भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

द्वितीयोऽङ्कः १४३

**द्यूतकरः—**मम पाढे मम पाढे। (मम पाठे मम पाठे।)
**माथुरः—**णं हु। मम पाढे मम पाढे। (न खलु ! मम पाठे मम पाठे।)
संवाहकः—(अन्यतः सहसोपसृत्य।) णं मम पाढे। (ननु मम पाठे।)
**द्यूतकरः—**लद्धे गोहे। (लब्धः पुरुषः।)
माथुरः—(गृहीत्वा) अले लुत्तदण्डा ! गहीदोसि। पअच्छ तं दश-सुवण्णं। (अरे लुप्तदण्डक ! गृहीतोऽसि। प्रयच्छ तत् दशसुवर्णम्।)
**संवाहकः—**अज्ज दइस्शं। (अद्य दास्यामि।)
**माथुरः—**अहुणा पअच्छ। (अधुना प्रयच्छ।)
**संवाहकः—**दइस्शं पशादं कलेहि। (दास्यामि, प्रसादं कुरु।)
**माथुरः—**अले ! णं संपदं पअच्छ। (अरे ! ननु साम्प्रतं प्रयच्छ।)
**संवाहकः—**शिलु पडिदि। (इति भूमौ पतति।) (शिरः पतति।)
(उभौ बहुविधं ताडयतः।)
**माथुरः—**एसु तुमं हु जूदिअर-मण्डलीए बद्धोसि। (एष त्वं खलु द्यूतकरमण्डल्या बद्धोऽसि।)
संवाहकः—(उत्थाय सविषादम्) कथं जूदिअल-मण्डलीए बद्धोम्हि। ही, एशे अम्हाणं जूदिअलाणं अलङ्घणीए शमए। ता कुदो दइस्शं। (कथं


अर्थ— **द्यूतकर—**मेरा, दाँव है, मेरा दाँव है।
**माथुर—**नहीं-नहीं, मेरा दाँव है, मेरा दाँव।
संवाहक—(दूसरी ओर से अचानक समीप आकर) नहीं जी, मेरा दाँव है।
द्यूतकर—(भागा जुआरी) पुरुष मिल गया।
माथुर—(पकड़ कर) अरे ! दण्ड (हारा हुआ धन) न देने वाले ! पकड़ लिये गये हो। तो वे दश सुवर्ण (के सिक्के आदि) दो।
**संवाहक—**आज दे दूँगा।
**माथुर—**इसी समय दो।
**संवाहक—**दे दूँगा, कुछ (समय के लिये) कृपा करो।
**माथुर—**अरे ! इसी समय दो।
**संवाहक—**शिर गिर रहा (चक्कर खा रहा) है। (इस प्रकार कह कर पृथ्वी पर गिर जाता है।)
(दोनों अनेक प्रकार से पीटते हैं।)
**माथुर—**इस समय तुम जुआरियों की मण्डली से पकड़ लिये गये हो।
संवाहक—(उठकर बहुत दुःख के साथ) क्या जुआरियों की मण्डली द्वारा