मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १४२ | मृच्छकटिकम् |
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जाणामि ण कीलिशं शुमेल-शिहल-पडण-शण्णिहं जूअम् !
तह वि हु कोइलमहुले कत्ताशद्दे मणं हलदि ॥ ६ ॥
( जानामि न क्रीडिष्यामि सुमेरु-शिखर-पतन-सन्निभं द्यूतम् ।
तथापि खलु कोकिलमधुरः कत्ताशब्दो मनो हरति ॥ ६ ॥ )
आकृष्टं करोतीति भावः। एवञ्च सम्मुखे द्यूतक्रीडां पश्यन् कत्ताशब्दं च शृण्वन् आत्मानं वशीकर्तुं न प्रभवामीति बोध्यम्। अत्रोपमा अप्रस्तुतप्रशंसा चेत्यनयोः संसृष्टि ! विपुला वृत्तम् ॥ ५ ॥
अन्वयः—जानामि, सुमेरुशिखरपतनसन्निभम्, द्यूतम्, न, क्रीडिष्यामि, तथापि, कोकिलमधुरः, कत्ताशब्दः, मनः, खलु, हरति ॥ ६ ॥
शब्दार्थ—जानामि=मैं जानता हूँ कि, सुमेरु-शिखरपतन-सन्निभम्=सुमेरु पर्वत की चोटी से गिरने के समान (सुख-चैन के विनाशक), द्यूतम्=जुये को (निर्धन कर्जदार हो जाने के कारण), न=नहीं, क्रीडिष्यामि=खेलूँगा, खेल सकूंगा, तथापि=फिर भी कोकिल-मधुरः=कोयल की आवाज के समान मीठी, कत्ताशब्दः=कौड़ियों की आवाज, मनः=मन को, खलु=निश्चित ही, हरति=खींच रही हैं। (खेलने को विवश कर रही है।) ॥ ६ ॥
अर्थ—मैं यह जानता हूँ कि सुमेरु पर्वत की चोटी से गिरने के समान (महान कष्टप्रद) जुआ (अब कर्जदार होने से) नहीं खेल सकूँगा, फिर भी कोयल के समान मधुर कौड़ियों की आवाज (खनखनाहट) (मेरे) मन को निश्चित ही आकृष्ट कर रही है। (खेलने को विवश कर रही है) ॥ ६ ॥
टीका—जानामि=अहमिदमवगच्छामि यत्, सुमेरु-शिखर-पतन-सन्निभम्=सुमेरुपर्वतस्य शृङ्गात् पतनतुल्यम्, अत्यन्तकष्टप्रदम्, द्यूतम्=द्यूतक्रीडनम्, न=नैव, क्रीडिष्यामि, ऋणग्रस्तत्वात् निर्धनत्वाच्चेति भावः, तथापि=एवं सत्यपि, कोकिलमधुरः=कोकिलतुल्यो मधुरः आकर्षकः, कत्ताशब्दः=कत्ताध्वनिः, खलु, मनः=चित्तम्, हरति=बलादाकर्षति। एवञ्च स्वासामर्थ्यं जानन्नपि तत्राकृष्टो भवामीति भावः। अत्र समाससुप्तोपमालंकारः। आर्याजातिः वृत्तम्। लक्षणन्तु बहुशः पूर्वमुक्तम् ॥ ६ ॥
विमर्श—जानामि-संवाहक अपनी दयनीय दशा और ऊपर लदे हुये कर्ज को सोचते हुये यह जानता है कि उसे अब जुआ खेलने का अवसर मिलना सम्भव नहीं है। कोकिल-मधुरः=कोयल की आवाज के समान मधुर। यहाँ वति प्रत्यय का लोप समास के कारण हुआ है। अतः समाससुप्तोपमा अलंकार है। आर्याजाति छन्द है ॥ ६ ॥