध्वं लम्बमानः सन्, तावत्=तावत्कालपर्यन्तम्, तिष्ठामि=स्थातुं शक्नोमि, यावत्=यावत्कालपर्यन्तम्, भास्करः=सूर्यः, तिष्ठति=गगने विराजते, सायंकालं यावदनेनैव रूपेणाहं स्थातुं शक्नोमीत्येवं क्लेशसहस्य मम माथुरात् कुतो भियमिति भावः । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ११ ॥
विमर्श— उल्लम्बितः—उत् + लम्ब् + इट् + क्त । भाः करोति—इस अर्थ में—भाः + करः, विसर्ग का सत्त्व । यावत् तिष्ठति भास्करः—अर्थात् सायंकाल तक मैं इसी विचित्र रूप में लटका रह सकता हूँ अतः डरना बेकार है। बाद में रात हो जायगी और तब मुझे कोई भी नहीं पकड़ सकेगा, इस माथुर की तो बात ही क्या ? इसमें पथ्यावक्त्र छन्द है ॥११॥
अर्थ—माथुर— दो, दो, (अथवा दिलाओ, दिलाओ) ।
संवाहक— कहा से दूँ ।
( माथुर घसीटता है । )
दर्दुरक— अरे ! सामने यह क्या हो रहा है ? ( आकाश में ऊपर की ओर मुंह करके ) आपने क्या कहा ? 'सभिक [ द्यूत क्रीडाध्यक्ष ] इस द्यूतकर [संवाहक] को परेशान कर रहा है, कोई भी नहीं छुड़ाता है ?' तो लो यह दर्दुरक छुड़वाता है । ( पास जाकर ) रास्ता दीजिये, रास्ता दीजिये । ( देखकर ) अरे, अब कैसे ? यहाँ तो धूर्त माथुर है, और यह गरीब संवाहक ।
अन्वयः— यः, ( अहम् इव ) समुल्लम्बितः, आनतशिराः, (सन्), दिवसान्तम्, स्तब्धम्, न, आस्ते, यस्य, पृष्ठे, उद्धर्षणलोष्ठकैः, अपि, किणः, सदा, न, जातः, यस्य, च, एतत्, जङ्घान्तरम् कुक्कुरैः, अहरहः, न, चर्व्यते, अत्यायतकोमलस्य, तस्य, सततम्, द्यूतप्रसङ्गेन, किम् ॥ १२ ॥
द्वितीयोऽङ्कः १५३
शब्दार्थः-—यः= जो पुरुष [ अहम् इव = मेरे समान ], समुल्लम्बितः=ऊपर लटका हुआ, आनतशिराः=शिर को नीचे झुकाये हुये, दिवसान्तम्=दिन के अन्त=सायंकाल तक, स्तब्धम्=निश्चल रूप से, न=नहीं, आस्ते=रह सकता है, यस्य=जिसकी, पृष्ठे=पीठ पर, उद्घर्षणलोष्ठकैः=नुकीले ढेलों से, अपि=भी, किणः=चिह्न=ढट्ठा, न=नहीं, जातः=बना है, च=और, यस्य=जिसके, जंघान्तरम्=जाँघों के भीतरी भाग [ के मांस ] को, कुक्कुरैः=कुत्ते, अहरहः=रोज, न=नहीं, चर्व्यते=चबाते हैं, काटते हैं, अत्यायतकोमलस्य=बहुत अधिक कोमल, तस्य=उस व्यक्ति का, सततम्=निरन्तर, द्यूतप्रसङ्गेन=जुआ खेलने से, किम्=क्या लाभ ? अर्थात् जो मेरे समान ऐसा नहीं है उसे जुआ नहीं खेलना चाहिये ।। १२ ।।
अर्थ-—[ मेरे समान ] जो व्यक्ति ऊपर लटका हुआ नीचे शिरवाला होते हुये सायंकाल तक अर्थात् दिन भर निश्चल रूप से नहीं रह सकता है। जिसकी पीठ पर [हारा हुआ धनादि न देने के कारण] सदैव नुकीले ढेलों [ पर घसीटने ] के कारण चिह्न=ढट्ठे नहीं पड़े हैं। और [ हार कर या जीत कर भागते समय ] जिसकी जांघों के मध्य भाग [ के मांस ] को रोज कुत्ते नहीं चबाते हैं, ऐसे अत्यन्त कोमल [ शरीर वाले ] व्यक्ति को रोज जुआ खेलने से क्या लाभ ? [ अर्थात् मेरे समान जो उक्त स्थितियों को सह सकता है उसे ही जुआ खेलना चाहिये न कि सरल कोमल पुरुष को ] ।। १२ ।।
टीका-—यः=जनः, ( अहम् इव=दर्दुरक इव ), समुल्लम्बितः=ऊर्ध्वभागादधो-देशे लम्बमानः, अत एव, आनतशिराः=आनतम्=अधःकृतम्, शिरः=मस्तकम् यस्य सः तादृशः, अधोमुख इत्यर्थः, सन्, दिवसान्तम्=दिवसस्यान्तम्=सायङ्कालं यावत्, स्तब्धम्=निश्चलं यथा स्यात् तथा, न आस्ते=स्थातुं न शक्नोतीति भावः, यस्य=जनस्य, मम, इव, पृष्ठे=पृष्ठभागे, उद्घर्षणलोष्ठकैः=उद्घृष्यते एभिरिति ( करणे घञ् ) उद्घर्षणानि, तानि च=लोष्टकानि=इष्टिकादिखण्डानि, तैः, 'ढेला' इति नाम्ना हिन्द्यां प्रसिद्धैरिति भावः सदा=प्रतिदिनम्, किणः=घर्षणादिचिह्नम्, न=नैव, जातः=समुत्पन्नः, पराजितत्वात् धनादि-प्रतिदानेऽसमर्थतया सभिकादिभिःकृतेन घर्षणेन यस्य पृष्ठं किणाङ्कितं न जातमिति भावः, यस्य=जनस्य, च मम इव, एतत्, इदम्, जङ्घान्तरम् = जघनमध्यदेशः, कुक्कुरैः = श्वभिः, अहरहः=प्रतिदिनम्, न=नैव, चर्व्यते=भक्ष्यते, तस्य=पुरोवर्त्तिसंवाहकस्य, अत्यायतकोमलस्य=अतिशयकोमलस्य, यद्वा, अत्यायतः=विपुलशरीरश्चासौ, कोमलश्च, तस्य, सततम्=निरन्तरम्, द्यूतप्रसङ्गेन=द्यूतक्रीडानुरागेण, किम्=न किमपि प्रयोजनम् । एवञ्च संवाहकेन द्यूतं न क्रीडितव्यम् । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालंकारः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। १२ ।।
विमर्श-—स्तब्धम्—√ स्तभ् + क्त । समुल्लम्बितः—सम् + उत् + लम्ब् +
१५४ मृच्छकटिकम्
भवतु, माथुरं तावत् सान्त्वयामि । ( उपगम्य ) माथुर ! अभिवादये।
( माथुरः प्रत्यभिवादयते । )
दर्दुरकः—किमेतत् ? ।
माथुरः—अअं दशसुवण्णं घालेदि । ( अयं दशसुवर्णं धारयति । )
दर्दुरकः—ननु कल्पवर्त्तमेतत् ।
माथुरः—(दर्दुरस्य कक्षतल-लुण्ठीकृतं पटमाकृष्य ) भट्टा ! पश्शत पश्शत-
जज्जरपडप्पावुदो अअं पुलिसो दससुवण्णं कल्लवत्तं भणादि । ( भर्तारः !
पश्यत पश्यत, जर्जरपटप्रावृतोऽयं पुरुषो दशसुवर्णं कल्पवर्त्तं भणति । )
दर्दुरकः—अरे मूर्ख ! नन्वहं दशसुवर्णान् कटकराणेन प्रयच्छामि । तत्,
किं यस्यास्ति धनम्, स किं क्रोडे कृत्वा दर्शयति ? । अरे—
दुर्वर्णोऽसि विनष्टोऽसि दशस्वर्णस्य कारणात् ।
पञ्चेन्द्रियसमायुक्तो नरो व्यापाद्यते त्वया ॥ १३ ॥
क्त । अत्यायतकोमलस्य=अत्यन्तकोमलस्य, अथवा, अत्यायतः=विपुलशरीरः चासौ, कोमलश्च=मृदुश्च, तस्य । द्यूतप्रसङ्गेन किम्—दर्दुरक का तात्पर्य यह है कि जो मेरे समान कष्ट नहीं सह सकता ऐसे व्यक्ति को जुआ नहीं खेलना चाहिये। बेचारा संवाहक तो फंस गया है। यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । लक्षण—सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ १२॥
**अर्थ—**अच्छा, तो माथुर को राजी करता हूँ, ( मनाता हूँ )। ( समीप जाकर ) माथुर ! आपको प्रणाम करता हूँ ।
( माथुर प्रतिनमस्कार करता है । )
**दर्दुरक—**यह क्या ( कर रहे हो ) ?
**माथुर—**इस पर मेरे दश सुवर्ण ( खण्ड ) उधार हैं ।
**दर्दुरक—**अरे, इतना धन तो कलेवा ( के समान तुच्छ ) है ।
माथुर—( दर्दुरक के कांख=कक्ष में लपेट कर रखे हुये कपड़े को खींच कर ) सज्जनों ! देखो, देखो, फटे कपड़े से लिपटा ( आवृत ) यह आदमी सोने के दश सिक्कों को कलेवा के समान तुच्छ कहता है ।
**दर्दुरक—**अरे मूर्ख ! दश स्वर्ण सिक्के तो मैं एक कट ( दाँव ) से ही दे सकता हूँ । तो क्या, जिसके पास धन रहता है वह उसे गोद में लेकर दिखाता फिरता है ।
**अन्वयः—**अरे ! ( इति गद्यस्थम् ), त्वम्, दुर्वर्णः, असि, विनष्टः, असि, यत्, त्वया, दशस्वर्णस्य, कारणात्, पञ्चेन्द्रियसमायुक्तः, नरः, व्यापाद्यते ॥ १३ ॥
**शब्दार्थ—**अरे !=अरे !, त्वम्, दुर्वर्णः = निम्नवर्णवाले वर्णाधम, असि = हो, विनष्टः = पतित, असि = हो, यत् = जो कि, त्वया, = तुम्हारे द्वारा,
द्वितीयोऽङ्कः १५५
माथुरः—भट्टा ! तुए दशसुवण्णु कल्लवत्तु, मए एसु विहवु । ( भर्तः ! तव दशसुवर्णं कल्पवर्त्तं, मम एष विभवः । )
दर्दुरकः—यद्येवम्, श्रूयतां तर्हि; अभ्यान् तावत् दशसुवर्णानस्यैव प्रयच्छ । अयमपि द्यूतं शीलयतु ।
माथुरः—ता किं भोदु ? । ( तत् किं भवतु ? )
दर्दुरकः—यदि जेष्यति तदा दास्यति ।
माथुरः—अह ण जिणादि । ( अथ न जयति ? )
दर्दुरकः—तदा न दास्यति ।
दशस्वर्णस्य = दस सोने के सिक्कों के, कारणात् = कारण से, पञ्चेन्द्रियसमायुक्तः = पाँच इन्द्रियों से युक्त, नरः = प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य को, व्यापाद्यते = मार डाला जाता है ॥ १३ ॥
अर्थ—अरे ! ( माथुर ! ) तुम नीच एवं पतित हो जो कि दश स्वर्ण सिक्कों के कारण एक पाँच इन्द्रियों ( आँख, कान, नाक, जीभ, और त्वचा रूपी पाँच ज्ञानेन्द्रियों ) से युक्त मनुष्य को तुम मार डाल रहे हो ॥ १३ ॥
टीका—अरे = रे माथुर !, त्वम्, दुर्वर्णः = वर्णाधमः, हीनजातिकः असि, विनष्टः = पतितः, असि, यत् = यस्मात्, त्वया = माथुरेण, दशस्वर्णस्य = दशस्वर्णमुद्रायाः, कारणात् = हेतोः, पञ्चेन्द्रियैः = श्रोत्रत्वक्-चक्षूरसनाघ्राणैरिति पञ्चज्ञानेन्द्रियैः, अथवा पञ्चकर्मेन्द्रियैः, समायुक्तः = अलंकृतः, नरः = प्राणिषु श्रेष्ठः मानवः, व्यापाद्यते = हन्यते । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ १३ ॥
विमर्श—दुर्वर्णः = दुष्टः = निकृष्टः वर्णः यस्य सः, नीच वर्णवाला । विनष्टः—यहाँ धर्मादि से पतित—यह अर्थ लेना चाहिये । पञ्चेन्द्रिय-समायुक्तः = पञ्च ज्ञानेन्द्रिय ( आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा ) अथवा कर्मेन्द्रिय ( पायु, उपस्थ, पाणि, पाद, वाक्) से युक्त । व्यापाद्यते—वि + पद + णिच्—कर्मवाच्य का रूप है। काव्यलिङ्ग अलंकार और अनुष्टुप् छन्द है ॥ १३ ॥
अर्थ—माथुर—राजा साहब ! ( व्यङ्ग्य में है ) दश स्वर्ण सिक्के तुम्हारे लिये कलेवातुल्य तुच्छ हो सकते हैं किन्तु मेरे लिये तो यही सम्पत्ति है ।
दर्दुरक—यदि ऐसी बात है तो सुनो; इसे कुछ देर के लिये दस स्वर्ण सिक्के दे दो । यह ( उनके द्वारा ) फिर से जुआ खेले ।
माथुर—तो इससे क्या होगा ?
दर्दुरक—यदि जीत जायगा तो दे देगा ।
माथुर—यदि नहीं जीता ?
दर्दुरक—तब नहीं देगा ।
| १५६ | मृच्छकटिकम् |
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**माथुरः—**अह ण जुत्तं जप्पिदुं । एवं अक्खन्तो तुमं पअच्छ धूत्त-आ ! अहं वि णाम माथुरो धुत्तु जूदं मिथ्या आदंसाअमि ? अण्णस्स वि अहं ण बिभेमि । धुत्ता ! खण्डिअवउत्तोसि तुमं । ( अथ न युक्तं जल्पितुम् । एवमाचक्षाणस्त्वं प्रयच्छ धूर्त्तक ! अहमपि नाम माथुरो धूर्त्तः द्यूतं मिथ्या आदर्शयामि ? अन्यस्मादपि अहं न बिभेमि । धूर्त्त ! खण्डितवृत्तोऽसि त्वम् । )
**दर्दुरकः—**अरे कः खण्डितवृत्तः ?
**माथुरः—**तुमं हु खण्डिअवउत्तो । ( त्वं खलु खण्डितवृत्तः । )
**दर्दुरकः—**पिता ते खण्डितवृत्तः । ( संवाहकस्य अपक्रमितुं संज्ञां ददाति । )
**माथुरः—**गोसाविआपुत्ता ! णं एवं जूदं तुए सेविदं ? (वेश्यापुत्र ! एवमेव द्यूतं त्वया सेवितम् ? )
**दर्दुरकः—**मया एवं द्यूतमासेवितम् ।
**माथुरः—**अले संवाहआ ! पअच्छ तं दशसुवण्णं । ( अरे संवाहक ! प्रयच्छ तत् दशसुवर्णम् । )
**संवाहकः—**अज्ज दइश्शं, दाव दइश्शं । (अद्य दास्यामि, तावत् दास्यामि ।)
( माथुरः कर्षति । )
**माथुर—**अब ( इस विषय में ) तुमसे बात करना ठीक नहीं है । रे धूर्त ! ऐसा कह रहे हो तो तुम्हीं दे दो । मैं भी माथुर, प्रसिद्ध धूर्त जुआरी बिना मतलब के जुआ का खेल दिखाऊँगा ? और किसी से डरता भी नहीं हूँ । धूर्त ! तुम खण्डितवृत्त ( बेईमान, चरित्रभ्रष्ट ) हो ।
**दर्दुरक—**अरे ! कौन बेईमान है ।
**माथुर—**तुम बेईमान ( चरित्रभ्रष्ट ) हो ।
**दर्दुरक—**तुम्हारा बाप बेईमान है । ( संवाहक को भाग जाने के लिये इशारा करता है ।)
**माथुर—**रण्डी के बच्चे ! तूने ऐसा ही जुआ खेलना सीखा ?
**दर्दुरक—**हाँ, मैंने ऐसे ही खेला है ।
**माथुर—**अरे संवाहक ! वह दश स्वर्ण दो ।
**संवाहक—**आज दूंगा । अभी दूंगा ।
( माथुर खींचता है । )
**टीका—**भतं: ! = राजन् ! इयं व्यङ्ग्योक्तिः । अस्य = अस्मै, प्रयच्छ = देहि, आचक्षाणः = कथयन्, मिथ्या = लाभादिकं विनैव, आदशंयामि = प्रदर्शयामि, अत्र काकुः । खण्डितवृत्तः = द्यूतकरस्य कृते निश्चिताचारणस्यावमन्ता अतः चरित्रहीन इति भावः । अपक्रमितुम् = तत्स्थानादन्यत्र पलायितुम्, संज्ञाम्=
द्वितीयोऽङ्कः १५७
दर्दुरकः—मूर्ख ! परोक्षे खलीकर्त्तुं शक्यते, न ममाग्रतः खलीकर्तुम्। (माथुरः संवाहकमाकृष्य घोणायां मुष्टिप्रहारं ददाति। संवाहकः सशोणितं मूर्च्छां नाटयन् भूमौ पतति। दर्दुरक उपसृत्य अन्तरयति। माथुरो दर्दुरकं ताडयति। दर्दुरको विप्रतीपं ताडयति।)
माथुरः—अले अले दुट्ट ! छिण्णालिआपूत्तअ ! फलं पि पाविहिसि। (अरे अरे दुष्ट ! पुंश्चलीपुत्रक ! फलमपि प्राप्स्यसि।)
दर्दुरकः—अरे मूर्ख ! अहं त्वया मार्गगत एव ताडितः; श्वो यदि राजकुले ताडयिष्यसि, तदा द्रक्ष्यसि।
संकेतम्, एवमेव = अनेनैव प्रकारेण ऋणं दत्त्वा हानिलाभौ परित्यज्येति भावः, आसेवितम् = क्रीडितम्।
विमर्श—भर्त्तः । (प्राकृतभट्टा) यह माथुर का व्यङ्ग्यभरा सम्बोधन है। अस्य = यहाँ सम्बन्धसामान्य मानकर षष्ठी है। अहमपि नाम माथुरो धूर्तः द्यूतं मिथ्याऽऽदर्शयामि ?—इसमें काकु का प्रयोग है। माथुर का यह तात्पर्य है कि मैं भी परमधूर्त जुआरी माथुर हूँ, बिना किसी लाभ के जुआ की प्रदर्शनी नहीं करता हूँ। कुछ लोगों ने दो वाक्यखण्ड माने हैं। और ‘जुआ को छल से खेलता हूँ’ तथा कुछ ने ‘अपने को व्यर्थ प्रधान माने फिरता हूँ’—यह अर्थ किया है। परन्तु ये परम्पराप्राप्त नहीं हैं। इस विषय में काले द्वारा उद्धृत वक्तव्य ध्यान देने योग्य है— “श्रीनिवासाचार्य—अहमपि नाम माथुरो धूर्तो द्यूतं मिथ्याऽऽदर्शयामिति काकुः। पणमप्रतियातितं त्यजन् हि द्यूतमेव वितथयति। नाहमेवं द्यूतस्य व्यपदेशं दूषयामीत्यर्थः। नेदं धनस्पृहया पीडनम्, किं तर्हि ? द्यूतधर्मरक्षार्थमिति भावः।” खण्डितवृत्त—जुआ में जो नियम निर्धारित हैं, उनका पालन न करने वाला।
अर्थ—दर्दुरक—मूर्ख ! मेरे पीठ पीछे (न होने पर) ही सता सकते हो। मेरे सामने नहीं सता सकते हो।
(माथुर संवाहक को खींच कर उसकी नाक पर घूंसा जमाता है। संवाहक खून से लथपथ होकर मूर्च्छा (बेहोशी) का अभिनय करता हुआ पृथ्वी पर गिर जाता है। दर्दुरक समीप पहुँच कर बीच-बचाव कर देता है, दोनों को अलग-२ कर देता है। माथुर दर्दुरक को (भी) पीटने लगता है। दर्दुरक भी जवाब में पीटने लगता है।)
माथुर—अरे अरे दुष्ट ! पुंश्चली=छिनार के बच्चे ! इसका मजा चखोगे (फल भी पाओगे)।
दर्दुरक—अरे मूर्ख ! तुमने सड़क पर जाते हुये (निरपराध) मुझे पीटा है। कल यदि राजदरवार में पीटोगे, तब देखना (उसका फल भोगना)।